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पागलपन देखना हो तो देख लो, इस देश का यारों क्या होगा…?

Posted on: 08 Mar 2019 11:26 by Ravindra Singh Rana
पागलपन देखना हो तो देख लो, इस देश का यारों क्या होगा…?

वरिष्ठ पत्रकार ऋषिकेश राजोरिया की कलम से

देश में अजीबोगरीब किस्म का पागलपन चल रहा मालूम पड़ता है। समझ में नहीं आता कि ये क्या हो रहा है। किस तरह की राजनीति चल रही है और किस तरह समाज का व्यवहार है? जो लोग उम्रदराज हैं, उन्हें सोचने की जरूरत है। एक बार पीछे छूटे हुए रास्तों को देखने की जरूरत है। एक गाना बहुत फेमस हुआ था- जिंदगी इक सफर है सुहाना, यहां कल क्या हो किसने जाना। अगर जिंदगी को सफर मानते हैं तो देखना चाहिए कि अब तक का सफर कैसा कटा? कब जन्म हुआ था? कैसा पालन-पोषण हुआ?

कैसी शिक्षा मिली? परिवार से कैसे संस्कार मिले? संपर्क में आने वाले कितने लोगों ने किस तरह का व्यवहार किया? उस वातावरण की अगर आज से तुलना करें तो क्या अंतर आ गया है, इस पर विचार करना सभी बुजुर्ग और अनुभवी लोगों के लिए जरूरी होना चाहिए। उनके सामने एक पूरी पीढ़ी बड़ी हो गई है और अपने ही सामने एक तीसरी पीढ़ी तैयार हो रही है। सामाजिक व्यवहार में क्या अंतर आ रहा है?

मैं कभी-कभी इस दिशा में सोचता हूं तो बहुत भयावह स्थिति पाता हूं। अंधविश्वास चरम पर पहुंच गया है। धर्म, जाति को लेकर तरह-तरह की मिथ्या धारणाएं लोगों ने पाल ली हैं। लोग भगवान की जगह किसी अन्य मनुष्य की भगवान समझकर पूजा करने लगे हैं। इससे कई तथाकथित संतों ने बड़ी संख्या में लोगों की धार्मिक आस्था का व्यापार किया और अपनी खुद की वासना पूर्ति की। ऐसे कई कुकर्मी इस भारतभूमि में संत के भेष में मौजूद हैं।

ऐसे कुछ लोग हत्या बलात्कार गुंडागर्दी जैसे आरोपों में जेलों की शोभा बढ़ा रहे हैं। उनकी मौजूदगी से जेलें धन्य हो रही हैं। जेलों में बंद कैदी धन्य हो रहे हैं। चलो एक संत हमारे बीच भी आया। इसी तरह राजनीति भी जनविरोधी जैसी अनुभव में आ रही है। लोकतंत्र के जो बुनियादी मूल्य हैं, यह उनके विसर्जन का समय प्रतीत हो रहा है। क्या लोकतंत्र के भेष में एकतंत्री तानाशाही शुरू होने वाली है?

धार्मिक अंधविश्वास, जड़समान रूढि़वादी व्यवहार, घनघोर स्वार्थ, पैसे के लिए कुछ भी करने को तत्पर, इस तरह की आदतें लोग पहले से ही धारण किए हुए हैं। ऊपर से लद गया चुनावी राजनीति से जुड़ा छल-छद्म। धार्मिक अंधश्रद्धा से प्रेरित कट्टरता तो लोगों में पहले से है। जो वेदों के नाम तक नहीं जानते, वे लोग वेदों पर गंभीर चर्चाएं करने लगे हैं। जिनका स्वतंत्रता आंदोलन से कोई लेना-देना नहीं रहा, वे लोग देश की रीति-नीति तय कर रहे हैं।

जो लोग जैन कहलाते हैं, वे एक तरफ शिक्षण संस्थाओं के आर्थिक लाभ लेने के लिए खुद का नाम अल्पसंख्यक वर्ग में लिखवा लेते हैं और दूसरी तरफ विश्व हिंदू परिषद के पदाधिकारी भी बन जाते हैं। मुस्लिम लोग अपने धर्म की कट्टरता की घोषणा करते हुए भारतीय जनसाधारण से अलग विशिष्ट मांगें करते रहते हैं। उन्हें चलती सड़क रोककर वहां नमाज पढ़ने की जरूरत पड़ जाती है। यह क्या है? धार्मिक आधार पर शक्ति प्रदर्शन, जो कि पूरी तरह अंधविश्वास पर टिका हुआ है। धार्मिक व्यक्ति इस तरह दूसरों को परेशान करने वाले काम करने के बारे में सोचता भी नहीं है। करना तो दूर की बात है।

बहुत दुखी करने वाली बात है। अब तो यहां तक होने लगा है कि सामने हो रही घटनाओं के बारे में लोग सच्चाई पर गौर करने के लिए तैयार नहीं है। वे भाषणों में बहे जा रहे हैं। यह रिकॉर्ड है कि संपूर्ण विश्व में नेताओं के भाषणों से बड़ी संख्या में लोग प्रभावित हुए हैं। अच्छे भाषण करने वाला नेता माना जाता है और ज्यादातर लोग मानते हैं कि वह सही बोलता है। भाषण करने वाले नेता राजनीति करते हैं।

वे तरह-तरह की राजनीतिक पार्टियों के होते हैं। पहले इस देश में कांग्रेस शासन करती थी। वह कई बार टूटी लेकिन फिर भी कांग्रेस बनी रही। इसका श्रेय एक परिवार को जाता है। पंडित जवाहरलाल नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री थे। उनकी बेटी के बेटे की पत्नी सोनिया गांधी कई वर्षों से कांग्रेस की सर्वेसर्वा है। अब पूरा राजपाट बेटे राहुल और बेटी प्रियंका को सौंपने की तैयारी है। इस परिवार के लोग प्रधानमंत्री की कुर्सी पर अपना खानदानी अधिकार मानते हैं। फिलहाल राहुल गांधी इस कुर्सी पर बैठने का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।

इधर भाजपा ने पूरे बहुमत से पहली बार देश में सरकार बनाई है तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का भी दखल हो गया। यह सरकार जैसी चली, उससे साबित हुआ कि सरकार सरकार होती है। जिसको चलाने का मौका मिलता है, उसे निरंकुश बनते देर नहीं लगती। नरेन्द्र मोदी भाजपा सरकार के प्रधानमंत्री हैं, जो तकनीकी रूप से राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन अर्थात एनडीए की सरकार है। इस सरकार ने लोगों पर ऐसे-ऐसे सोटे लगाए हैं कि वे बड़ी बेसब्री से चुनाव होने का इंतजार करने लगे थे।

सरकार चलाने वाले के पास पूरी खुफिया सूचनाएं होती हैं, जिनके जरिए जनभावनाओं की थाह लगाई जा सकती है। नोटबंदी, लोगों की सारी जमापूंजी जबरन बैंकों में जमा करवाकर बड़ी संख्या में लोगों को बेईमान बताने का प्रयास, जनता को प्रताडि़त करने के लिए अकेली पुलिस के अलावा चार-पांच अन्य खूंखार किस्म की एजेंसियां। निरीह व्यक्ति की गरदन दबोचने के लिए चारों तरफ फैले हुए पंजे। इस तरह के वातावरण की रचना होते हुए हम देख सकते हैं। इस परिस्थिति में सरकार चलाने का चस्का पाल बैठे लोगों के सामने चुनाव जीतना बहुत बड़ी समस्या है।

कैसे चुनाव जीतें? जनभावना को कैसे पटरी पर लाएं? जनभावनाएं ज्यादातर खर्च और आमदनी, धार्मिक अंधविश्वास, अंध श्रद्धा आदि से जुड़ी होती हैं। राजनीतिक जागरूकता कम ही लोगों में है। राजनीति में वे प्रवाह के साथ बहते हैं। जिस तरह का वातावरण बना हुआ था उसमें जनभावनाओं का प्रवाह अपनी तरफ मोड़ने के लिए मोदी सरकार ने बहुत ही जोखिम भरा काम कर डाला है। वायुसेना का उपयोग कर पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में तीन जगह बम गिरवा दिए। कई आतंकियों के मरने की खबर भी फैल गई।

तात्कालिक प्रतिक्रिया में प्रधान सेवकजी का ग्राफ आसमान पर पहुंच गया। जब अंतरराष्ट्रीय मीडिया की खबरें आने लगीं तो अब साबित करने की कोशिश हो रही है कि जो किया सही किया, यह जरूरी था। आतंकियों की कमर इसी तरह तोड़ी जाएगी। जो लोग सवाल उठा रहे हैं, वे पाकिस्तान को फायदा पहुंचाने वाली बात कर रहे हैं। प्रकारांतर से वे देशद्रोही हैं। देशभक्त और भोली भाली जनता के एकमात्र सेवक हम ही हैं।

मेरे पास इस घटनाक्रम के सही आंकड़े देश में इतने चैनल देखने और अखबार पढ़ने के बावजूद नहीं है। जब एक हजार किलो के बम ऐसी जगह गिराए गए जहां आतंकियों का ट्रेनिंग कैंप चल रहा था तो वहां पूरे इलाके में भवन, मकान जैसे ढांचे खंडहर में तब्दील हो जाना चाहिए थे। ऐसी कोई विश्वसनीय सूचना नहीं मिल रही है और ढाई सौ से चार सौ तक आतंकियों के मरने की खबर भी अटकलों पर, सभ्य भाषा में अनुमान पर आधारित बताई जा रही है। लेकिन लोग अब सामने हो रही घटनाओं में भी सच्चाई की तलाश करने को तैयार नहीं है। यह बहुत ही खतरनाक बात है। जिससे यह सवाल भी उठता है कि सिर्फ चुनाव जीतने और सरकार में बने रहने के लिए कुछ भी किया जाएगा? …. क्या यह विचारणीय प्रश्न नहीं है?

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