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डॉ. प्रणब मुखर्जी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, देवांशु झा की कलम से

Posted on: 09 Jun 2018 07:42 by krishna chandrawat
डॉ. प्रणब मुखर्जी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, देवांशु झा की कलम से

यह निर्णय का समय है ! मुझे पत्रकारिता शुरू किए हुए दो वर्ष हुए थे । दिल्ली में ही एक चैनल में काम करते हुए गुजरात दंगों की खबरों से दो चार होना पड़ता था । पत्रकारों में बड़ा आश्चर्य और क्रोध था। वहां एक भाईजान भी रिपोर्टिंग करते थे । सुबह शाम जब भी उनके दर्शन होते वे एक ही बात करते, ग़ज़ब कर दिया भाई ! आंखें ताप से लाल । मौका मिलता तो वहीं हम जैसे चुप रहने वालों का भी टैंटवा दबा देते ।

हम तब टीवी मीडिया के पुरोधा पत्रकारों की रिपोर्टिंग देख रहे थे । ऐसा लग रहा था जैसे विश्व इतिहास का सबसे भयंकर नरसंहार तो गुजरात में ही हुआ है । हिन्दुओं ने तो नादिरशाह को नानी याद दिला दी ! इन चर्चाओं के दौरान गोधरा गुम ही रहता । कश्मीर तो वैसे भी जन्नत है, वहां हिन्दुओं का क्या अधिकार ! पांच लाख अगर अपनी धरती से भगा दिए गए तो कौन सा भूचाल आ गया ! गोधरा में साठ निरीह हिन्दुओं को भस्म कर दिया जाना तो समाज की सहज प्रक्रिया थी ! बाबरी ध्वंस का नैतिक प्रतिशोध था । जबकि प्रतिशोध तो सालों पहले ही लिया जा चुका था । धमाकों से देश दहल उठा था । कारगिल में भी पाकिस्तानी भाई बदला ले चुके थे ।हिन्दू नरसंहार तो हमारा भाग्य है !

उस वक्त जबकि दंगों की झूठी रिपोर्ट्स से चैनल और अखबार पटे पड़े थे तब प्रतिरोध की कोई बुलंद आवाज़ नहीं थी । यहां तक कि गुजरात के यशस्वी कवि लेखक राजेंद्र केशवलाल शाह को एक टिप्पणी के लिए पूरी साहित्यिक जमात काटने पर उतर आई थी । उनसे ज्ञानपीठ छीन लेने स्वर लहरा रहे थे । निर्मल वर्मा जैसे महान लेखक और चिंतक बीजेपी के एजेंट घोषित हो चुके थे।

लगभग अस्सी फीसदी हिन्दू बौद्धिक और समाज इस प्रवंचना के साथ खड़ा था कि हिन्दुओं के राज में मुसलमान सुरक्षित नहीं हैं । उन्होंने दंगों के तात्कालिक कारण, इतिहास के सारे भयावह हिन्दू नरसंहार, भारत विभाजन और सांस्कृतिक पराजय तक को भुला दिया था। आखिर गंगाजमनी संस्कृति भी तो थी। आश्चर्य तो यह कि ऐसा आठ सौ वर्षों के पतनकाल में भी कभी न हो सका था। हिन्दू हमेशा आक्रांताओं से संघर्षरत रहे। परंतु, आज़ादी के पचास वर्षों में विभाजन की अननुभूत पीड़ा को झेलने के बाद भी हमेशा कांग्रेस ने हमें ही कसूरवार ठहराया हमें ही उपदेश दिए, जैसा कि कल बंगाली बाबू ने दिया, जो कि नेहरू के इतिहासबोध की उपज है ।

2002 में गुजरात से एक परिवर्तन का प्रारंभ हुआ । एक जाति जो हज़ारों वर्ष के इतिहास में सदैव धर्म से अनुप्राणित रही वह इस मोड़ पर पराजित, पतित और ठगी हुई महसूस करने लगी। क्योंकि उसकी सहनशीलता की प्रत्यंचा को सीमान्त तक खींच कर छोड़ दिया गया था । उसकी सहज सहिष्णुता और आंतरिक अनुरागी मन पर चोट की गई थी ।

यह हिन्दू जागरण का प्रस्थान पर्व था और नरेंद्र मोदी उसके नायक थे, अब प्रणेता हैं । गुजरात के समय भी हिन्दू उतना ही समावेशी था, वह अब भी उतना ही समावेशी, सहिष्णु और उदार है । परंतु अब वह अपने स्वत्व से समझौता नहीं करेगा । अब वह सहिष्णुता का झूठा भाषण नहीं सुनेगा। इसे प्रणब मुखर्जी जैसे कथित ज्ञानी और कांग्रेसी सेक्यूलर समझ लें तो बेहतर। क्योंकि अब तो अस्तित्व का ही संघर्ष है ।

हिन्दू एक प्रचंड प्रवाह के मध्य खड़ा है और उसके पांव खींचे जा रहे हैं परंतु उसे दृढ़ रहना है । सामने तट है । उसे पार उतरना ही होगा । इस युद्ध को बिना रक्तपात के भी जीता जा सकता है बस लोकतंत्र के नायक का पथ गहना होगा। शिकारी घेरा डाल रहे हैं जिनमें आत्मघाती हिन्दू अधिक हैं और कथित अल्पसंख्यक उनके कांधों पर बंदूक रखकर गोलियां दाग रहे हैं । अब भी नहीं समझ सकते तो कभी नहीं समझ सकोगे।

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