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रवीन्द्र नाथ टैगोर ये बयान आज देते तो लोग उनका जीना मुहाल कर देते | View of Ravindra Nath Tagore on Patriotism…

Posted on: 09 May 2019 11:18 by Surbhi Bhawsar
रवीन्द्र नाथ टैगोर ये बयान आज देते तो लोग उनका जीना मुहाल कर देते | View of Ravindra Nath Tagore on Patriotism…

रविंद्रनाथ टैगोर का आज जन्मदिन है. उनकी शख्सियत इतनी बड़ी थी कि जो भी उनसे मिलता था, उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं जाता था। देश का राष्ट्रगान लिखने वाले नोबेल पुरस्कार प्राप्त विजेता कवि गुरु रवीन्द्र नाथ टैगोर ने ऐसा बयान दिया था जिसे यदि वो आज देते तो लोग उनका जीना मुहाल कर देते। उनका यह बयान इतना विवादित हो जाता कि लोग उन्हें पाकिस्तान जाने की नसीहत दे डालते।

देशभक्ति से उपर मानवता

दरअसल, रविन्द्र नाथ टैगोर ने मानवता को देशभक्ति से उपर रखा था. उन्होंने कहा था कि ‘जब तक मैं जिंदा हूं, मानवता के ऊपर देशभक्ति की जीत नहीं होने दूंगा।’ यह बयान उन्होंने 101 साल अफ्ले दिया था। नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने किताब ‘Argumentative Indian’ में टैगोर संबंधित एक अध्याय में ‘टैगोर और उनका भारत’ में टैगोर के राष्ट्रीयता और देशभक्ति से जुड़ी बातें बताईं हैं, जो उन्होंने सामाजिक कार्यकर्ता और पादरी सी एफ एंड्रूज के हवाले से लिखी है।

एंड्रूज, महात्मा गांधी और टैगोर के करीबी मित्रों में से एक थे लेकिन गांधी और टैगोर के विचार एक दूसरे से अलग थे। टैगोर मानते थे कि देशभक्ति चार दिवारी से बाहर विचारों से जुड़ने की आजादी से हमें रोकती है। इतना ही नहीं उनका मन्ना था कि देशभक्ति दूसरे देशों की जनता के दुख दर्द को समझने की स्वतंत्रता भी सीमित कर देती है। वह अपने लेखन में राष्ट्रवाद को लेकर आलोचनात्मक नजरिया रखते थे।

राष्ट्रवाद की पुस्तक में एक बात सामने आई कि टैगोर ने 1916-17 के दौरान जापान और अमेरिका की यात्रा की। इस दौरान उन्होंने राष्ट्रवाद पर कई वक्तव्य दिए थे। 1917 में दिए एक भाषण में उन्होंने कहा था कि राष्ट्रवाद की धारणा मूलतः राष्ट्र की समृद्धि और राजनैतिक शक्ति में बढ़ोतरी करने में इस्तेमाल की गई है। शक्ति की बढ़ोतरी की इस संकल्पना ने देशों में पारस्परिक द्वेष, घृणा और भय का वातावरण बनाकर मानव जीवन को अस्थिर और असुरक्षित बना दिया है।

आगे टैगोर ने कहा कि राष्ट्रवाद सीधे-सीधे जीवन से खिलवाड़ है, क्योंकि राष्ट्रवाद की इस शक्ति का प्रयोग बाहरी संबंधों के साथ ही राष्ट्र की आंतरिक स्थिति को नियंत्रित करने में भी होता है। ऐसी स्थिति में समाज पर नियंत्रण बढ़ना स्वाभाविक है। ऐसे में समाज और व्यक्ति के निजी जीवन पर राष्ट्र छा जाता है और एक भयावह नियंत्रणकारी स्वरूप हासिल कर लेता है। दुर्बल और असंगठित पड़ोसी राज्यों पर अधिकार करने की कोशिश राष्ट्रवाद का ही स्वाभाविक प्रतिफल है। इससे पैदा हुआ साम्राज्यवाद अंततः मानवता का संहारक बनता है।’

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