राजकुमार जैन

इंदौर, मालवा, निमाड मध्यप्रदेश और पूरे देश मे “बड़े भैया” शब्द के पर्यायवाची बन चुके विष्णु प्रसाद शुक्ला नही रहे, यह सुनकर ऐसा लगा मानो एक शेर की दहाड़ हमेशा के लिए मौन हो गयी। 1937 में जानापाव के निकट ग्राम जामली में जन्मे विष्णुप्रसाद शुक्ला के पिता मूल रूप से उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले रहने वाले थे। आठ भाई और 12 मौसेरे भाई-बहनों में सबसे बड़े होने के कारण वें बड़े भैया कहलाए। वे परिवार को एकजुट रखने में सबसे आगे रहते थे।

यही वजह है कि बाणगंगा का उनका निवास आज सभी संयुक्त परिवार की पहचान है और सभी सदस्य एकजुट रहते हैं । परिवार की एकता को उन्होंने सबसे पहले रखा। किसी भी आपसी वाद विवाद मे उनका निर्णय अंतिम और सर्वमान्य होता था। उनके भतीजे गोलू शुक्ला कहते हैं कि हमारा परिवार एक संयुक्त परिवार है। जिसमें लगभग 100 से अधिक सदस्य है। धार्मिक, राजनैतिक एवं सामाजिक कार्यक्रमों को निरंतर आयोजित करने की प्रेरणा मुझे मेरे परिवार द्वारा विरासत में ही प्राप्त हुई है।

एक बेहतर जीवन की तलाश में शुक्ला परिवार इंदौर आ गया था। इंदौर आने के बाद युवा विष्णु ने अपनी मेहनत के बल पर कारोबार शुरू किया उसे बढ़ाया और शहर में अलग पहचान बनाई। बाणगंगा गांव में चले एक कानूनी विवाद के चलते पिता की संपत्ति कोर्ट-कचहरी में चली गई। फिर बड़े भैया को मिल में नौकरी करनी पड़ी। यहीं से उनके संघर्ष का सफर शुरू हुआ। एक इंटरव्यू में उन्होने बताया था कि संघर्ष के उन दिनों में वे हम्माली करते थे। रनगाड़े भी चलाते थे । पूरा दिन मेहनत करने के बाद भी बमुश्किल 10 रुपये ही बचा पाते थे।

कुछ समय के लिए मिल में नौकरी भी की। मजदूरों के बीच रहकर उनका दर्द समझा और उनके बीच बड़े भाई के रूप में जगह बनाई और इस तरह शहर में बड़े भैया के तौर पर ही पहचान हासिल की। 1960 के दशक में भाजपा के वरिष्ठ नेता प्यारेलाल खंडेलवाल के आग्रह पर जनसंघ से जुड़े। पहले जनसंघ और बाद में भारतीय जनता पार्टी के शुरुआती दौर में जब उसका कोई झंडा उठाने वाला नहीं था, बड़े भैया ने पार्टी को सहारा दिया आपातकाल के समय मीसाबंदी के रूप में गिरफ्तार होकर 19 महीने जेल में भी रहे। सांवेर जनपद अध्यक्ष बने। ग्रामीण क्षेत्र खासकर सांवेर की राजनीति में उनका लंबे समय तक खासा दखल रहा।

बड़े भैया ने सहकारिता से जुड़े चुनावों में तो अपना दबदबा कायम रखा, प्रकाश सोनकर को सांवेर से चुनाव जितवाने, अपने राजनीतिक गुरु फूलचंद वर्मा के संसदीय क्षेत्र शाजापुर में जमावट करने और राजगढ़ में दिग्विजय सिंह की घेराबंदी कर चुनाव हरवाने में प्यारेलाल खंडेलवाल, फूलचंद वर्मा, बड़े भैया इस तिकड़ी की खास भूमिका रही है। पार्षद का चुनाव जीत कर राजेंद्र और संजय ने उनके नाम को आगे बढ़ाया।

उनक नजदीकी लोग बताते हैं कि बाणगंगा स्थित उनके निवास पर रोजाना सुबह सैकड़ों की तादाद में लोग बाऊजी से अपनी समस्याओं को लेकर मिलने आते थे। बाऊजी उनमें से हरेक से मिलते थे। उनकी समस्याओं का यथायोग्य समाधान करते और फिर जिप्सी में अपने कुछ युवा साथियों के साथ शहर और ग्रामीण क्षेत्रों में दौरे पर निकलते थे। बड़े भैया दिल के साफ व्यक्ति थे। वो मोहब्बत करना और रिश्ते निभाने में यकीन रखते थे। यारों के असली यार थे बड़े भैया, विष्णुप्रसाद शुक्ला और खुरासान पठान पिछले 62 साल से साये की तरह एक दूसरे के साथ है।

एक हिन्दू एक मुसलमान, लेकिन एक है दोस्ती का ईमान। इनकी दोस्ती की उम्र और इनकी असली उम्र में बहुत ज्यादा फासला नहीं रहा। इन दोस्तों ने जमाने की हर अदावत झेली पर दोस्ती नहीं तोड़ी। इनके बच्चों के विवाह में दर्शनाभिलाषी में दोनों की पत्रिकाओं में एक दूसरे के नाम प्रमुखता से रहते हैं। बड़े भैया के बताते थे कि हमने लगभग पूरी उम्र साथ-साथ बिताई है लेकिन कभी एक दूसरे का मजहब नहीं पूछा। मैं ठेठ ब्राह्मण हूँ और खुरासान भाई ठेठ पठान। दोनों अपने -अपने धर्म के पक्के है लेकिन दोनों का धर्म और ईमान सिर्फ दोस्ती है।

ये पूछने पर कि दोनों की दोस्ती कब और कैसे हुई पठान कहते है कि अब तो ये भी याद नहीं हैं कि हम कब और कहां मिले थे। उस जमाने में ना तो फोन और मोबाइल तो छोडिए ज्यादातर घरों में बिजली भी नहीं होती थी। ज्यादातर लोग अपनी जिन्दगी से संघर्ष कर रहे थे ऐसे ही किसी मोड़ पर दोनों ने एक दूसरे का हाथ पकड़ थाम लिया और जिन्दगी तो हाथ छुडा नहीं पाई दोस्ती के दम पर मौत से भी लड़ लेंगे। बड़े भैया ने बताया था कि हमारी दोस्ती लोगों की आंखों में खूब खटकती थी। 1960 में, मै जनसंघ से जुडा था। उस समय जनसंघ की पहचान घोर हिन्दू पार्टी के रूप में थी। उन्होने खुरासान भाई को कहा कि मै जनसंघ से जुड़ गया हूं तुम भी पार्टी में आओगे क्या। तो खुरासान भाई ने तत्काल कहा तुम जहां मै वहां।

हम दोनों मिलकर जनसंघ का काम करने लगे। एक मुसलमान हिंदूवादी पार्टी का काम कर रहा है यह देखकर लोग हैरान रह जाते थे। पठान कहते है कि उस समय समाज के कुछ लोगों ने पहले मुझे बड़े भैया से दोस्ती तोड़ने को कहा, फिर घर वालों को समझाया जब इससे भी बात नहीं बनी तो बाकायदा उस समय के मुफ्ती ने मुझे और मेरे परिवार को समाज से बाहर निकालने के लिए फतवा तक जारी कर किया। शुक्ला कहते है पता मेरी दोस्ती में ऐसा क्या था कि खुरासान भाई ने समाज से टकराना उचित समझा पर मेरी दोस्ती नहीं तोड़ी। आखिरकार मुफ्ती साहब को फतवा वापस लेना पडा था

बड़े भैया अक्सर कहा करते थे कि हर व्यक्ति को अधिक मेहनत करना चाहिए करेगा, अपनी सेहत के पर ध्यान देना चाइए और अपने आप को टिपटॉप रखना चाहिए इससे हर हाल में हौंसला और जीवटता कायम रहती है। जीवन मूल्यों मे विश्वास रखने वाले बड़े भैया के दरवाजे से कभी कोई खाली हाथ नहीं लौटा। वे सदैव मदद को तैयार रहते थे । उन्होने अलग-अलग ब्राह्मण जातियों को साथ में खड़ा किया और परशुराम जयंती मनाना शुरू किया। यहीं से उनकी समाज में यात्रा शुरू हुई और वे सर्वब्राह्मण संगठन के अखिल भारतीय अध्यक्ष भी रहे।

सामाजिक विकास और आम व्यक्ति की खुशहाली को राजनितिक नेतृत्व के माध्यम से रेखांकित कर जनकल्याण का कदम उठाने वाले लोग निश्चित रूप से बहुमुखी व्यक्तित्व के मलिक होते है ऐसे ही बहुमुखी व्यक्ति थे पं.विष्णुप्रसाद शुक्ला ”बाबुजी” जिन्होंने न केवल सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक एवं शैक्षणिक क्षेत्र में अपनी अभिनव छवि के माध्यम से पहचान बनाई है। बल्कि जनकल्याण के कार्यो तथा विभिन्न गतिविधियों से सामाजिक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया है। जनकल्याण को मूल लक्ष्य मानकर राजनीतिक नेतृत्व प्रदान करने वाले बाबूजी ने सामाजिक उत्थान को हमेशा प्राथमिकता दी।

सामाजिक और ब्राह्मण समाज की गतिविधियों में अग्रणी रहने वाले बाबूजी ने श्री कान्यकुब्ज ब्राह्मण समाज के अध्यक्ष के रूप से सदैव समर्पित भाव से समाज को मार्गदर्शन दिया। उनके नेतृत्व में इंदौर सहित प्रदेश के विभिन्न शहरो में सामूहिक विवाह सम्मलेन सम्पन किये गए। सर्व ब्राह्मण संगठन को आत्मविश्वाश देने में सदैव तत्पर रहने वाले बाबूजी के नेतृत्व में इंदौर में कान्यकुब्ज महाविद्यालय एवं कान्यकुब्ज नर्सिंग महाविद्यालय की शुरुआत की गई। गरीब परिवार के प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को प्रोत्साहित कर उन्हे आगे बढ़ाने का यज्ञ कार्य बाबूजी के नेतृत्व में किया जाता रहा है। सहज, सरल एवं हसमुख स्वभाव के धनी बाबूजी शिक्षा के लोकतांत्रिकरण पर विशेष जोर दिया करते थे। क्योकि शिक्षा सामाजिक और सांस्क्रतिक बदलाव का मुख्य कारक होती है।

उनके निधन पर विनम्र श्रद्धांजलि।