धर्मव्रत / त्यौहार

जानिए कैसे जीवित है लोक परंपरा, स्मृति के संकल्प के कारण रोज गाए जाते है संजा बाई के गीत

शायद ही मालवा की कोई बेटी होगी जिसने संजा नहीं मांडी होगी..दीवार पर पीली मिट्टी लीप कर गोबर से तिथि के हिसाब से आकृति बना उस पर या तो रंग-बिरंगे फूलों या चमकीली पन्नियों के द्वारा सजा कर शाम ढले सब सहेलियों के संग संजा बाई के गीत न गाए- गुनगुनाए होंगे, मिलजुलकर कलाकोट बनाना और फ़िर गीत गाते हुए भारी मन से अंत में सोलह दिन की समेटी हुई संजा बाई को बहते जल में प्रवाहित कर उदास मन से घर को आना व कई दिनों तक सांझ को उदासी व सूनापन महसूस करना…!

पर आप जीत गई स्मृति जी अपनी जीवटता से , अपने जुनून से ,अपनी ज़िद से …साबित कर दिया कि बचपन के शोक को कैसे जिलाए रखना है…! कोई बात नहीं समय कम है, कच्ची दीवार नहीं है पर इरादे तो पक्के है…मिट्टी नहीं , गोबर नहीं , फूल पत्ती नहीं , सखी सहेली नहीं …पर यादें तो है, खुद से किए वादे तो है और सबसे बड़ी बात जो है वो यह कि मज़बूत इरादे है तभी तो दिन भर ऑफिस के काम के बाद भी लाल आसन पर रंगोली के रंग से सोलह दिन के अनुरूप संजा मांडी और सिर्फ मांडी ही नहीं बल्कि अपनी मधुर आवाज़ में रोज संजा बाई के गीत भी गाए-गुनगुनाए…!

वाह…! मान गए जी…कोई शार्ट कट नहीं…अन्यथा शौक के लिए तो बाज़ार में संजा का पाना भी उपलब्ध होता है…!मेरे जैसी कइयों ने संजा मांडी है अपने बचपन में पर उस शौक को जिंदा नहीं रखा पर स्मृति जी ने वेबदुनिया की जिम्मेदारी वाली जॉब में भी संजा को विस्मृत नहीं होने दिया यह मैंने तब जाना जब पिछले वर्ष हमने “वामा साहित्य मंच के बैनर तले विलुप्त होती संजा ” पर एक कार्यक्रम रखा …! उस दिन उनकी चमकती आँखों में और चमक आ गई थी… ! तब वे बोली थी सब धीरे धीरे कम हो गया लेकिन संजा मेरे भीतर हमेशा धड़कती रही।अब कोरोना काल में जब सब कुछ घर से ही हो रहा है तो उन्होंने सोचा कि 20 मिनट रोज निकालूंगी। घर की सारी बेटियां बहन और भाई भाभी के ग्रुप में संजा के गीत भेजे फिर तो समां बंध गया।सब संजा के लिए 9 से 10 का टाइम फिक्स कर गीत गाने लगे।पुलिस की नौकरी में 24 घंटे व्यस्त रहने वाला भाई और अमेरिका में बैठा भतीजा भी पीछे नहीं रहा…सब जम कर हिस्सा ले रहे हैं…हम अपना बचपन फिर से जी रहे हैं चहकते हुए उन्होंने मुझे इसलिये बताया क्योंकि संजा से मेरे भी दिल के तार जुड़े है…वाह जी यह बचपन तो आप छप्पन ही नहीं बल्कि जीवन पर्यन्त जीती रहे ताकि हमारी संस्कृति, सभ्यता,पर्व,उत्सव उल्लास हमेशा कायम रहे..!

लोकपरम्परा को जीवित रखने के लिए व सुंदर संजा के मांडने मांडने के लिए आपको बहुत स्नेह …!
बड़ा किलकोट तो आज ड्राईंग शीट पर बनेगा तब तक के लिए कुछ चित्र आपके लिए…
दिल की कलम से…
पदमा राजेन्द्र