शाह राजनीति करें, मगर देश की बुनियाद को तो न हिलाएं! अजय बोकिल की कलम से

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Amit-Shah-

सबरीमाला मंदिर के बहाने देश की न्याय पालिका को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यकक्ष अमित की यह नसीहत कि अदालतें ऐसे फैसले दें, जिनका पालन कराया जा सके, वास्तव में भारतीय संविधान को ही दी गई खुली चुनौती है। शाह ने केरल के कुन्नूर में आयोजित सभा में सार्वजनिक रूप से कहा कि न्यायालयों को निर्णय देते समय जन भावनाअों और धार्मिक आस्थाअों का ध्यान रखना चाहिए। शाह के इस बयान की विपक्ष ने तीखी आलोचना की। इसने देश के विचारवान लोगों को भी विचलित किया। क्योंकि जो बात कही गई, वह केवल सबरीमाला मंदिर में रजस्वला ‍स्त्रियों के प्रवेश पर प्रतिबंध और इस परंपरा को हर हाल में चालू रखने के आग्रह ( या दुराग्रह ?) तक सीमित नहीं है। यह किसी धर्म विशेष की हर अच्छी-बुरी बातों को सिर झुका कर मान लेने की मूढ़ता भी नहीं है। न ही यह केरल के हिंदुअों को एकजुट करने तक महदूद है, बल्कि यह बयान इस सोच को भी दर्शाता है कि हम एक बहुरंगी और बहुधर्मी भारत को किस रूप में संगठित, संयोजित और संचालित करना चाहते हैं।

क्योंकि जब अदालतें भी सत्तारूढ़ दल की राजनीतिक सुविधा से फैसले देने लगेंगी तब देश की जनता के न्याय पाने के अधिकार का क्या होगा? कोई भी सत्तारूढ़ दल या उसे गाइड करने वाला कोई व्यक्ति अथवा संगठन ही तय कर देगा कि किस मामले में कोर्ट को क्या फैसला देना है, देना है कि नहीं या फिर कब और किस मौके पर देना है। शाह का बयान केवल हिंदुअों की धार्मिक आस्थाअों का प्रतिबिम्ब भर नहीं है, वह सीधे-सीधे कोर्ट के लिए फतवा है कि काम करना है तो ‘ऐसे’ करें, क्योंकि यही लोकसम्मत है। कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने इसे कोर्ट के कानूनी विवेक का अपमान बताया तो बसपा सुप्रीमो मायावती ने शाह के बयान को ‘अति निंदनीय’ बताते हुए कहा कि इससे देश का लोकतंत्र ख़तरे में है। इसके पूर्व केरल के मुख्यमंत्री और माकपा नेता पिनराई विजयन ने कहा कि शाह का बयान संविधान और कानून के खिलाफ है।

अमित शाह ने ऐसा बयान क्यों दिया, केरल में ही क्यों दिया और सबरीमाला मंदिर के संदर्भ में ही क्यों दिया, इन सवालों के जवाब ढूंढने से पहले सबरीमाला प्रकरण को समझें। सबरीमाला मंदिर केरल के पेरियार बाघ अभयारण्य में पहाडि़यों की सुरम्य श्रृंखला में 1574 फीट ऊंचे शिखर पर बना है। यह स्वामी अयप्पा का मंदिर है। अयप्पा षष्ट देवता हैं, जो हरि और हर ( विष्णु और शिव) की संतान हैं। ‘षष्ट’ से तात्पर्य शिक्षक या मार्गदर्शक से है। दार्शनिक रूप से यह हिंदुअों के शैव, वैष्णव, शाक्त और श्रमण परंपरा का संगम भी है। हर साल यहां तीन करोड़ तक श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। मंदिर बहुत प्राचीन है, लेकिन इसका जीर्णोद्धार 1950 में हुआ।

इस मंदिर में हर साल नवंबर से जनवरी तक, श्रद्धालु भगवान अयप्पा के दर्शन के लिए भक्त उमड़ पड़ते हैं। माना जाता है कि भगवान अयप्पा ब्रह्मचारी हैं, इसलिए रजस्वला महिलाअोंका प्रवेश यहां वर्जित है। बताया जाता है कि 1991 में केरल हाई कोर्ट के एक फैसले के पहले तक महिलाएं यहां दर्शन के लिए आती थीं। लेकिन हाई कोर्ट द्वारा पुरानी परंपरा को सही ठहराने के बाद मंदिर के संचालक त्रावनकोर देवस्वम बोर्ड ने 10 से 50 वर्ष तक की महिलाअों का प्रवेश पूरी तरह वर्जित कर दिया। मामला सुप्रीम कोर्ट गया और सर्वोच्च अदालत ने हाई कोर्ट के फैसले को रद्द कर संविधान में लैंगिक समानता के आधार पर सभी आयु की महिलाअोंके प्रवेश को अनुमति दे दी। इस फैसले से उन धार्मिक परंपरावादियों को ठेस लगी, जो हाई कोर्ट के फैसले को ही आस्था के अनुकूल मानते रहे हैं, लेकिन वो लोग खुश हुए, जिन्हें मंदिर की यह अजब परंपरा स्त्री-पुरूष समानता और ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, रमंते तत्र देवता’ की वैदिक भावना के खिलाफ लगती थी।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राज्य में सत्तारूढ़ लेफ्टद सरकार ने तय ‍िकया कि वह इसे लागू कराएगी। इसका उसे राजनीतिक लाभ भी मिल सकता था। ऐसे में बरसों से केरल की राजनीतिक जमीन पर भगवा धान उगाने की कोशिश में लगी भाजपा को यह मुद्दा ‘छींका टूटने’ जैसा लगा। उसने परंपरावादियों का साथ देने का फैसला किया। बगैर यह देखे या सोचे कि जब ब्रह्मचारियों के सबसे बड़े देवता हनुमान के मंदिर में भी ‍किसी महिला का प्रवेश वर्जित नहीं है तो अयप्पा के दरबार में इसका क्या औचित्य है? भाजपा को लगा कि इसी ‘हिंदू आस्था के अपमान’ की बुनियाद पर राज्य में भगवा वोटों का ध्रुवीकरण ‍िकया जा सकता है। इसी मुद्दे पर राज्य की कम्युनिस्ट सरकार को धर्म संकट में डाला जा सकता है और इसी मसले पर केरल के हिंदुअो की आत्मा को इस आधार पर झकझोरा जा सकता है कि वे तय कर लें कि वे पहले हिंदू हैं या कामरेड ?

बेशक वोटों की रणनीति के हिसाब ये दांव तगड़ा है और उतना ही जोखिम भरा भी। पार्टी ने राज्य में सबरीमाला यात्रा निकालने की घोषणा भी कर दी है। हो सकता है कि भाजपा राज्य की 55 फीसदी हिंदू आबादी में इसी बहाने अपनी पैठ बनाने में कामयाब भी हो जाए, लेकिन शाह ने इसकी आड़ में समूचे न्याय तंत्र को जो नसीहत और हिदायत दी है, वह इस बात का डरावना संकेत है कि भविष्य में संविधान का अर्थ महज एक कागज के टुकड़े या रामचरित मानस के उस गुटके की तरह हो सकता है, जब भगवान की जरूरत हो, उसे बांच लिया जाए। बाकी तंत्र तो अपने हिसाब से, अपने अपने क्षुद्र स्वार्थ या आस्था के स्टीयरिंग से ही चलेगा। न्यायपालिका को इसकी ट्रेनिंग अभी से ले लेनी चाहिए। डर यह भी है कि आस्थाअों का यह सवाल आगे कई रूपों, सम्प्रदायों और धर्मों के रूप में प्रस्फुटित हो सकता है। सवाल हो सकता है कि जब सबरीमाला फैसले में हिंदुअो (एक वर्ग) की आस्था को ठेस पहुंच रही थी तो तीन तलाक मामले में तो लगभग पूरा पुरूष समुदाय ही ‘आहत’ और ‘प्रभावित’ हो रहा है, उसका क्या? कश्मीरियों की आस्था धारा 370 में हैं, उसे हटाने की बात कश्मीरियों की आस्था पर चोट है कि नहीं? समलैंगिक सम्बन्धों को कानूनी मान्यता देश में नैसर्गिक सेक्स सम्बन्धों के हामी बहुसंख्यकों की आस्था पर प्रहार है कि नहीं? अगर एक भगवान अयप्पा का ब्रह्मचर्य बाकी देवताअों पर भारी है तो हिंदुअों के हर मंिदर के लिए अलग-अलग आचार संहिता बनाना जरूरी है ‍िक नहीं? और फिर हमारी आस्था ‘राष्ट्रप्रेम’ और दूसरों की आस्था राष्ट्रद्रोह क्यों कर होनी चाहिए ?

सोचिए अगर सचमुच ऐसा हुआ या करना पड़ा तो देश किस गर्त में जा गिरेगा? कोई भी देश अंतत: उसी संविधान या नियम-कायदे से चलता है, जो लोगों द्वारा लोगों के लिए बनाया होता है। भारतीय संविधान भी उसी संविधान सभा ने बनाया था, जिसके 284 सदस्यों में 80 फीसदी से ज्यादा‍ हिंदू ही थे। इसी संविधान ने हमे न्यायपालिका दी, जो संविधान की रक्षक भी है। तो क्या अमित शाह इसी लोकतांत्रिक रक्षा तंत्र को छिन्न‍- भिन्न करने का ‘नेक’ सुझाव देश को दे रहे हैं? यहां बात केवल हिंदू-अहिंदू, आस्तिक-नास्तिक अथवा राष्ट्रवादी-साम्यवादी की नहीं है, समूची व्यवस्था और उसे नियमित करने वाले तंत्र की पवित्रता और निष्पक्षता की है। देश सबकी आस्था से चलता है न ‍कि किसी एक पंथ, मंदिर अथवा समुदाय के। यह भी विचित्र है कि जिस ईश्वर ने स्त्री को रजस्वला होने का वरदान दिया, वही उसे अछूत कैसे मान सकता है? भाजपा तो सबरीमाला पर खून बहाने के लिए भी तैयार है। वह इस पर राजनीति ही करना चाहती है तो खूब करे। लेकिन आधुनिक भारत के उन पायों को तो न हिलाए, जिसकी बुनियाद पर यह राष्ट्र खड़ा है। केरल में पार्टी का सत्ता स्वार्थ देश की न्यायपालिका को अनुचर बनाने की कीमत पर सिद्ध करने की कुचेष्टा हमे फिर उसी युग में लौटाने का दुराग्रह है, जिनसे से देश बड़ी कुर्बानियों के बाद उबरा है।

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