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मीडियामंथन: अनीति, असत्यता, अहंकार, अनियमितता और अनुशासनहीनता के खिलाफ अभियान

निरुक्त भार्गव पत्रकार

तीसरे मीडिया या कहें न्यू मीडिया, जिसे आम तौर पर सोशल मीडिया बोला जाता है, ने 20वीं शताब्दी तक स्थापित हो चुके प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक समाचार माध्यमों के समक्ष जबरदस्त चुनौती पेश की है. यहां जिक्र प्रिंटिंग के क्षेत्र, जिसमें समाचार-पत्र और पत्रिकाएं शामिल हैं, और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, जिसमें किस्म-किस्म के 24 घंटे दिखाई देने वाले खबरिया चैनल शामिल हैं, का हो रहा है. मगर इन दोनों माध्यमों की कमियों, कमजोरियों और मोनोपॉली व मोनोटोनस प्रवृत्तियों के कारण जनसामान्य के बीच-से इस नए मीडिया का प्रादुर्भाव हुआ! और, सच मानिये, इस माध्यम ने मीडिया मुगलों को धता बताते हुए वो प्लेटफार्म खड़ा कर दिया है जिसमें समूचा विश्व वाकई एक ‘ग्लोबल विलेज’ के रूप में उभरा है…

भारतवर्ष की ही बात करें तो इसके अधिकृत और अनाधिकृत भू-भागों पर आधिकारिक पैमाने पर कोई 130 करोड़ मनुष्य रहते हैं! इसके अलावा पाताल, पानी और वनों में रहने-वाले जीव-जंतु और पेड़-पौधे और इस संसार-लोक में विचरण करने वाले विभिन्न प्रजाति के जानवर भी अनगिनत संख्या में उपस्थित हैं! फर्ज करिए कि जिनमें मानवीय संवेदनाएं हैं और जो अपने समूहों में क्रिया-प्रतिक्रिया करते हैं उनकी हमारे देश में जनसंख्या 10 करोड़ तो होगी!
किसी से छिपा नहीं है कि इसी 10 करोड़ के टार्गेटेड आंकड़ों को अपनी-अपनी तरफ आकर्षित करने की प्रतिस्पर्धा में ‘अनगिनत’ प्रचार माध्यम पूरी शिद्दत से भिड़े रहते हैं! अक्सर वे इस प्रकार का मायाजाल भी फैलाते हैं कि 10 करोड़ प्रोस्पेक्टेड कस्टमर्स उनके चंगुल में हैं! जो ज्यादा ज़ोर से बोल लेता है, जनता को नचा लेता है और मैनीपुलेशन कर लेता है, वो खुद को मीडिया मुग़ल घोषित कर देता है!

झूठ-सच के व्यापार में माहिर इन खिलाड़ियों ने पत्रकारिता को कितना पल्लवित, पोषित और समृद्ध किया है, ये तथ्य भी पब्लिक डोमेन में हैं हीं! जरा प्रमुख अख़बारों को उठाकर देखिये: जनसरोकारों से जुड़े मुद्दे पेज-3 पर भी नहीं आ पाते! सम्पादकीय पृष्ठों पर आम आदि गायब है! नए लेखकों के लिए बमुश्किल कौने-कुचाले में कभी-कभार थोड़ी-बहुत स्पेस मिल पाती है! धंधेबाज लोग जरूर सचित्र ज्ञान पेलते दिखाई देते हैं, इन अख़बारों में! इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की स्थिति भी अलहदा नहीं है: “बड़े मियां तो बड़े मियां, छोटे मियां भी सुभानाल्लाह! मालूम नहीं, इन सबके दिलो-दिमाग में कौन-सा लार्ड मैकाले बैठा हुआ है, जो आज भी तीन ‘सी’ (C) के इर्द-गिर्द ही भटक रहे हैं: सेलिब्रिटीज़, क्राइम और क्रिकेट! ‘जनता का’, ‘जनता के लिए’ और ‘जनता के द्वारा’ का नुस्खा अपनाकर इस दृश्य माध्यम ने जो ‘एजेंडा’ सेट किया है, उसने सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक विभेदों को ही गढ़ा है!

24×365 काम करने वाले हम जैसे असंख्य हम्मालों ने ना-जाने कितने बरस खपा दिए एक ऐसी परिपक्व और मुकम्मल व्यवस्था कायम करने में, जो सिर्फ जनता के प्रति जवाबदेह हो! बहुत खुशकिस्मती की बात है कि इसमें इस तीसरे मीडिया ने कहें तो ‘प्राण वायु’ के बतौर सहायता की है! निस्संदेह, आमजन की अभिव्यक्ति का जो ये प्रगतिशील वाहक है, इसने पत्रकारिता जगत में अधुनातन और बेलाग आयामों को स्पंदित किया है!
आज सैंकड़ों पत्रकार ब्लॉग लिखते हैं. जिनका प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से मोहभंग हो चुका, वे यू-ट्यूब चैनल्स पर प्रभावी तरीके से दिखाई देते हैं! उन लोगों के आंकड़े भी कम नहीं हैं, जो वेब-साइट्स पर छाये रहते हैं! मेरी समझ कहती है कि नए मीडिया के सारथि ना केवल तथाकथित 10 करोड़ लक्षित रीडर्स व ऑडियंस में पैठ बना चुके हैं, बल्कि उनकी रीच वहां तक जा पहुंची है जहां आम व्यक्ति मिलते से ही कह उठता है: चियर्स!

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