एग्जिट पोल को सही रिजल्ट मानने की गलती ना करें | Exit Poll Results are not Accurate…

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रंजन श्रीवास्तव वरिष्ठ पत्रकार

एग्जिट पोल ने मोदी के प्रशंसको के बीच हर्ष की लहर पैदा कर दी है और यह जस्टिफाइड भी है पर मेरा मानना है कि इसे फाइनल रिजल्ट्स मानने की गलती नहीं करनी चाहिए। हो सकता है फाइनल रिजल्ट्स इससे अच्छा हो या बुरा हो। जिस तरह से मीडिया के एक बड़े वर्ग ने और बड़े चेहरों ने अपनी विश्वसनीयता पिछले 5 वर्षों में खोई है उससे एग्जिट पोल रिजल्ट्स के विश्वसनीयता पर अपने आप प्रश्न चिन्ह खड़ा हो जाता है।

जो पॉलिटिकल असेसमेंट अनुभवी पत्रकारों ने किया है उसके अनुसार भाजपा की सीट हर प्रदेश में कम हो रही है। हर प्रदेश का मतलब जहां उसका जनाधार 2014 के चुनाव में देखा गया। उत्तर प्रदेश भाजपा के लिए प्रमुख राज्य है। अगर भाजपा गठबंधन के कारण अपनी आधी या ज्यादा सीट खो देती है तो भाजपा के लिए ये बड़ा नुकसान है। अगर भाजपा 50-55 सीट पा जाती है तो भाजपा के लिए ये बड़ी जीत मानी जायेगी। और यह माना जाएगा कि गठबंधन का प्रयोग उत्तर प्रदेश में असफल रहा भाजपा के रथ को रोकने में।

वरिष्ठ पत्रकारों के अनुसार जिन्होंने कई राज्यों में दौरा किया भाजपा की लगभग 80-100 सीट्स कम होते दिख रही थी पर साथ में उसे वेस्ट बंगाल, ओडिशा और नॉर्थ ईस्ट में 2014 की अपेक्षा ज्यादा सीट्स मिलती नजर आ रही थी। अब सवाल ये है कि भाजपा का जो नुकसान उत्तर प्रदेश तथा अन्य प्रदेशों में हो रहा है क्या वह इस नुकसान की क्षतिपूर्ति कुछ अन्य प्रदेशों में मिले ज्यादा सीट्स की बदौलत कर पाएगी। इस सवाल का उत्तर 23 मई को मिल जाएगा।

इसमें कोई संदेह नहीं कि हिंदी बेल्ट में मोदी के नाम का अंडरकरेंट था। और ये अंडरकरेंट इस हद तक था कि लोगों ने बहुत सारे संसदीय क्षेत्र में वोट मोदी के नाम पर दिया, ना कि कैंडिडेट्स और पार्टी के नाम पर।

पर साथ में ये भी सत्य है कि विपक्ष का धार कुंद था और न्याय योजना जनता में वह प्रभाव नहीं डाल पाई जिसकी उम्मीद कांग्रेस प्रेसिडेंट राहुल गांधी को थी। इसका सीधा फायदा बीजेपी को ही जाता है।

मध्य प्रदेश में जो मेरा अनुमान था उसके अनुसार बीजेपी को 20-22 सीट और कांग्रेस को 8-10 सीट का था कुछ समय पहले तक पर कई दौरों के बाद जिस तरह मैंने मोदी के नाम का अंडरकरेंट देखा उस हिसाब से अगर कांग्रेस 5 से लेकर 8 सीट पर रुक जाती है या इससे भी कम सीट पाती है तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा। 8-10 सीट्स भी कांग्रेस की बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी।

पर भाजपा को ये बढ़त सिर्फ मोदी लहर के कारण नहीं होगा। मध्य प्रदेश में कांग्रेस सरकार जनमत को लोक सभा चुनाव अपने पक्ष में करने के लिए जो काम पिछले 5 महीने में करना चाहिए था वह नहीं कर पाई।

कांग्रेस सरकार भले ही बार बार ये कहे कि उसने 21 लाख किसानों का कर्ज माफ कर दिया पर सत्य ये है कि बहुत से ऐसे किसान मिले जिनका कर्ज आधा अधूरा माफ हुआ है। इससे उनमे गुस्सा था। और इससे पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की लोकप्रियता बढ़ी। वो बार बार मामा मामा बोल रहे थे। उनका ये भी बोलना था कि वे 2 लाख के भंवर में फंसकर कांग्रेस को वोट दे दिए थे। पर वो दुबारा ये ग़लती नहीं करेंगे। भाजपा का जो कैंपेन था सरकार के खिलाफ उसकी काट कांग्रेस नहीं कर पाई। जहां भाजपा का कार्यकर्ता या समर्थक कर्ज के मुद्दे पर सरकार को ग्रामीण इलाके में हर चौराहे पर घेरती नजर आयी कांग्रेस के कार्यकर्ता या समर्थक ऐसी जगहों पर नदारद दिखे।

कांग्रेस ने बेरोज़गारी के मुद्दे पर कोई ऐसा काम नहीं किया या या ऐसा कोई ब्लू प्रिंट पेश नहीं किया जिससे युवाओं पर इसका प्रभाव पड़ता। किसी भी सरकार के लिए 4-5 महीने में कोई भी चमत्कार करना संभव नहीं है। वह भी तब जब सरकार के सामने आर्थिक संकट हो। पर क्या ये अच्छा नहीं होता अगर सरकार इस बात को सामने रखती कि कैसे 55 लाख किसानों के 50000 करोड़ रुपए के ऋण माफी की बात करने के बाद 5000 करोड़ रूपए के सप्लीमेंट्री प्रोविजन में 21 लाख किसानों की कर्ज माफी संभव है। और अगर सरकार ने लगभग 10000 करोड़ रूपए की कर्ज माफी की है जैसा कि एक सत्ताधारी दल के नेता ने बताया तो शेष किसानों का 40000 करोड़ रुपए का ऋण कब तब माफ होगा?

बेरोज़गारी पर भी सरकार कोई स्थायी और प्रभावी ब्लू प्रिंट अब तक पेश नहीं कर पाई है। वचन पत्र में चार हजार रूपया प्रति माह 5 साल तक देने के वादे के बाद 100 दिन का रोज़गार युवावों को प्रभावित करने में असफल रहा। यही कारण है कि कांग्रेस न्याय योजना के लिए जो माहौल पैदा कर सकती है वह नहीं कर पाई।बहुत से ऐसे किसान मिले जिन्होंने कहा कि जब ऋण माफी के नाम पर नाम मात्र का पैसा मिला तो वो न्याय योजना का भरोसा कैसे करें।

बार-बार ये बात करने की बजाय कि सरकार ने 100 दिन में 75- 76 या 80-87 वचन को पूरा किया, अगर सरकार सिर्फ 5-10 वचनों को ही ठीक ढंग से पूरा कर पाती तो विपक्ष की बोलती बंद कर सकती थी और जनता पर इसका प्रभाव भी पड़ता क्योंकि वचन पत्र 5 साल के कार्यकाल के लिए है 100 दिन के लिए नहीं।

वृहद स्तर पर हुए अधिकारियों और कर्मचारियों के ट्रांसफर और पोस्टिंग ने और उसमें हुए पैसे के लेन देन के आरोप ने सरकार की इमेज और भी खराब की। एक अधिकारी के अनुसार सीएम के प्रिंसिपल सेक्रेटरी अशोक वर्णवाल सहित 2 और अधिकारियों को छोड़कर वल्लभ भवन में सारे अधिकारियों का तबादला किया गया। राज्य में हर तरफ अधिकारियों और कर्मचारियों का ट्रांसफर किया गया। सरकार अगर मई जून तक ट्रांसफर पोस्टिंग के लिए रुक जाती जरूरी ट्रांसफर और पोस्टिंग को छोड़कर तो इसका मैसेज अधिकारियों और कर्मचारियों को अच्छा जाता और भ्रष्टचार का इतना आरोप नहीं लगता। इसलिए कांग्रेस जो फायदा उठा सकती थी लोक सभा चुनावों के लिए पिछले 5 महीनों में वह उठा नहीं पाई।

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