भारत के बेजोड़ फोटोग्राफर की अनोखी कहानी, प्रसिद्ध पत्रकार राजेश बादल की कलम से

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H-Mawal

तो दो हिस्सों में स्वर्गीय के एच मावल की कहानी आप पढ़ चुके हैं । अँगरेज़ फ़ोटो ग्राफ़र पी विक्टर के सिखाए गुर काम आ रहे थे । दूर दूर तक उनके चित्रों की धूम थी ।ऐसे में बीस जुलाई ,1928 को जन्में उनके बेटे एस के मावल ने कब ख़ामोशी से पिता के सुर में सुर मिला लिया ,किसी को पता न चला । एक दिन पिता दंग रह गए ,जब बालक एस के ने कैमरा तकनीक से जुड़े बड़े बारीक सवाल किए । पिता को अपना सच्चा उत्तराधिकारी मिल गया था ।यह उन्नीस सौ पैंतीस से चालीस के बीच का दौर था।

पिता एक के बाद एक नए नए कैमरे लाते रहे और एसके उन पर अपना हाथ साफ करते रहे । वैसे उनकी ड्यूटी बाक़ायदा कैमरों की सफ़ाई करने की ही थी । इसी बीच पिताजी को रियासत से दो तोहफ़े मिले । एक थी 1911 की बेरिस्टिन कार और दूसरी 18 इंच की मोटरसाइकल । यह मोटर साइकल फोल्डिंग थी और दूसरे युद्ध के दौरान जब जर्मन सैनिक पैराशूट से उतरते तो यह मोटर साइकल लादकर कूदते । नीचे आकर उसे फिट करते और उस पर बैठकर अपने मोर्चे – मिशन पर निकल जाते ।पिताजी ने इसके कई फोटो खींचे । आज भी ये दोनों गाडियाँ मावल ख़ानदान की धरोहर हैं । ये पिता ने अपने बड़े बेटे को सौंप दीं । छोटे बेटे याने एसके ने चित्रों के संसार में क़दम रख लिया।

बेटे की रुचि देख पिता ने एक के बाद एक कैमरे खरीदकर घर लाने का सिलसिला शुरू कर दिया । एक कैमरा 1897 का लाए । बीस डॉलर का था ।उन दिनों 20 डॉलर में बीस तोला सोना आता था ।इसके बाद एक कैमरा आया यूज़ एंड थ्रो । इसे टूरिस्ट कैमरा भी कहते थे । यह केवल एक डॉलर क़ीमत का था । इसमें रील लगी आती थी । जब सारी तस्वीरें उतर जातीं तो इसे वापस कंपनी भेजना पड़ता था क्योंकि रील निकालने के लिए कैमरा तोड़ना पड़ता था । इस तरह यह एक बार ही इस्तेमाल होता था । इन दोनों कैमरों की तस्वीर आप देख सकते हैं । आज बानवे – तिरानवे साल की उमर में एस के मावल एक एक घटना कुछ इस तरह बयान करते हैं मानो कल की ही बात हो।

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