मधुकर पवार। सन 1984 में प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए आम चुनाव में राजीव गांधी को प्रचंड बहुमत प्राप्त हुआ। उसके बाद 1991 में प्रधानमंत्री बने नरसिम्हा राव बहुमत की कगार पर रहकर 5 साल तक सरकार चलाने में कामयाब रहे। सन् 2014 में नरेंद्र मोदी पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आए और सन 2019 में भी पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में काबिज हुए। सन् 1989 से 2014 के बीच नरसिम्हा राव को छोड़कर कोई भी दल अकेले बहुमत की सरकार नहीं बना सका । विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर, एच.डी. देवेगौड़ा, इंद्रकुमार गुजराल और अटलबिहारी वाजपेयी की गठबंधन सरकारों को सहयोगी दलों की महत्वाकांक्षा और स्वार्थ के कारण कुछ ही महीनों में इस्तीफा देना पड़ा । हालांकि अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह ने अपना कार्यकाल सफलतापूर्वक पूरा । लेकिन यूपीए-2 के दौरान हुये कथित भ्रष्टाचार ने गठबंधन सरकार की पोल खोल कर रख दी।

भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में सन 2014 से जब से भाजपा सरकार सत्ता में आई है, तभी से कांग्रेस मुक्त भारत का नारा जोर – शोर से चल रहा है। बीच-बीच में ऑपरेशन लोटस की गूंज से विपक्ष छिन्न-भिन्न होता दिखाई देता है। फिर एकजुट होकर आगामी विधानसभा और लोकसभा के चुनाव की रणनीति बनाने में जुट जाते हैं। गठबंधन, महा गठबंधन, महा अघाड़ी और ऐसे कितने ही गठबंधनों के साथ प्रयोग लगातार जारी हैं। कुछ दल जहाज के पंछी के माफिक दल छोड़कर दूसरों के साथ गठबंधन बनाते हैं और फिर वापस उन्हीं के साथ सरकार बना लेते हैं। यदा-कदा संचार माध्यमों में विपक्ष सत्ता पक्ष पर आरोप लगाता रहा है कि विपक्ष को कमजोर करने के प्रयास किए जा रहे हैं। इसी के तहत प्रवर्तन निदेशालय, सीबीआई, आयकर विभाग सहित अन्य एजेंसियों के गलत उपयोग के आरोप भी लगाए जाते रहे हैं। जब किसी राज्य में विधानसभा में और केंद्र में सत्ता पक्ष पूर्ण बहुमत में हो तो अक्सर विपक्ष सत्ता के दुरुपयोग के साथ लोकतंत्र को कमजोर करने और विपक्ष की आवाज दबाने का आरोप लगाते ही रहते हैं।

लोकतंत्र में संख्या बल का विशेष महत्व होता है। यदि सत्ता पक्ष के पास बहुमत है तो मजबूत सरकार और यदि संख्या केवल बहुमत के इर्द-गिर्द ही है तो सरकार को हमेशा सत्ता बेदखल होने का खतरा सताता रहता है। इसमें दलबदल के साथ असंतुटों द्वारा अलग गुट बनाने जैसी घटनायें होते ही रहती हैं। मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र इसके ताजा उदाहरण हैं ।. राजनीतिक स्थिरता की बात करें तो बहुदलीय प्रणाली भी इसका एक प्रमुख कारण हो सकता है। यहां पर अमेरिका का उदाहरण देना समीचीन होगा जहां केवल प्रमुख दो दल हैं जो राष्ट्रपति के चुनाव में हिस्सा लेते हैं और इन्हीं दो दलों डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन में से ही किसी एक दल का राष्ट्रपति निर्वाचित होता है । पूर्ण बहुमत होने कारण वहां दलबदल जैसी स्थितियां उत्पन्न कर सरकार को सत्ता से बेदखल करने की शायद ही कोई घटना हुई हो। हालांकि सरकार को अस्थिर करने के प्रयास तो होते रहते हैं। वॉटरगेट कांड जैसी परिस्थितियां ही राष्ट्रपति को पद से मुक्त होने पर विवश करती है अन्यथा सरकार अपना कार्यकाल पूरा करती हैं।

विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में केंद्र और राज्यों में बहुदलीय प्रणाली है। राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दल विधानसभा और लोकसभा के चुनावों में हिस्सा लेते हैं। वर्तमान में चुनाव करवाने के लिए हालांकि ईवीएम का उपयोग किया जा रहा है लेकिन किसी – किसी विधानसभा और संसदीय क्षेत्रों में उम्मीदवारों की संख्या अधिक होने पर दो-दो मशीनों का भी उपयोग करना पड़ता है। अधिक उम्मीदवार होने से बहुकोणीय मुकाबला होता है जिससे मतदाताओं में भी भ्रम की स्थिति पैदा हो जाती है। चुनाव उपरांत गठजोड़, खरीद-फरोख्त जैसी स्थिति उत्पन्न होने के कारण लोकतंत्र पर कालिख लग ही जाती है। मतदाता ने जिस उम्मीदवार को विकास या विचारधारा के आधार पर जिताया है, जब वह अलग विचारधारा वाले दल से समझौता कर सत्तासीन हो जाते हैं तब लगता है, उस निर्वाचित जनप्रतिनिधि ने मतदाताओं के साथ एक तरह से धोखाधड़ी की है।

लोकतंत्र के नाम पर राजनीतिक दलों द्वारा समय-समय पर जो भी अलोकतांत्रिक कृत्य किए जाते हैं, उससे तो यही प्रतीत होता है कि लोकतंत्र में सब जायज है। देश में जब केंद्र और राज्यों में अलग – अलग दलों की सरकारें होती हैं तब अक्सर भेदभाव करने के भी आरोप लगते हैं। राज्यों में अलग दलों की सरकारों पर हमेशा राष्ट्रपति शासन की तलवार लटकी रहती है। गठबंधन की सरकार में छोटे – छोटे दलों द्वारा मुख्य दल के साथ सौदेबाजी भी आम है। ऐसी अनेक कमियां उजागर होती हैं जिनसे विकास अवरुद्ध हो जाता है। योजनाओं का धरातल पर सही क्रियान्वयन होने में भी देरी होती है या आंशिक रूप से हितग्राहियों तक पहुंच पाती हैं। भ्रष्टाचार पर भी अंकुश नहीं लग पाता है। झारखंड में निर्दलीय विधायक मधु कोड़ा के मुख्यमंत्री बनने की त्रासदी लोकतंत्र की खामियां उजागर करने की सबसे बड़ी घटना मानी जानी चाहिए । इसी तरह राबड़ी देवी का मुख्यमंत्री बनना भी लोकतंत्र का मजाक ही कहा जाएगा। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिनसे यह तो स्वीकार करना ही होगा कि चुनाव सुधार की सख्त जरूरत है।

बाहर से समर्थन देने अथवा अन्य दलों के साथ मिलकर बनी सरकारों के सामने आ रही समस्याओं के निराकरण के लिए राज्य और केंद्र में दो दलीय प्रणाली एक बेहतर विकल्प हो सकता है। हालांकि इस विकल्प को लागू करना आसान नहीं है लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति के चलते प्रयोग के तौर किसी एक छोटे राज्य में इसे आजमाया जा सकता है। अलग – अलग विचारधारा के दलों का चुनाव पूर्व गठबंधन जरूर एक बड़ी समस्या हो सकती है लेकिन जब वे किसी एक चुनाव चिन्ह और पार्टी के बैनर तले चुनाव मैदान में उतरेंगे तो शनै: – शनै: स्थिति में सुधार आएगा जिससे न सिर्फ लोकतंत्र मजबूत होगा बल्कि देश में स्वस्थ राजनीतिक वातावरण निर्मित होने में भी मदद मिलेगी।

दो दलीय प्रणाली से निश्चित ही किसी एक दल को बहुमत मिलेगा। जिससे विधायकों और सांसदों की खरीद-फरोख्त नहीं हो सकेगी। सरकारें अपना कार्यकाल पूरा करेंगी। मध्यावधि चुनाव की आशंका लगभग समाप्त हो जाएगी । राजनीतिक अस्थिरता समाप्त हो जाने से निश्चित ही सरकारें अपना कार्यकाल पूरा करते हुये बिना किसी दबाव के बेहतर काम कर सकेंगी। आम जनता का भी सरकार पर भरोसा बना रहेगा और सरकारें भी आम जनता के हित में काम करने के लिये मजबूर होंगी।. जब उन्हें यह डर सतायेगा कि यदि उन्होने चुनाव में किये गये वादों को पूरा करने में कोताही बरती तो इसका खामियाजा चुनाव में भुगतना पड़ सकता है।

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अब समय आ गया है कि देश में राजनीतिक अस्थिरता की संभावना पर पूरी तरह विराम लगाते हुए देश में दो दलीय प्रणाली लागू की जाए । इसके लिए सभी राजनीतिक दलों के साथ समाज के सभी वर्गों की रायशुमारी के लिए राष्ट्रीय स्तर पर विचार मंथन किए जाने की आवश्यकता है। इसमें केंद्र सरकार के साथ चुनाव आयोग की भी महत्वपूर्ण भूमिका होगी। यदि इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया तो देश में जिस तरह से राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक ध्रुवीकरण फल – फूल रहा है, उससे लोकतंत्र कमजोर ही होगा। निजी स्वार्थ को दरकिनार रखते हुए राष्ट्रहित में व्यापक उदार दृष्टिकोण अपनाकर चुनाव सुधार के लिए जन आंदोलन करना पड़े तो आम जनता को भी आगे आना ही होगा ।