प्रदेश अध्यक्ष से लेकर संगठन महामंत्री तक पहुंची चुनाव की कमियां

भाजपा में चुनाव यानी घर मे बेटी का ब्याह। जो हालत बेटी के ब्याह में पिता की होती है, ठीक वैसे ही हालात नगर संगठन ओर उससे जुड़े नेताओ की रहती है। पसीना पसीना। रत्तीभर समय नही।

नितिनमोहन शर्मा

भाजपा में चुनाव यानी घर मे बेटी का ब्याह। जो हालत बेटी के ब्याह में पिता की होती है, ठीक वैसे ही हालात नगर संगठन ओर उससे जुड़े नेताओ की रहती है। पसीना पसीना। रत्तीभर समय नही। कभी इधर भागना तो कभी उधर। खाना पीना तो दूर, सोने आराम करने तक का वक्त नही। ऐसा होता भी आया है अब तक लेकिन इस चुनाव में संगठन वैसे ही इत्मिनान से था जैसे ब्याह का काम ठेके पर केटर्स को दे दिया हो। ये सर्वविदित है कि केटर्स के हाथों बने भोजन में वो स्वाद महक महसूस नही होती जो स्वयम की देखरेख में हलवाई द्वारा बनाये भोजन प्रसादी में आती है।

अतिथियों का पेट तो दोनो स्थिति में भर जाता है लेकिन तृप्ति आपकी देखरेख में बने भोजन से ही प्राप्त होती है। ठीक इसी तरह भाजपा चुनाव तो जीत जाएगी लेकिन इस जीत की महक ओर स्वाद फीका रहना है क्योकि इस जीत में “घर धणी”का न अनथक परिश्रम न मान मनुहार शामिल हुई। न घर के “बड़े बूड़ो” को सम्मान मिल पाया।

चूंकि मामला बेटी के ब्याह यानी चुनाव का था लिहाजा उपस्थित तो होना है…ओर हो गए। अब पार्टी में चिंता इस बात की है कि भविष्य में ऐसी नोबत कभी न बने। ये चिंता इंदौर से होते हुए भोपाल तक पहुंच गई है। खुलासा फर्स्ट के खुलासे ने प्रदेश संगठन महामंत्री हितानंद शर्मा और प्रदेश अध्यक्ष वी ड़ी शर्मा को चिंता में डाल दिया है। दोनो नेताओ ने अपने विश्वस्तों के जरिये इंदौर चुनाव का फीडबैक लेना शुरू कर दिया है।

रतलाम का प्रभार, इंदौर में क्यो??

पार्टी के स्थानीय संगठन मंत्री रहे ओर फ़िलहाल इंदौर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष जयपालसिंह चावड़ा से इस चुनाव में खासी उम्मीद थी। सन्गठन को जीने वाले चावड़ा को निकाय चुनाव में संगठन की तरफ से रतलाम का प्रभार मिला था। वे इंदौर में डटे रहे। वे मंचों पर तो शोभायमान होते रहे लेंकिन पार्टी की चूनावी जमावट से दूर रहे। उनसे उम्मीद थी कि वे मतदाता सूची जैसे गम्भीर मसले पर फोकस करेंगे।

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इसके पहले हुए चुनावो में बाबूसिंह रघुवंशी जैसे तपे ओर अनुभवी नेता मतदाता सूची जैसे अहम काम सम्भाल लेते थे। अनेक आपत्तियां समय रहते जिला प्रशासन तक पहुंचती थी। इस बार ऐसा नही हुआ और परिणाम ये है कि आज पार्टी के एक विधायक आकाश विजयवर्गीय सहित पूरी पार्टी इस मुद्दे पर निर्वाचन आयोग के सामने शिकायत लहजे में उपस्थित है।मतदाता सूची की गड़बड़ी का ये मसला इंदौर चुनाव का बड़ा मुद्दा बन गया है।

बाहर से आकर ज्यादा मेहनत कर गए कैलाश

स्थानीय सूरमाओं से ज्यादा बेहतर परफार्मेंस तो बाहर से इंदौर आकर कैलाश विजयवर्गीय में दे दिया। अनेक वार्ड के वो रोड शो कर गए। कई वार्डो में कार्यालय उदघाटन समारोह के शामिल हो कार्यकर्ताओं में जोश फूंक गए। बगेर किसी पूर्वाग्रह के वे सब वार्डो में गए। अल्पसंख्यक इलाको में भी अपना मूवमेंट रखा। मतदान के लिए मौसम को लेकर वीडियो भी जारी क़िया। निगम की उपलब्धियों के साथ मीडिया से रूबरू भी हुए। त्रिपुरा जैसे सुदूर पूर्वोत्तर राज्य के उपचुनाव के दायित्व के बाद भी उन्होंने इंदौर चुनाव पर पूरा फोकस किया।

“अनुभव” से सवांद बनाया ही नही, रो दिए बरसो से कम करने वाले

नगर इकाई ने उन पुराने और तपे तपाये नेता और कार्यकर्तओं से संवाद स्थापित ही नही किया जो बरसो से पार्टी के लिए काम कर रहे है। पुराने अनुभवी नेताओ का कहना है कि पार्टी में उम्र का पैमाना क्या हुआ…ऐसे लोगो से बातचीत भी नही होगी? क्या ऐसा भी पैमाना बना दिया गया है?? ऐसे सब अनुभवी आख़री दम तक इंतजार करते रहे कि दीनदयाल भवन से शायद कोई फोन आये कुछ काम मिले।

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कोई जिम्मेदारी मिले। लेकिन निराशा तक हाथ आई। खुलासा फर्स्ट से बात करते हुए ऐसे कई नेताओं की आंखे तक ये कहते हुए छलक गई की सोचा न था कि पार्टी में हम इतने अछूत हो जाएंगे। मतदान वाले दिन की दास्तां बया करते हुए विधनासभा एक के एक पुराने नेता का कहना था कि हालत ये थी कि जिन्हें टिकट दिया उन्हें अपने इलाके का भौगोलिक ज्ञान तक नही था।

कहा थे मोर्चा प्रकोष्ठ ओर उनकी फौज??

भाजपा के स्थापमा काल के बाद से ये पहला ऐसा चुनाव था जिसमे मोर्चा प्रकोष्ठ की कोई भूमिका तो दूर, इससे जुड़े नेता भी नजर नही आये। युवा मोर्चा के स्थापना काल से नारा है-एक मतदान…दस जवान। यहां दस यूथ यानी जवान तो दूर मोर्चा अध्यक्ष ही क्या कर रहे थे कुछ पता नही। नगर इकाई ने क्यो नही मोर्चा को शहर स्तर की एक बड़ी वाहन रैली निकालने को कहा ताकि वातावरण बनता। एक मात्र रैली निकाली जो राजमोहल्ला से मात्र राजबाड़ा तक थी और वो भी पूरी तरह फ्लॉप। चुनाव में प्राण फूंकने ओर वातावरण तैयार करने का काम इन्ही मोर्चा प्रकोष्ठ का रहता आया है लेकिन इस बार सब नदारद था।

महिला मोर्चा कहा था? मोर्चा अध्यक्ष की क्या भूमिका थी?कितनी ओर कहा बैठके हुई? किसी को पता है? कोई रिकार्ड है। महिला मोर्चा की तो टीम तक का अभी पूरी तरह गठन भी नही हुआ। व्यापारिक प्रकोष्ठ ने कितनी बैठके की सिवाय एक पार्टी कार्यालय पर करने के जिसमे भी भीड़ दिखाने के लिए चुनाव कार्यालयों पर बेठे लोग बुलाकर बैठा दिए गए। प्रदेश की व्यावसायिक राजधानी कहे जाने वाले शहर इंदौर में पार्टी का व्यापारिक मोर्चा एक भी आयोजन रविन्द्र नाट्य गृह जैसी जगह नही कर पाया।

ऐसा नही की नगर इकाई में इन मोर्चा प्रकोष्ठ को काम नही सौपा। सबको काम दिए लेकिन जिन्हें मोर्चा प्रकोष्ठ की कमान दी, उनमें इतनी क्षमता ही नही थी कि वे अपने दायित्व के साथ न्याय कर सके। एक भी टिकिट नही देकर पार्टी में अल्पसंख्यक मोर्चा के प्राण तो टिकिट वितरण वाले दिन ही हर लिए। बावजूद इसके मोर्चा नेता उम्मीद से थे कि पार्टी उनसे संपर्क संवाद स्थापित करेगी लेकिन उनके खाते में इंतजार ही जमा हुआ।

औसत कार्यकर्ता को थका दिया, असर वोटिंग पर पड़ा

ये पार्टी की पुण्याई है कि आज भी पार्टी के पास ऐसे कार्यकर्ता है जो पूरी निष्ठा के साथ चुनाव में लगे थे। लेकिन पार्टी के विभिन्न कार्यक्रमों, बैठकों, आंदोलनों ओर धन संग्रह जैसे कामो ने उन्हें बुरी तरह थका दिया और जब वोटिंग वाले दिन उनके परफार्मेंस की बारी आई तो ये थकान आड़े आ गई। साल डेढ़ साल से लगातार कार्यक्रम बैठकों ओर लक्ष्य आधारित अभियान में उन्हें झोंका जा रहा था। हर दिन बैठक। कभी प्रत्यक्ष कभी वर्चुअल। कभी किसी नेता का लाइव सुनो तो कभी किसी का।

इस सबके जरिये पार्टी कार्यकर्ताओं को चार्ज करने जा रही थी। परिणाम उल्टा हुआ और वे वक्त आने पर थकान के कारण डिस्चार्ज हो गए। बार बार बूथ की बैठकों ने बूथ पर काम करने वालो को भी बिदका दिया कि काम धंधा करे कि ये ही करते रहे। बूथ पर आमतौर पर छोटा और जमीनी कार्यकर्ता जुटता है जिसे रोज खाना कमाना भी है। अब वो ” साहब बहादुर” बन बेठे नेताओ की कब तक दुकान चमकाए? जो अपने नम्बर उपर बड़ा रहे थे नीचे की खोखली तस्वीरे दिखाकर।

मंडल अध्यक्षो की भूमिका भी संदिग्ध, नगर महामंत्री चुनाव में

पार्टी संगठन के प्राण मंडल अध्यक्ष इस चुनाव में अपनी भूमिका के साथ न्याय नही कर पाए। कई मंडल अध्यक्ष तो खुद ही चुनाव लड़ने की दौड़ में थे। जिन्हें टिकिट नही मिला वो मंडल मुखिया होकर भी पार्टी की जमीन खराब करने में लगे रहे। नंबर इकाई में अध्यक्ष के बाद सबसे अहम महामंत्री की भूमिका होती है।

पार्टी के पास 3 महामंत्री थे। दो तो चुनाव ही लड़ रहे थे। संदीप दुबे की पत्नी मैदान में थी सविता अखण्ड स्वयम चुनाव लड़ रही थी। बचे सुधीर कोल्हे। उन्होंने अपने क्षेत्र में जमकर पसीना बहाया। जबकि पार्टी उनके परिवार में टिकट दे रही थी लेकिन उन्होंने एक व्यक्ति एक पद की पार्टी लाइन का पालन किया और चुनाव से इनकार कर दिया। इसके उलट प्रणव मंडल नगर उपाध्यक्ष होने के बाद भी चुनाव लड़ लिए। संदीप भी महामंत्री होने के बाद टिकिट पा गए।