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हिंदी साहित्य के कारोबार में कुछ लोचा है

Posted on: 14 Jan 2019 15:14 by Ravindra Singh Rana
हिंदी साहित्य के कारोबार में कुछ लोचा है

पत्रकार ऋषिकेश राजोरिया की कलम से

दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले में कई किताबों का लोकार्पण हुआ। कई लेखकों के उपन्यास जारी हुए, कहानियों की किताबें जारी हुईं और बड़े भाई जैसे मित्र हरीश पाठक की आंचलिक पत्रकारिता पर एक किताब भी बाजार में आ गई। यह इस तथ्य की ओर संकेत करता है कि लिखने वालों की कमी नहीं है। किताबें छप रही हैं और पुस्तक मेले में बिकने के लिए आ रही हैं। विभिन्न प्रकाशन, जो ज्यादातर दिल्ली में हैं, साहित्यिक किताबों का प्रकाशन करते हैं। जब इतनी किताबें लिखी जा रही हैं, छप रही हैं तो तय है कि पढ़ने वालों की संख्या भी बढ़ रही होगी, लेकिन अपने आसपास के वातावरण में ऐसा दिखाई नहीं देता।

बचपन में छोटे उपन्यास बहुत पढ़े, जिनका आकार भी छोटा होता था। उनको लाइब्रेरी से लाते थे। वैसे बच्चों के उपन्यास आने बंद हो गए हैं। लाइब्रेरियां बंद हो गई हैं। नई पीढ़ी में हिंदी की पठनीयता कम हो रही है। युवाओं का दिमाग ज्यादातर इंटरनेट और व्हाट्सएप में उलझ रहा है। एक जमाना था, जब गुलशन नंदा, रानू, प्रेम वाजपेयी, कर्नल रंजीत, ओमप्रकाश शर्मा, वेदप्रकाश कांबोज आदि लेखकों की किताबों से बुक स्टाल अटे पड़े रहते थे और वे खूब बिकती थी। ज्यादातर मेरठ और दिल्ली में छपने वाली इन किताबों को सस्ता साहित्य माना जाता था, लेकिन इनके माध्यम से हिंदी भाषी क्षेत्रों में लोगों को हिंदी पढ़ने की आदत बढ़ी और हिंदी का प्रचार प्रसार हुआ।

हिंदी साहित्य के क्षेत्र में यह विडंबना देखी गई है कि जो उपन्यास, कहानियां आदि किताबें साहित्य की श्रेणी में आती हैं, उनके प्रति आम हिंदी भाषी लोगों का रुझान नहीं बढ़ा। वे उच्च कोटि की ही बनी रही और उच्च कोटि के पाठक ही उन्हें पढ़ते हैं। बहुत ही कम किताबें ऐसी हैं, जो उच्च कोटि के साहित्य की श्रेणी में भी है और आम लोगों ने भी उन्हें पसंद किया। इस तरह हम कह सकते हैं उच्च कोटि के हिंदी साहित्य का जुड़ाव आम लोगों के साथ नहीं बना। हालांकि अब सस्ता साहित्य कहलाने वाले उपन्यास छपने करीब-करीब बंद हो गए हैं। उनके स्टार लेखक या तो गुजर गए हैं या काफी उम्रदराज हो चुके हैं। इसके बावजूद साहित्य की श्रेणी में आने वाली किताबों के प्रति आम लोगों का रुझान नहीं बढ़ा।

मुंशी प्रेमचंद, आचार्य चतुरसेन, गुरुदत्त, राही मासूम रजा, विजयदान देथा, रांगेय राघव सहित कई कालजयी लेखकों का दबदबा अभी भी बना हुआ है, उनकी किताबों के संस्करण छपते रहते हैं और बिकते रहते हैं। लोग पढ़ते हैं। पुस्तक मेले में साहित्य का जो माहौल दिखा और जो किताबें लोकार्पित हुईं, उनमें से बहुत कम ऐसी हैं, जो आम हिंदी पाठकों की रुचि के अनुकूल बैठती हैं। कई लोग स्वांतः सुखाय लिखते हैं और तिकड़म से किताब छपवा लेते हैं। कुछ लोगों को साहित्य के क्षेत्र में दुकानदारी करनी होती है, इसलिए भी वे कहानियां, उपन्यास लिखते हैं और अपनी जान-पहचान वालों के साथ हमप्याला होकर किसी ढंग के प्रकाशक से छपवा लेते हैं।

कुछ लोग अपनी रचनाएं खुद के खर्च पर छपवाते हैं और उसके विमोचन समारोह का खर्च भी खुद ही उठाते हैं। समाज के कुछ प्रतिष्ठित लोगों को अतिथि बनाकर किताब का विमोचन करवाकर अखबारों में खबरें छपवा लेते हैं। इस तरह साहित्यकार होने का अतिरिक्त तमगा उनके साथ जुड़ जाता है। ये लेखक ज्यादातर रेलवे, बैंक या ऐसे विभागों में नौकरी करने वाले होते हैं, जिनके पास लिखने के लिए काफी समय होता है।

इस तरह हिंदी साहित्य का विकास करने में भांति-भांति के लोग लगे हुए हैं। कुछ लोग साहित्य के प्रति समर्पित हैं। कुछ लोग ऐसे हैं जो पत्रकार की नौकरी करते हुए साहित्य के क्षेत्र में छलांग लगा गए हैं। बाकी असंख्य साहित्यकार ऐसे हैं, जिनकी कोई पूछपरख नहीं है। मैं बचपन से ही शिक्षकों, पत्रकारों, लेखकों और साहित्य से जुड़े लोगों के बीच रहा हूं, इसलिए मुझे इसका अनुभव है। कई शिक्षक ऐसे हैं, जो बहुत अच्छी कहानियां, कविताएं लिखते हैं, लेकिन उनका प्रकाशन नहीं हो पाता। कई लोग इसलिए किताबें नहीं छपवा पाते क्योंकि उनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होती और किताबें छपवाने के तौर तरीके उन्हें मालूम नहीं होते।

ज्यादातर हिंदी भाषी लोग साहित्य से दूर ही देखे गए हैं। स्कूल, कॉलेज में जो साहित्य पढ़ने को मिला, पढ़ लिया, इसके आगे कोई उत्सुकता नहीं। यह हिंदी भाषी समाज का एक सामाजिक दोष है। साहित्य में रुचि, उसके संस्कार बचपन से ही परिवार में विकसित होते हैं। विश्व में ऐसा कोई कॉलेज या विश्वविद्यालय नहीं है, जहां साहित्य में रुचि रखने का प्रशिक्षण मिलता हो। इसकी नींव बचपन में परिवार में ही पड़ती है। साहित्य में रुचि होने से भाषा सुधरती है। अभिव्यक्ति की क्षमता पैदा होती है। यह सब परिवार की स्थिति पर निर्भर करता है।

यही कारण है कि मराठी और गुजराती भाषाओं का साहित्य हिंदी से ज्यादा प्रचलित और लोकप्रिय है। हिंदी में किताबें बहुत छपती हैं, प्रचार भी बहुत होता है, लेकिन पढ़ता कौन है। पढ़ने के लिए समय चाहिए, यह बात सही है, लेकिन अगर रुचि हो तो वह समय की जरूरत का अतिक्रमण कर जाती है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है ओशो की किताबें, जो किसी भी हिंदी साहित्यकार की किताबों से ज्यादा पढ़ी जाती है। मराठी और गुजराती भाषी लोग हिंदी भाषियों से ज्यादा साहित्य पढ़ते हैं। उनके लेखक संगठन सरकारी मदद से नहीं चलते। उनको तथाकथित लिटरेचर फेस्टिवल करने की जरूरत भी नहीं पड़ती।

इसलिए हम कह सकते हैं कि हिंदी साहित्य के कारोबार में कुछ लोचा है, जिसमें प्रकाशन करने वाले सेठ, अखबारों में काम करने वाले लेखकों, प्रोफेसरों, सरकारी अफसरों सहित कई पढ़े-लिखे लोगों की भूमिका है। इन सब लोगों ने मिलकर हिंदी साहित्य को एक ढर्रे में बांधकर अपने निजी हित के कारोबार में तब्दील कर दिया है, जिसकी वजह से हिंदी साहित्य जनता की आवाज के रूप में सामने नहीं आ पा रहा है। यह हिंदी साहित्य का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है।

 

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