नमो राज की उल्टी गिनती शुरू, भारतीय राजनीति में होने वाला बदलाव

जिन इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल को कोस-के आज़ादी के बाद पैदा हुए नेतागण लोकतंत्र की दुहाई देते हुए आज सर्वोच्च सार्वजनिक पदों पर विराजमान हैं, वो इंदिरा के ही पदचिन्हों के पीछे भागते दिखाई दे रहे हैं।

निरुक्त भार्गव, उज्जैन। वैसे तो 9 अगस्त (1942) भारतवर्ष के इतिहास में एक महत्वपूर्ण तारीख के रूप में दर्ज है, लेकिन इस बार (2022) की ये तारीख सचमुच भारतीय राजनीति में सदैव याद रखी जाएगी। कारण स्पष्ट है, भाजपा के नेतृत्व वाले ‘राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन’ (एनडीए) की चूलें हिल गई हैं क्योंकि उसके सबसे ताकतवर साथी ‘संयुक्त जनता दल’ (जेडी-यू) ने बरसों-पुराना नाता तोड़ लिया। उत्तरी भारत में बिहार जैसी अत्यंत अहम् राजनीतिक सत्ता से भाजपा को दूध से मक्खी की तरह बाहर निकालकर नीतीश कुमार ने जो पांसा फेंका है उसकी भनक  शायद इंटेलिजेंस ब्यूरो, सीबीआई और एन्फोर्समेंट डायरेक्टरेट (इडी) तक को नहीं थी. आरएसएस और भाजपा का तथाकथित मजबूत नेटवर्क भी लचर साबित हुआ. ऐसे में अगर ये कयास लगाए जा रहे हैं कि 2024 में लोकसभा चुनाव में 400 सीटें जीतने का ख्वाब देख रही भाजपा और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की केंद्र से चलाचली की बेला निकट आ रही है, तो इसे गंभीरता से लेना पड़ेगा।

बिहार के ताजा राजनीतिक घटनाक्रम में भाजपा का साथ छोड़ लालू यादव के पुत्र तेजस्वी यादव का दामन थाम कर नितीश कुमार ने भले-ही अपनी कुर्सी बचा ली हो, पर इन दोनों दलों और नेताओं का ये रिश्ता किसी भी सूरत में एक “पवित्र” गठबंधन नहीं कहलाया जा सकता! इसके कई ऐतिहासिक कारण हैं. इस बात की अब कोई अहमियत नहीं रह गई है कि बिहार का राज-काज कैसे चलेगा और नई सरकार की जिन्दगी कितनी लम्बी रहेगी? 242 के सदन में 77 सीटों के साथ सबसे बड़ा दूसरा दल होने के बावजूद भाजपा किस तरह, कब तक और आखिर क्यों विपक्षी बेंचों पर बैठकर तमाशा देखती रहेगी, अगले तीन साल?

असल में भाजपा मुंह छिपाने की जिस स्थिति में आज पहुंची है, उसके लिए उसके तमाम कर्ता-धर्ताओं और केंद्र सरकार के अधीन विभिन्न एजेंसियां की करतूतों को ही जिम्मेवार ठहराया जाएगा! 2020 का बिहार का जनादेश मोटे तौर पर तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले ‘महागठबंधन’ को था और महज 45 सीटों पर सिमटकर नितीश कुमार सूख चुकी गंगा नदी से पानी भरने की कगार पर जा पहुंचे थे, पर भाजपा ने उन्हें सहारा दिया और सातवीं बार मुख्यमंत्री का ताज पहनवा दिया. इसके पीछे भाजपा आलाकमान की सुविचारित रणनीति काम कर रही थी कि नितीश कुमार की पीठ थपथपाते रहो और धीरे-धीरे उनको और उनकी पार्टी के विधायकों और बड़े नेताओं को पपोल-पपोलकर अपने पाले में खेंचते रहो. अलावा इसके, खुद के “प्रखर राष्ट्रवाद” वाले एजेंडे को लागू कर अपने को एक नंबर की पार्टी बनाकर सूबे की सरकार में काबिज़ होने के मनसूबे तो थे ही।

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बहरहाल, जगहंसाई के अलावा जितनी भी मिट्टी पलीद होनी है, वो भाजपा की ही होनी है! इसकी जो वजहें हैं, उसमें गोपनीयता वाली कोई बात नहीं है: 2013-2014 में नरेन्द्र मोदी को जिस तरह से उभारा गया और दिल्ली की सल्तनत को चलाने के अटल बिहारी वाजपेयी के ‘डॉक्ट्रिन’ को कूड़ेदान में फेंका गया और लालकृष्ण आडवाणी के संगठन के अमोघ ‘सूत्रों’ को तिलांजलि दी गई, उसने लोकसभा में 303 सीटें होने के बाद भी आरएसएस के इस समूचे कुनबे को महज 8 साल में वर्तमान बदतर हालातों पर ला खड़ा किया है. हकीकत में भाजपा भारतवर्ष के आधे हिस्से में बहुमत में नहीं थी, 2014 के बाद से आज तक और इसीलिए मोदी के मैनेजरों ने एनडीए गठबंधन की राजनीति की माला समय-समय पर जपी है, लेकिन एक-एक करके उसके पुराने और भरोसेमंद दल और नेता बिखरते चले गए! परस्पर विश्वास को खूब ठोकरें मारी गईं! सत्ता को एक अंधी सुरंग में तब्दील कर दिया गया और दीर्घ अनुभवी राजनेताओं के मीम बनाकर एक ओछी राजनीतिक सोच सामने ले आई गई, कॉर्पोरेट घरानों के बरक्स।

ये तथ्य बड़ा हैरतंगेज है कि जिन इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल को कोस-के आज़ादी के बाद पैदा हुए नेतागण लोकतंत्र की दुहाई देते हुए आज सर्वोच्च सार्वजनिक पदों पर विराजमान हैं, वो इंदिरा के ही पदचिन्हों के पीछे भागते दिखाई दे रहे हैं. राज्यपाल सरीखे उच्च संवैधानिक पदों पर मनमानी नियुक्तियां, मध्यप्रदेश/महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्यों की चुनी हुई सरकारों को खरीद-फ़रोख्त कर सत्ता से रातों-रात गायब कर देना, काबिल और विश्वसनीय केन्द्रीय मंत्रियों की एकाएक छुट्टी और वाहियात किस्म के लोगों को केन्द्रीय मंत्री बनाकर उनसे सार्वजनिक मंचों पर हर दिन बकवास करवाना, पार्टी के सांगठनिक ढांचे को बेजुबान कर देना! जो वास्तविक राष्ट्रीय विषय हैं, उनकी अनदेखी कर जनभावनाओं की अवहेलना और मैं-ही-मैं की पराकाष्ठा।

राष्ट्र, भारतवर्ष की स्वतंत्रता की 75वीं सालगिरह मना रहा है: वैश्विक बीमारी “कोरोना-19” के लगातार दो सालों के भयंकर चंगुल से निकलकर ठेठ देहात से लेकर कस्बों/नगरों/ शहरों और महानगरों के लोग स्वयं को और पूरे परिवार को दोबारा व्यवस्थित करने के अनथक और अहर्निश कार्यों में लगे हैं! प्रधानमंत्रीजी के “हर घर तिरंगा अभियान” की भी मर्यादा रखनी है। ऐसे में शीर्ष पर बैठे हमारे अपने लोग जब स्वार्थ और सत्ता की स्तरहीन प्रतिस्पर्धा करते हैं और लोकतंत्र की जड़ों में चूना डालने का काम करते हैं, तो बताइए कि जनता-जनार्दन किसके उत्कर्ष की बाट जोहे…?