कीर्ति राणा

नाम भले ही बेवजह टेअरर का प्रतीक बना दिया हो लेकिन बड़े भैया थे दिल के साफ।मैंने उन्हें नजदीक से देखा, पारिवारिक कार्यक्रमों में भी शामिल होता रहा, वो मोहब्बत करना, रिश्ते निभाना भी जानते थे। आज तो भाजपा का झंडा उठाने वाले हिंदू-मुस्लिम कार्यकर्ता आपस में बंटे हुए से नजर आते हैं लेकिन बड़े भैया और खुरासान पठान की मित्रता मिसाल रही है। इन दोनों की दोस्ती में ना पार्टी आड़े आई ना मजहब।दीवाली और ईद एक-दूसरे ने मिल कर मनाई तो इनके बच्चों के विवाह में दर्शनाभिलाषी में दोनों की पत्रिकाओं में एक दूसरे के नाम प्रमुखता से रहते हैं।

जनसंघ से भाजपा में तब्दील हुई पार्टी की इंदौर सहित ग्रामीण क्षेत्रों में जड़ें मजबूत करने में बड़े भैया का भी खून-पसीना-पैसा-दमखम भी लगा है।बड़े भैया ने सहकारिता से जुड़े चुनावों में तो अपना दबदबा कायम रखा ही इस क्षेत्र में भी पार्टी के लिए जमीन तैयार की। सांसद और विधायक बनने की हसरत उनकी तो पूरी नहीं हुई किंतु पार्षद का चुनाव जीत कर राजेंद्र और संजय ने उनके नाम को आगे बढ़ाया और शुक्ला परिवार से पहले विधायक के रूप में संजय शुक्ला ने उनकी ख्वाहिश पूरी कर दी।

वो 1990 का विधानसभा चुनाव था।तब उनके समर्थकों और ब्राह्मण-खास कर कान्यकुब्ज-वर्ग को लग रहा था इंदौर के क्षेत्र क्रमांक दो से बड़े भैया चुनाव जीत जाएंगे। कांग्रेस के गढ़ माने जाने वाले श्रमिक क्षेत्र (विधानसभा 2) से पार्टी ने टिकट तय कर दिया, सामने थे इंदौर के शेर कहे जाने वाले कांग्रेस के कद्दावर नेता सुरेश सेठ। माना जा रहा था बड़े भैया की जीत तो तय है। ’एक दिन प्रत्याशी के साथ’ रिपोर्टिंग के लिए मुझे दो नंबर में बड़े भैया के चुनाव प्रचार को कवर करना था।

सुबह से शाम तक बड़े भैया जिन भी बस्तियों-कालोनियों में गए, मैं भी पीछे-पीछे चलता रहा।उनका चुनाव संचालन भी बेहतर था लेकिन जैसा कि प्रत्याशी के अति उत्साही समर्थक करते हैं, बड़े भैया की टीम के पहलवान किस्म के समर्थक जिनके बोल-व्यवहार में ही हेकड़ी झलकती थी, उन पर नियंत्रण में चूक होती रही। बड़े भैया का काफिला पहुंचने से पहले उन मोहल्लों-कॉलोनियो-बस्तियों में घर घर हार लेकर पहुंच जाते और पहलवानी अंदाज में अबे-तुबे के साथ आदेशात्मक लहजे में समझाते बड़े भैया आ रहे हैं, स्वागत करना है, ये लो हार पकड़ो।

उस दिन की रिपोर्टिंग में मैंने अपरोक्ष रूप से संकेत कर दिए थे कि बड़े भैया यदि चुनाव नहीं जीत पाएं तो एक बड़ा कारण उनके आगे-पीछे चलने वाली काले-पीले लोगों की यह टीम भी रहेगी।बड़े भैया तो मुझे पहचानते ही थे, उनके दोनों बेटे राजेंद्र और संजय भी मेरा सम्मान करते हैं।यह आंखों देखा हाल प्रकाशित हुआ तो शुक्ला खेमे में खलबली मचना ही थी। भास्कर से रात में लौटते हुए रोज की तरह अगली रात दो-ढाई बजे राजवाड़ा पर अन्ना भैया की पान दुकान वाले पटिये पर बैठा था।

कुछ देर में ही बड़े भैया और उनकी टीम के साथी कार-जीपों आदि से राजवाड़ा पहुंचे। बड़े भैया जैसे ही गाड़ी से उतरे, उनके एक पहलवान साथी ने मेरी तरफ इशारा करते हुए उनके कान में कुछ कहा। वो अन्ना भैया के पास पहुंचे, पान खाने के दौरान मेरी दुआ सलाम हुई। वो बोले राणाजी आज आप के भास्कर में हमारे खिलाफ कुछ छपा है क्या? मैंने कहा हां बड़े भैया मैंने ही लिखा है कि आप यदि हारे तो क्या कारण रहेंगे। वो मुस्कुराए, बोले अरे आप तो परिवार के आदमी हो, मैं सॉलिड जीत रहा हूं।

बात आई-गई हो गई। मतदान वाले दिन नंदानगर क्षेत्र में कुछ पोलिंग बूथ पर कब्जे की प्लानिंग की सूचना लगते ही तत्कालीन एसपी सुरजीत सिंह ने मोर्चा सम्हाल लिया। हाथ में मोटा रूल लिए वो उन गलियों-मकानों में फोर्स के साथ पहुंच गए जहां वोट डलवाने के लिए अन्य क्षेत्रों के लोगों को ठहराए जाने की सूचना मिली थी। इन सब को खदेड़ने के साथ ही पोलिंग बूथ पर फोर्स भी बढ़ा दिया गया, सारी प्लानिंग फेल हो गई।

तब मतगणना होती थी मोतीतबेला स्थित कलेक्टोरेट प्रांगण में।इंदौर सहित पूरे प्रदेश की नजर क्षेत्र क्रमांक दो के परिणाम पर लगी हुई थी। सुरेश सेठ के चुनाव जीतने की घोषणा हुई। दोनों प्रत्याशी मीडिया सेंटर में चर्चा और आभार व्यक्त करने आए। बड़े भैया ने भी सबका आभार माना और जाते हुए मुझे गले लगाया और कान में धीमे से बोले राणाजी आप ने सही लिखा था। पता नहीं मैंने सही लिखा था या पुलिस प्रशासन नहीं चाहता था कि बड़े भैया जीत कर कहीं गृह मंत्री बन गए तो उन्हें सैल्यूट ना करना पड़े या उन्हें टिकट देने के दबाव का बदला भाजपा के प्रदेश नेताओं ने इस तरह लिया।(लेखक सांध्य दैनिक ‘हिंदुस्तान मेल’ के समूह संपादक हैं)