भाई ने ये लकड़ी क्यों उठाई ….!

 @प्रकाश भटनागर 

सीहोर में रुद्राक्ष महोत्सव के रूद्र जाम को लेकर कैलाश विजयवर्गीय इतने क्रुद्ध क्यों हैं? इससे भी बड़ा सवाल यह कि विजयवर्गीय इस मसले पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान तथा सीहोर जिला प्रशासन को समान अनुपात में रौद्र रूप क्यों दिखा रहे हैं? यदि किसी जाम में हजारों लोगों की जान अटक जाए तो प्रशासन को कुछ तो करना ही होगा। व्यस्ततम सड़क पर 25 किलोमीटर तक वाहनों की गति के दम तोड़ देने के बाद कुछ तो सुधारात्मक कदम उठाने ही थे। मुमकिन है कि इसी फेर में प्रशासन ने कथावाचक पंडित प्रदीप मिश्रा से कुछ ऐसा कह दिया हो, जो बकौल मिश्रा और विजयवर्गीय ‘दबाव’ की श्रेणी में आता है और जिसे प्रशासन ‘निवेदन’ का स्वरूप देने की कोशिश कर रहा हो। सीहोर मुख्यमंत्री का गृह जिला है। अपने पन्द्रह साल के कार्यकाल में शिवराज ढेरों बड़े आयोजन प्रदेश में सफलता से करा चुके हैं। चाहे सिंहस्थ जैसा बड़ा आयोजन हो या फिर पार्टी के ही कई बड़े राजनीतिक कार्यक्रम। इसलिए ये कहना तो कठिन ही होगा कि सीहोर के मामले में कोई ऐसी लापरवाही हुई होगी जो शिवराज की छवि को प्रभावित करें। कैलाश जी की चिंता मुख्यमंत्री की छवि को लेकर ही है। और यह तो कैलाश जी ही नहीं दुनिया जानती है कि अपनी छवि को लेकर शिवराज खुद कितने सतर्क रहते हैं।

नरोत्तम मिश्रा गृह मंत्री हैं। इस नाते उन्होंने पंडित मिश्रा से बात कर अपने राजनीतिक और राज, दोनों ही किस्म के धर्म का निर्वहन किया है। किन्तु मुख्यमंत्री को चिट्ठी लिखकर विजयवर्गीय ने जिस तरह ‘शिव’ के समक्ष तीसरा नेत्र खोलने जैसा जतन किया है, उस पर कई सवाल उठते हैं। आप बेशक सनातनी श्रद्धालुओं की पीड़ा पर व्याकुल हो सकते हैं, मगर इस सारे प्रकरण को इज्तेमा से जोड़ना कुछ गले नहीं उतर पा रहा है। भोपाल में इज्तेमा हर साल होता है। यह तय रहता है कि उसमें लाखों लोग आएंगे। इसलिए उसे लेकर पुराने अनुभवों के आधार पर अग्रिम व्यवस्थाए करना आसान होता है। जब लगा कि इस आयोजन से राजधानी की यातायात व्यवस्था अधिक प्रभावित होने लगी है तो इसका स्थान भोपाल शहर से बाहर ईंटखेड़ी में तय कर दिया गया। अयोध्या विवाद तथा कोरोना के चलते इज्तेमा को भी समय-समय पर स्थगित किया गया है। स्पष्ट है कि व्यवस्थाएं बनाए रखने के लिए प्रशासन को कई बार ऐसे कदम उठाने पड़ जाते हैं, जो सीहोर के रुद्राक्ष महोत्सव से लेकर भोपाल के इज्तेमा तक पर समान रूप से लागू होते रहे हैं।

रुद्राक्ष महोत्सव को लेकर प्रशासन का यह पहला अनुभव था। इसके अलावा रूद्राक्ष महोत्सव की अनुमति के लिए आयोेजक श्री विट्ठलेश समिति सीहोर ने 7 फरवरी को एसडीएम को जो पत्र लिखा था, उसमें कहा गया था कि रूद्राक्ष महोत्सव ग्राम चितवलिया हेमा स्थित गौशाला परिसर में 28 फरवरी से 6 मार्च तक आयोजित है। कथा आनलाइन प्रसारण रहेगी जिसमें कुछ भक्तों के आने की संभावना है एवं हम कोरोना गाइड लाइन निर्देशों का पूरा पालन करेंगे। शाम को कुछ धार्मिक, सांस्कृतिक एवं राष्ट्र को समर्पित कार्यक्रमों का मंचन होगा। अत: रूद्राक्ष महोत्सव की अनुमति प्रदान करें। यह अनुमति पंडित प्रदीप मिश्रा ने ही मांगी थी। अब यह कोई सालाना नियमित कार्यक्रम नहीं है। यह इस साल पहली बार हो रहा था। कोरोना काल में कार्यक्रमों में संख्या की छूट सरकार ने चार फरवरी की शाम को ही दे दी थी। और पंडित मिश्रा ने यह अनुमति 7 फरवरी को मांगी थी। फिर भी हम मान लेते हैं कि जिम्मेदार अफसर यह ताड़ने में चूक कर गए कि इसमें लाखों श्रद्धालु पहुंच सकते हैं। यह चूक निश्चित ही गंभीर है। हालांकि ये समझना आसान नहीं है कि क्यों कर विजयवर्गीय ने इस मामले को विवाद की शक्ल देते हुए इसकी गरम हवा का रुख शिवराज की तरफ करने का प्रयास किया है। यदि इस विषय को मुख्यमंत्री की छवि पर विपरीत असर से जोड़ने की कोशिश की जा रही है तो फिर यह भी साफ है कि यह छवि की चिंता कम, बल्कि उस पर सवाल खड़े करने का जतन अधिक है।

यह वह समय है, जब भाजपा में अपनी-अपनी दमित राजनीतिक इच्छाओं की कुंठा के सने तीर अलग-अलग स्वरूप में शिवराज पर निशाना लगाकर चलाए जा रहे हैं। ताजा घटनाक्रम के तरकश में झांककर देखें तो वहां भी इसकी उपस्थिति साफ महसूस की जा सकती है। लकड़ी के तीर मजबूत होते हैं। किन्तु कैलाश भाई ने रास्ते में पड़ी लकड़ी क्या वाकई तीर बनाने के लिए ही उठाई थी? इसका उत्तर तलाशा जाना चाहिए। रूद्राक्ष महोत्सव में जो कुछ हुआ, शिवराज उसके दोषी नहीं हैं। तो क्या उनका दोष यह है कि वह शिवराज हैं? या मुख्यमंत्री का कसूर यह कि बीते पन्द्रह साल से अपनी ही पार्टी के महात्वाकांक्षी नेताओं के लिए उनकी सफलता एक राज ही बनी हुई है? रिकॉर्ड समय का शिव ‘राज’ और रिकॉर्ड किस्म की सफलता वाले शिवराज को लेकर पार्टी में कुंठित होने वालों की संख्या का बढ़ना स्वाभाविक प्रक्रिया है। इसमें आश्चर्य करने लायक जैसा कुछ भी नहीं है। इस बार इस नाराजगी ने इंदौर से व्हाया सीहोर होकर भोपाल तक का सफर तय किया है, ताजा प्रकरण में केवल यही नयापन है।

(प्रकाश भटनागर)