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स्टैच्यू आॅफ यूनिटी: इसकी ‘ऊंचाई’ तो भावी इतिहास तय करेगा!

Posted on: 02 Nov 2018 10:10 by Ravindra Singh Rana
स्टैच्यू आॅफ यूनिटी: इसकी ‘ऊंचाई’ तो भावी इतिहास तय करेगा!

पता नहीं ये सवाल किसी ने न्यूयाॅर्क में स्टेच्यू आॅफ लिबर्टी, चीन के लुशान में स्प्रिंग टेम्पल आॅफ बुद्धा, रूस में ‘मदरलैंड काॅल्स, ब्राजील की ‘क्राइस्ट द रीडीमर’ या फिर भारत में ही ताजमहल के निर्माण के समय किया था या नहीं ‍कि इतने पैसा खर्च करने का क्या मतलब है? यह ‍तो बर्बादी है। इतने धन में तो कई अस्पताल बन जाते, कई धर्मशालाएं तन जातीं, कई बांध बन जाते, कई हाथों को काम मिल जाता, कइयों के भूखे पेट को रोटी मिल जाती। यकीनन इन सवालों का जवाब यही होगा कि इतने पैसों से हजारों लोगों की भौतिक जरूरतें पूरी हो जातीं। लोग खा-पी कर सुखी हो जाते। हरि गुण गाते। लेकिन इस तरह खजाने खोलने से संस्कृति की प्यास नहीं मिटती। सभ्यता के अरमानो को एक अमिट अभिव्यक्ति नहीं मिलती।

कुछ ऐसे ही सवाल इन दिनो गुजरात में नर्मदा तट पर स्थित केवडिया में लौह पुरूष सरदार वल्लभ भाई पटेल की विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा ‘स्टैच्यू आॅफ यूनिटी’ को लेकर उठाए जा रहे हैं। वो ये कि आखिर 3 हजार करोड़ खर्च कर सरदार की इस असरदार मूर्ति को स्थापित करके देश और खासकर उस इलाके के आदिवासियों को क्या मिलेगा? केवल एक भौंचक कर देने वाला उत्तुंग शिल्प या फिर रोटी-कपड़ा-मकान? इसी सवाल को लेकर केवडिया के स्थानीय आदिवासियों ने अपने 72 गांवों में प्रतिमा अनावरण के दिन 31 अक्टूबर को घरों में चूल्हा नहीं जलाया।

उनका कहना था कि उन्हें उजाड़ कर सरदार को स्थापित करना अमानवीय है। इसमें छुपा संदेश यह था कि ‘स्टैच्यू’ की स्थापना को लेकर देश में ही ‘यूनिटी’ नहीं है तो ऐसे स्टैच्यू का क्या मतलब? इस विशाल प्रतिमा पर कई राजनीतिक सवाल भी उठे कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस प्रतिमा पा‍ॅलिटिक्स के जरिए अपना कद बढ़ाना चाहते हैं, भले ही उनका वास्तविक कद क्या है, यह अभी तय होना है। विदेशी मीडिया ने सरदार की प्रतिमा को मोदी के ‘राजनीतिक अंहकार’ का प्रतीक माना तो पाकिस्तान ने इसे ‘भारत के राष्ट्रवादी जोश का विस्फोट’ करार दिया। चीनी मीडिया ने इसे अलग- थलग पड़े सरदार सरोवर प्रोजेक्ट की अनदेखी बताया तो‍ ब्रिटिश मीडिया का मानना था ‍िक इतना पैसा प्रतिमा पर फूंकने के बजाए जनकल्याण के कार्यों कर खर्च होता तो बेहतर होता। मोटे तौर पर विदेशी मीडिया की राय यह थी कि सरदार प्रतिमा का अनावरण दरअसल भाजपा के ‘मिशन-2019’ का आगाज है। अमेरिकी अखबार ‘वाशिंगटन पोस्ट’ की राय में इस प्रतिमा के जरिए मोदी तीन मोर्चों पर जीत हासिल कर सकते हैं। ये हैं, अपने हिंदू राजनीतिक आधार की स्वीकृति, अपने गृह राज्य गुजरात में एक ऐतिहासिक स्थल और भारत की बढ़ती वैश्विक शक्ति के रूप में पहचान।

खुद भारत में सरदार की प्रतिमा स्थापना को लेकर भाजपा द्वारा कांग्रेस के महापुरूषों को हाईजैक करने तथा उनके माध्यम से अपने राजनीतिक हित साधने के आरोप लगे। उधर मोदी ने इसे एक मुख्यमंत्री के रूप में देखे गए अपने विराट स्वप्न का साकार होना बताया। हालांकि अपने भाषण में वे सरदार पटेल के व्यक्तित्व और कृतित्व की महानता की व्याख्या से ज्यादा उसकी राजनीतिक मार्केटिंग करते ज्यादा दिखे। इस प्रतिमा के पूर्ण होने के पहले सोशल मीडिया पर कुछ बेहूदा कैम्पेन भी चले, इनमें खास था सरदार की प्रतिमा का चीनी लुक। किसी ने माॅर्फिंग कर के यह साबित करने की कोशिश की कि मोदी सरकार गुजराती पटेल सरदार की चीनी लुक वाली प्रतिमा स्थापित करने जा रही है। प्रतिमा के चीन में निर्माण को लेकर ‘मेक इन ‍इंडिया’ पर भी सवाल उठे।

जबकि हकीकत यह थी ‍िक इतनी विशाल प्रतिमा के ‍िनर्माण के लिए जरूरी कार्यशाला ( फौंड्री) चीन में ही उपलब्ध है। सरदार की इस प्रतिमा का निर्माण भारत के जाने-माने शिल्पकार राम वी. सुतार ने किया है न ‍कि किसी चीनी कलाकार ने। इसके वास्तुविद भी एक भारतीय जोसेफ मन्ना हैं। इस समूचे प्रोजेक्ट का सुपरविजन दुबई में बुर्ज खलीफा का निर्माण करने वाली कंपनी टर्नर कंस्ट्रक्शन माइकल ग्रेव्स एंड एसोसिएट्स एवं मिनहार्ट ने किया। प्रतिमा स्थल का विकास और निर्माण कार्य भारत की एलएंडटी कंपनी के जिम्मे था। केवल प्रतिमा की एसेम्बलिंग के लिए चीनी मजदूर भारत आए थे। पूरी मूर्ति 25 हजार टुकड़ों में यहां पहुंची, जिन्हें आपस में सफाई के साथ जोड़ा गया। प्रतिमा निर्माण का अधिकांश पैसा भारत सरकार ने ‍दिया । भाजपा ने प्रतिमा के लिए लोहा इकट्ठा करने का एक देशव्यापी अभियान चलाकर काफी लोहा इकट्ठा किया गया था। लेकिन राजनीतिक लोहा असली लौह प्रतिमा बनाने के काम नहीं आता। इसलिए नए सिरे से मजबूत लोहा आयात किया गया। एलएंडटी ने पूरा काम रिकाॅर्ड समय में पूरा किया।

सरदार के अपने देश में उनकी प्रतिमा को लेकर जितने सवाल उठे और जैसे आरोप लगे, उतने तो शायद तब भी नहीं लगे होंगे, जब वे देश की पौने छह सौ रियासतों का साम-दाम-दंड-भेद से भारत संघ में विलय करवा रहे थे। इसका एक कारण खुद भाजपा और मोदी हैं। क्योंकि सरदार की मूर्ति इसलिए भी स्थापित की जा रही थी कि कांग्रेस ने अपने इस कद्दावर नेता वो ऊंचाई कभी नहीं बख्शी जो पंडित जवाहरलाल नेहरू को दी जाती रही है। जबकि भारत के एकीकरण में सरदार का अहम रोल था। सरदार ने भारत जो जोड़ा तो नेहरू ने भारत को गढ़ा। सरदार गुजराती अस्मिता के प्रतीक भी हैं। पिछले कुछ सालों से वो पिछड़ों के सबसे बड़े नेता भी बन गए हैं। सवाल यह भी उठा कि सादा और मूल्यनिष्ठ जिंदगी जीने वाले सरदार को मूर्तिमंत बनाने पर तीन हजार करोड़ ‘बर्बाद’ करने के क्या मायने?

खुद सरदार के परिजनों ने कहा कि अगर सरदार को पता होता तो कि इतने हजार करोड़ खर्च कर उनकी छवि को ऐतिहासिक बनाया जा रहा है तो वे ऐसा सम्मान कभी स्वीकार न करते। जिस सरदार को पैबंद लगी बंडी पहनने में झिझक न रही हो, वह चीन में बने ( प्रतिमा के )‘कपड़े’ पहन कर क्यों इतराता ?

मान लें कि मोदी ने यह सब खुद को ‘आज का सरदार’ और ‘आधुनिक लौहपुरूष’ बताने की नीयत से यह सब किया। यह भी स्वीकारा जा सकता है कि पटेल को नेहरू के मुकाबिल ज्यादा बड़ा नेता साबित करने की राजनीतिक चाल इसकी नींव में थी। इसे भी मान लें कि मध्यमार्गी कांग्रेस में भाजपा और आरएसस ने सरदार के माथे पर भगवा गुलाल रचा देखा। हो सकता है कि दोनो की भावी सत्ताकांक्षाएं भी सरदार के दृढ़ व्यक्तित्व की तरह दीर्घकाल तक फलित होती रहें। लेकिन इन सब से हटकर हमे यह तो मानना ही चाहिए कि भारतीय सरदार पटेल की यह विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा भारतीय शिल्प कला, भारतीय इंजीनियरिंग और भारतीय संकल्प शक्ति और भारतीय विजन का भी बेमिसाल नमूना है। ऐसी प्रतिमाएं सालों में बनती हैं और सदियों तक रहती हैं। सरदार किसके राजनीतिक लाॅकर की पूंजी हैं, सरदार अब किसको सियासी डिविडेंड देंगे, सरदार की प्रतिमा महज फिजूलखर्ची है, सरदार उतने बड़े थे ही नहीं, जितनी कि उनकी प्रतिमा है, ये तमाम सवाल अब इसलिए गैरजरूरी हैं कि एक अद्भुत प्रतिमा ने अपने भीतर इतिहास, कला, संस्कृति और सभ्यता को समेट लिया है। हम चाहें तो उसमें राजनीतिक या दूसरे चाहे-अनचाहे रंग भी तलाश सकते हैं।

दुनिया के तमाम चमत्कारी और अन्यतम वास्तुशिल्प किसी तात्कालिक लाभ के लिए शायद ही रचे गए हों। हों भी तो उनकी व्याप्ति किसी कालखंड तक सीमित नहीं रहती। सरदार पटेल के इस अप्रतिम शिल्प के औचित्य का वास्तविक आकलन तो आने वाली नस्लें करेंगी, जिन्हें अपने पूर्वजों की संकल्प शक्ति का दर्शन इस रूप में होगा। राजनीतिक हानि-लाभ और व्यक्तिगत अहंकार, आग्रह-दुराग्रह और महत्वाकांक्षाएं तो इसके आगे बहुत बौनी हैं। सरदार की विरासत पर दावे भी ‘मेरे पास मां है..!’ जैसे डायलाॅग से ज्यादा अहमियत नहीं रखते। हो सकता है कि भारतीय इतिहास के एक और महानायक शिवाजी की निर्माणाधीन प्रतिमा सरदार की उच्चतम मूर्ति के वैश्विक कीर्तिमान को जल्द ही खंडित कर दे, लेकिन शिवाजी के ‘हिंदवी स्वराज्य’ की संकल्पना को सरदार ने शिवाजी के ढाई सौ साल बाद पूरी निष्ठा के साथ साकार करने का प्रयास किया, इसे कौन झुठला सकता है?

अजय बोकिल की कलम से

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