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मोदी के नारे का अर्थ -‘जय अनुसंधान’ या ‘जय अविज्ञान’?

Posted on: 08 Jan 2019 08:55 by Pawan Yadav
मोदी के नारे का अर्थ -‘जय अनुसंधान’ या ‘जय अविज्ञान’?

अजय बोकिल

मोदी सरकार के कार्यकाल के दौरान हुई लगभग सभी ‘भारतीय विज्ञान कांग्रेस’ को अपने ‘अविज्ञानीकरण’ के लिए जरूर याद रखा जाएगा। इसमें मोदीजी की सहमति कितनी है पता नहीं, लेकिन इसकी शुरूआत मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद मुंबई में आयोजित पहली विज्ञान कांग्रेस से हो गई थी, जिसमें वैदिक विमान को आज के विमानों से बेहतर बताया गया था। इस बार जालंधर विज्ञान कांग्रेस में एक भारतीय वैज्ञानिक (?) के जी कृष्णन ने दावा किया कि जल्द ही केन्द्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री डाॅ. हर्षवर्द्धन भारत के मिसाइल मैन और पूर्व राष्ट्रपति डाॅ अब्दुल कलाम से भी महान वैज्ञा‍िनक साबित होंगे। साथ ही उन्होंने महान वैज्ञानिक न्यूटन और आइंस्टीन को भी दुनिया को गुमराह करने वाला बताया।

एक और वैज्ञानिक नागेश्वर राव का दावा था कि भारत में स्टेम सेल टेकनीक महाभारत काल से है। इसी के जरिए सैंकड़ो कौरव पैदा किए गए थे। उन्होंने यह भी समझाया‍ ‍िक डार्विन के विकासवाद की तुलना में पुराणों की दशावतार थ्योरी ज्यादा वैज्ञानिक थी। कृष्णनजी ने तो एक और नेक सुझाव दिया कि ब्रह्मांड में गुरूत्वाकर्षण तरंगों का नाम बदल कर मोदी तरंगें कर ‍िदया जाना चाहिए। ( क्योंकि उनका असर भारत तो क्या ब्रह्मांड से भी परे तक है) हालांकि इस ‘अनूठे सुझाव’ पर खुद मोदीजी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, लेकिन पूरे भौतिकशास्त्र को प्रभावित करने वाले इस सुझाव से वे शायद इतने उत्साहित हुए कि उन्होने विज्ञान कांग्रेस में एक नया नारा दिया-‘जय अनुसंधान ।‘ हालांकि यह पूरी तरह नया नहीं था, क्योंकि इसके पहले दो पूर्व पीएम लाल बहादुर शास्त्री और अटल बिहारी वाजपेयी क्रमश: ‘जय किसान’ और ‘जय विज्ञान’ का नारा दे चुके थे। मोदीजी ने इसमे ‘जय अनुसंधान’ भी जोड़ दिया ताकि शायद कृष्णन और नागेश्वर राव जैसी ‘प्रतिभाअो’ंको अपने दावों को प्रायोगिक स्तर पर साबित करने का पूरा अवसर मिले। यह बात अलग है कि इन प्रतिभाअों से घबराई भारत सरकार ने बाद में उनके दावों से खुद को अलग कर लिया। लेकिन हांडी के चावल की तरह यह साफ हो गया कि अब देश में विज्ञान और छद्म विज्ञान का फर्क ‍िमट चुका है। इतिहास ही विज्ञान है और मिथकों का पारायण ही अनुसंधान है।

बेशक, भारत जैसे विकासशील देश को विज्ञान के क्षेत्र में मौलिक अनुसंधान की बेहद जरूरत है। क्योंकि यही विकास और समृद्धि की कुंजी है। इस हिसाब से मोदीजी ने सही नस पर हाथ रखा। दुनिया दूसरी बड़ी आबादी और सातवीं बड़ी अर्थव्यवस्था होने के बाद भी भारत में शोध और अनुसंधान (आरएंडडी) पर बहुत कम खर्च होता है । हमारी कुल जीडीपी का मात्र 0.69 फीसदी आरएंडडी पर खर्च होता है। हालांकि बीते एक दशक में आरएंडडी पर निवेश में तीन गुना वृद्धि हुई है। लेकिन यह ज्यादातर प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में ही है। शुद्ध‍ विज्ञान में शोध व अनुसंधान में हमारी रूचि और व्यय बहुत कम है। जबकि दुनिया के तमाम विकसित देश इस क्षेत्र में भी आरएंडडी को बहुत गंभीरता से लेते हैं। चूं‍कि मोदीजी ‘सर्वज्ञ’ हैं इसलिए उन्होने वैज्ञानिकों को नसीहत दी कि उन्हें देश में किफायती चिकित्सा, आवास, स्वच्छ हवा, पानी व ऊर्जा उपलब्ध कराने और कृषि की पैदावार बढ़ाने के लक्ष्य के प्रति समर्पित होना चाहिए। तकनीक ऐसी हो, जो स्थानीय आवश्यकताएं पूरी करने में सक्षम हो। यह बात अलग है कि इसी कार्यक्रम में मौजूद दो नोबेल पुरस्कार प्राप्त विदेशी वैज्ञानिकों ने मोदी से असहमत होते हुए कहा कि प्रौद्योगिकी और तकनीक के बजाय विज्ञान में बुनियादी शोध पर जोर दिया जाना चाहिए।

अब सवाल यह है कि आखिर मोदीजी किस प्रकार के अनुसंधान की बात कर रहे हैं? वो, जिसकी कृष्णन जैसे वैज्ञानिक और सत्यपालसिंह जैसे केन्द्रीय मंत्री वकालत करते रहे हैं या फिर वो, जिसकी बुनियाद अब्दुल कलाम, होमी भाभा या जगदीश चंद्र बसु जैसे वैज्ञानिकों ने रखी है? सब जानते हैं कि विज्ञान की इमारत ‘क्या, कैसे और क्यों’ की आधारशिला पर टिकी है। वैज्ञानिक सोच का अर्थ ही यही है कि जो कहा और देखा जा रहा है, उसे प्रायोगिक रूप से भी परखा और सिद्ध किया जाए। विज्ञान में कोई अंतिम सत्य नहीं होता। संदेह की गुंजाइश सदा रहती है। इसी से शोध के नए रास्ते और आयाम खुलते हैं। पौराणिक बातों या मिथकों (जो कि हर सभ्यता और संस्कृति में हैं) को भी नए संदर्भों और व्यावहारिक स्तर पर जांच कर ही स्वीकार किया जाए। यहां ‘बाबा वाक्यम् प्रमाणम्’ की कोई जगह नहीं है। केवल यह कहना ‍िक हमारे दादाजी की बड़ी भारी मूंछें थीं, वर्तमान में दंबगई जताने का वैज्ञानिक आधार नहीं हो सकता।
मगर अफसोस कि भारतीय विज्ञान कांग्रेस अब अपने वैज्ञानिक विमर्श, चिंतन और विजन के बजाए ऐसे अफलातून बयानों और दावों के लिए ज्यादा चर्चित हो रही है, जो विज्ञान के सच्चे विद्यार्थी के ‍िलए भी शाॅकिंग है।
चार साल पहले हुई 102 वीं विज्ञान कांग्रेस में दो पायलटों ने दावा किया कि वैदिक काल में आज से बेहतर विमान बनाने की तकनीक मौजूद थी। इन पायलटों ने अपने दावे के पक्ष में ‘वैमानिक प्रकरणम्’ ग्रंथ का हवाला दिया। इस पर नासा के जाने-माने वैज्ञानिक आरपी गांधीरमन और अन्य 220 वैज्ञानिकों ने एक बयान जारी कर इसे ‘छदम विज्ञान’ कहकर इसकी कड़ी आलोचना की। प्रख्यात वैज्ञानिक डाॅ. जयंत नार्लीकर को भी कहना पड़ा कि जो बात सिद्ध न की जा सके, उसके दावे करना गलत है। आश्चर्य यह कि यह वैदिक विमान आज तक कहीं उड़ता दिखाई नहीं दिया और राफेल खरीदने वाली मोदी सरकार ने भी उसे तवज्जो नहीं दी।

इस बार तो वह वैदिक विमान भी पीछे छूट गया है। विज्ञान कांग्रेस में वरिष्ठ वैज्ञानिक केजी कृष्णन ने खम ठोक कर दावा किया कि अगर उनके सारे सिद्धांत (?) सही साबित हो गए तो विज्ञान की सारी धारणाएं गलत हो जाएंगी। हालांकि ये सिद्धांत क्या हैं, यह उन्होने नहीं बताया। रहा सवाल केन्द्रीय मंत्री डाॅ. हर्षवर्धन का तो विज्ञान से उनका नाता इतना है कि वे इस विभाग के मंत्री हैं और पूर्व में ईएनटी सर्जन रहे हैं। कृष्णन ने भौतिक शास्त्र की दो महान हस्तियों न्यूटन और आइंस्टीन को भी खारिज‍ ‍िकया। यह सही है कि इन दोनो के महान वैज्ञानिक सिद्धांतों के कुछ पहलुअोंको नए शोधों की रोशनी में परखा जा रहा है, लेकिन वे पूरी तरह गलत थे यह कहना ही घोर अवैज्ञानिक होने का प्रमाण है। वहीं आंध्र ‍विश्वविद्यालय के ज्ञानी कुलप।ति नागेश्वर राव ने गांधारी के सौ बच्चों के जन्म को आधुनिक स्टेम सेल तकनीक का नतीजा बताया। संभव है कि ऐसी कोई तकनीक तब भी हो। लेकिन उसकी कोई प्रविधि या ऐसी तकनीक हमारे पास अब नहीं है, जिसे दोहरा कर हम नए कौरव पैदा कर सकें। आधुनिक स्टेम सेल थेरेपी तो दो दशक पहले वजूद में आई है। इसी प्रकार हमारे भागवत पुराण में वर्णित विष्णु के दशावतारों की कल्पना सिद्धांत रूप में डार्विन के विकासवाद से कुछ हद तक मेल खाती है, लेकिन लाखों प्राणियों के शारीरिक, मानसिक विकास की किसी सूक्ष्म भौतिक प्रक्रिया की विस्तृत व्याख्या नहीं करती। वैसे भी दुनिया आगे जा रही है, पीछे नहीं।

ऐसे में मोदीजी ने अनुसंधान पर जोर दिया है तो प्रश्न यही है कि यह अनुसंधान आखिर क्या होगा, किस क्षेत्र और किस मानसिकता का होगा? मूर्खतापूर्ण दावों का या अगर प्राचीन ज्ञान कोई है तो उसकी आधुनिक संदर्भों में वैज्ञानिक व्याख्याकर उसे सिद्ध करने का? जब राव से उनके स्टेम सेल सिद्धांत की प्रामाणिकता पर सवाल किया गया तो उनका जवाब था कि इतिहास (या मिथक) अपने अाप में ही वैज्ञानिक प्रमाण है। इसके बाद किसी अनुसंधान की जरूरत ही क्या है? यह वो स्थिति है, जहां अनुसंधान और अविज्ञान का फर्क मिट जाता है।

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