जनाब लोकतंत्र नहीं, मोदी-शाह-तंत्र कहिए…

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जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 को हटाना उचित है, लेकिन यह सब आम सहमति से होता तो श्री नरेन्द्र मोदी आपका कद और ऊंचा होता। परन्तु पूरा देश यह जानता है कि आप और शाह किस समय क्या निर्णय लेंगे ये किसी को भी पता नहीं। अलबत्ता राष्ट्रीय स्वयं संघ को इसकी भनक जरूर होती होगी। 

किसी ने लिखा है, ‘कॉपी पे चंद रोज से अल्फाज की जगह, भूखे कुछ बच्चे बनाने लगे हैं रोटियां।’ यूं नहीं कि इस कॉपी पर महज रोटियां बनायी जा रही हों। इसके सफों पर आप अनुच्छेद 370 वाली अब तक गीली सियाही को भी देख सकते हैं। वहां अंकित तीन तलाक कानून की रोशनाई भी अभी पूरी तरह नहीं सूखी है। भूख से बिलबिलाते नौनिहालों की बात छोड़ दें तो इस कॉपी पर इतनी अधिक राजनीतिक रोटियां सेकी जा रही हैं कि उन्हें देख-देखकर अपच का अहसास होने लगा है। 

ये अपच बेमानी नहीं है। आप इसे पूर्वाग्रह नहीं कह सकते। यह तथ्यों वाला मामला है। भीषण और प्रायोजित शोर के बीच दबी उन सिसकियों का है, जिनके कसूरवार भगवा अंगोछों से अपने-अपने कान के छेद बंद कर चुके हैं। एक शेर है, ‘ये खेल ये हंगामे दिलचस्प तमाशे हैं। कुछ लोगों की कोशिश है, कुछ लोग बहल जायें।’ केंद्र सरकार ऐसा ही कर रही है। देश-भर के मध्यम एवं निम्म मध्यमवर्ग के रुदन को शोरो-गुल के जरिये दबा रही है। कश्मीर मामले को देश की अस्मिता की बात कहकर प्रचारित किया जा रहा है। किंतु नंगा सच यह है कि अनुच्छेद 370 का खात्मा केवल एक राज्य की जनता के कल्याण वाला घटनाक्रम है। तीन तलाक भी समुदाय विशेष की आधी आबादी को लाभ की परिधि में ढंक रहा है। मगर देश केवल कश्मीर या मुस्लिम महिलाओं वाला नहीं है। यह वह राष्ट्र है, जहां बीते करीब साढ़े पांच साल की कई तथाकथित तथा कुछ वास्तविक उपलब्धियों के बावजूद भयावह सन्नाटा पसरा हुआ है। इस बात पर बहस ही नहीं हो रही है कि बेरोजगारी की निरंतर भयावह होती समस्या पर सरकार घोरतम असफल साबित हुई है। यह विषय त्याज्य बना दिया गया है कि उद्योग जगत भीषण संत्रास के दौर से गुजर रहा है। जमशेदपुर में टाटा का प्लांट बंद होने की कगार पर आ गया है। इससे संबंधित तमाम छोटे-मोटे उद्योग केंद्रों में तालाबंदी हो चुकी है। मीडिया के बिकाऊ धड़े को श्रीनगर की सडक़ पर बिरयानी सूतते अजीत डोभाल तो दिख जाते हैं, लेकिन उसकी नजर जानबूझकर उन असंख्य नौजवानों तक नहीं पहुंच रही, जो पकौड़ा बनाने के रोजगार तक से वंचित हैं। 

बेयर ग्रिल्स से मेरी कोई खास वाकफियत नहीं है। जी हां, वही ‘मेन वर्सेज वाइल्ड’ वाले सज्जन। लेकिन मैं ग्रिल्स की पारखी नजर की तारीफ कर रहा हूं। इस कार्यक्रम के ऐपिसोड के लिए मोदी का चयन ग्रिल्स के जीवन के सर्वाधिक बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णयों में से एक माना जाएगा। क्योंकि मोदी के रूप में उस शख्स का इंतेखाब किया गया है, जो बीते आधा दशक से अधिक समय से पूरे देश के साथ मेन वर्सेज वाइल्ड ही खेल रहा है। ऐसा अघोषित खेल, जिसमें एक ओर मोदी हैं और दूसरी तरफ जंगली हालात से जूझता देश। धर्म के नाम पर भीड़ द्वारा की जा रही हत्याएं। राष्ट्रवाद की आड़ में  अराजक समूहों की वर्ग-विशेष के प्रति हिंसा। पुलिस व्यवस्था के दम पर सच की आवाज को दबाने का यत्न। इन सब के बीच अयोध्या विवाद का  प्रसार काशी और विश्वनाथ तक करने की साजिश भरी कोशिशें। यह सब क्या किसी जंगल राज से कम है! 

अल्बर्ट आइंस्टीन ने महात्मा गांधी के लिए कहा था, ‘आने वाली नस्लें भरोसा नहीं करेंगी कि दुनिया में ऐसा कोई हाड़-मांस का आदमी पैदा हुआ था।’ वह समय दूर नहीं, जब कोई और विचारक इन्हीं पक्तियों को कुछ बदलाव के साथ मोदी के लिए लिखेगा। वह कुछ ऐसा हो सकता है, ‘आने वाली नस्लें (अगर वे भक्तों से पृथक हुईं तो) इस बात पर भरोसा नहीं करेंगी कि दुनिया में ऐसा कोई झूठा आदमी पैदा हुआ था।’ यह सोचना गलत नहीं है। हर ओर आडंबर। छल। देश के बैंक कंगाल हो चुके हैं। ऑटोमोबाइल का बाजार दम तोड़ रहा है। छोटे और मझौले उद्योग तो कुचलकर खत्म किए जा रहे हैं। इस शासन में ढाई करोड़ लोग रोजगार गंवाकर सडक़ पर आ चुके हैं। लेकिन मोदी हैं कि फाइव ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था लाने वाले आकाश कुसुम को खिलाने पर तुले हुए हैं। कोई पूछे तो सही कि दीवालिया होती अर्थव्यवस्था का ऐसा श्रृंगार भला किस तरह हो पाएगा? उस प्राइवेटाइजेशन की दम पर, जिसने देश के एजुकेशन सेक्टर को बर्बाद कर दिया है! अपना पेट काटे बगैर देश के मध्यमवर्गीय परिवारों की यह हैसियत नहीं कि किसी निजी कॉलेज में बच्चे को पढ़ा सकें।  सरकारी कॉलेजों में आलम यह कि एडमिशन के लिए कटऑफ प्रतिशत 94 तक पहुंच चुका है। मेरा  भी शुमार ऐसे ही परिवारों में होता है। फिर जब मेरा नौकर या ड्राइवर अपने बच्चे को निजी शिक्षण संस्थान में पढ़ाने का सपना देखता है तो उसकी हालत पर रोने का मन होने लगता है। क्योंकि वह निम्न मध्यमवर्गीय वह सपने देख रहा है, जिनके कभी भी पूरा न हो पाने की बात को मैं साफ जानता हूं। शिक्षा जैसी मूलभूत आवश्यकता वाले क्षेत्र में ऐसी आर्थिक विषमता के चलते मैं मोदी से पूछना चाहता हूं कि आखिर वह पढ़ाई में प्रतिस्पर्द्धा को किस खाई की ओर धकेलने पर तुले हुए हैं।

मेरा आंकलन भयावह है। किंतु है सच। देश एक अंधी गुफा के भीतर घसीट कर ले जाया जा रहा है। ऐसी गुफा, जिसमें आगे बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं है। उसकी दीवारों पर अराजकता की परतें चिपकी हुई हैं। रास्तों में क्रूरता भरी मनमानी के पत्थर बिखरे हुए हैं। गुफा में अनिश्चितता का घुप अंधकार छाया हुआ है। मु_ी भर लोगों को खुश करके जुगनुओं की पोटली बना उससे रोशनी करने के दावे जैसा कृत्य किया जा रहा है। भीड़ बेबस है। उसके हाथ में संघी हिंदुत्व की हथकड़ी है। पैरों में छद्म राष्ट्रवाद की बेडिय़ां डाल दी गयी हैं। हाड़-मांस वाले इंसान कठपुतलियों में तब्दील किए जा चुके हैं। मस्तिष्क और हृदय की धमनियों में भक्ति का ऐसा सीसा भर दिया गया है कि इन दोनों ने प्राकृतिक रूप से काम करना ही बंद कर दिया है। दिमाग ‘मोदी-मोदी’ कहने लगा है। धडक़नों का स्वर भी इसी शब्द से गूंज रहा है। यह सब हुआ नहीं, कराया गया है। वह भी कुछ ऐसे रूप में कि जिन बची-खुची  धडक़नों का मूल स्वर कायम है, वे भी शनै:-शनै: अवरोह की अधोगति को प्राप्त होती साफ दिखती हैं। पूरा परिवेश जॉम्बी जैसी मानवता की हत्यारी लाशों के सदृश कर दिया गया है। यह वह चलती-फिरती लाशें हैं, जो दिलो-दिमाग से पूरी तरह स्वस्थ शरीरों को नष्ट कर देने पर आमादा हैं। ये वो मन एवं मस्तिष्क हैं, जो आज भी सच-झूठ का फर्क करना जानते हैं। जो अपनी इस फितरत के चलते मोदी सरकार के गलत को गलत कहने की ताब रखते हैं। भक्तों के रूप में मौजूद असंख्य जॉम्बी ऐसे ही लोगों के खात्मे की सुपारी लेकर पूरे देश और इसके एक-एक क्षेत्र में आतंक मचाती घूम रही हैं। 

चलिये। लगे हाथ यह भी मान लिया जाए कि स्वच्छता अभियान का कुछ असर देश में दिखने लगा है। किंतु उस गंदगी का क्या, जिसकी बदबू सामाजिक तानेबाने के नथुनों में घुसकर वहां विषाणुओं का संचार कर रही है। मैं सोशल मीडिया की बात कर रहा हूं। इसने किस हद तक आम आदमी को अनसोशल कर दिया है। उसके पास केवल और केवल कम्प्यूटर या मोबाइल फोन की स्क्रीन के प्रति ही अनुराग शेष रह गया है। किसी की मौत का शोक महज ‘आरआईपी’ वाले दिखावट से भरे शौक में परिवर्तित हो गया है। हर-दिन देश के प्रत्येक कोने में नये-नये वृद्धाश्रम खुलते जा रहे हैं और सोशल मीडिया पर उसी अनुपात में माता-पिता की महत्ता बताने वाले बनावटी संदेशों की भीड़ भी बढ़ती जा रही है। लेकिन मजाल है कि मन की बात में इसका कोई जिक्र भी किया जाए। मामला अंबानी और उन जैसे अपने हितैषियों के ऐसे उत्पादों और सेवाओं को बढ़ावा देने का जो ठहरा। इधर, अडानी मीडिया पर काबिज हो गया है। यानी कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को हरकारा संस्कृति की भेंट चढ़ा दिया गया है। जो रवीश कुमार, विनोद दुआ या पुण्य प्रसून वाजपेयी इस संस्कृति से आज भी अछूते हैं, उन्हें मोदी की जॉम्बी सेना किसी अछूत की तरह तिरस्कार का पात्र बनाये जाने पर आमादा है। 

मोदी को मेरा एक सुझाव है। आजादी से भरा। जनता ने कम से कम अगले पांच साल तक के लिए फिर उनका वरण किया है। तो वह यह घोषित कर दें कि इस देश में उनकी सरकार कायम रहने तक लोकतंत्र को मोदीतंत्र के नाम से ही पुकारा जाएगा। यकीन मानिए, उनके द्वारा इस ऐलान की अब औपचारिकता मात्र शेष रह गयी है। बाकी तो यह मोदीतंत्र है। षड्यंत्र है। शाह-मोदी वाला तंत्र-मंत्र है। इन सारे प्रपंचों के बीच भूख से बिलबिलाते कुछ बच्चे अब भी उम्मीद की रोटी उकेर रहे हैं। रोटी नहीं मिलेगी, यह तय है। और तय यह भी है कि  एक दिन बच्चों की इस कॉपी पर ‘मोदी के शहीद’  नामक अंतहीन श्रृंखला लिखने की शुरूआत हो जाएगी। लेकिन मैं इस कॉपी पर खुद का और खुद के जैसों का नाम नहीं ही आने दूंगा, यह मेरा संकल्प है। हरेक जॉम्बी को चुनौती है। मैं जानता हूं कि कड़वे सच के जवाब में खामोशी ओढ़ लेना मोदी का खास शगल है। इसलिए अपनी चुनौती दोहराते हुए उनके लिए एक शेर के साथ बात खत्म कर रहा हूं, कि, ‘तेरी तिलिस्मे-खामोशी को मात देती हुई। ये मेरी जख्म-जख्म लब कुशाई को देख।’ मकसद मोदी को अपने जख्म दिखाना नहीं है। मकसद यह बताना है कि ये घाव मेरा गहना हैं और इनसे रिसते खून को सियाही बनाकर मैं तब तक सच लिखता रहूंगा।

  • लेखक बिच्छू डॉट कॉम के संपादक हैं।

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