उत्तम स्वामी: नर्मदा के दर्शन मात्र से पुण्य प्राप्त होता है

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जब पहली बार उत्तम स्वामी से उनके प्रवचन मे मिले थे और उनसे काफी प्रभावित हुए थे उनके प्रवचन की आकर्षक शैली, सरल शब्द रचना और सहज प्रस्तुति उन्हें आकर्षित कर गई श्रीधर पराड़कर जी ने उनपे किताब लिखी है जिसका नाम ‘सिध्द्योगी-श्री उत्तम स्वामी’ है.हम उसीके कुछ अंश रोज आपके साथ साझा करेंगे।

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स्वामी जी बचपन से नर्मदा अष्टक का पाठ किया करते थे। मन में नर्मदा का विशेष आकर्षण था। टाटअंबरी बाबा के आश्रम में रहते हुए नर्मदा परिक्रमा वासियों से मिलना हुआ था। उनसे नर्मदा की महिमा व परिक्रमा के बारे में सुना था। उत्सुकता भी थी कि देखना चाहिए कि लोग नर्मदा परिक्रमा क्यों करते हैं क्यों इसका इतना महत्व है। गंगा मैया परम पवित्र मानी गई है अन्य नदियों की महिमा है परंतु परिक्रमा केवल नर्मदा मैया की ही की जाती है। नर्मदा मैया की परिक्रमा साधक की परीक्षा भी है कहा भी गया है कि नर्मदा का अर्थ ही है…नर-मद-हर।

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सरस्वती तीन युग की, यमुना चार युग की गंगा पांच युग की और नर्मदा 7 युग की नदी मानी गई है। गंगा त्रेता युग की, यमुना द्वापर युग की सरस्वती सतयुग की और नर्मदा कलयुग की प्रधान नदी है।33 करोड़ देवता नर्मदा में अवगाहन को आते हैं। नर्मदा नदी के क्षिप्रदायिनी माना गया है। मान्यता है कि सरस्वती के तट पर 7 दिन वास करने से पुण्य प्राप्त होता है। यमुना 3 दिन और गंगा तट पर एक दिन रहने से पुण्य मिलता है। पर नर्मदा के दर्शन मात्र से पुण्य प्राप्त होता है। भारत की सारी नदियां विवाहित है केवल नर्मदा ही कुंवारी है।

यमुना के पिता ब्रह्मा है। गंगा के विष्णु और नर्मदा के शिव माने गए हैं। कुंवारी कन्या से पिता का सर्वाधिक स्नेहा होता है वह उसके प्रत्यय की इच्छा पूर्ण करते है। पुत्री के भक्तों पर उसकी विशेष कृपा स्वाभाविक ही है। सामान्यतः प्रत्येक परिक्रमा वासी को मां नर्मदा के दर्शन हो ही जाते हैं।  अतः पर्वत परिक्रमा करने की इच्छा बहुत पहले से मन में थी। अब अवसर था साधना पूर्ण हो चुकी थी समाज में समाहित होने के पूर्व समाज को जानना आवश्यक था। परिव्राजक के रूप में भ्रमण समाज को जानने का विचार सर्वोत्तम साधन है। परिक्रमा का विचार मन में आते ही सब कुछ छोड़ ओम्कारेश्वर पहुंचे और परिक्रमा का संकल्प ले निकल पड़े कठिन यात्रा पर। कठिन यात्रा इसलिए क्योंकि नर्मदा परिक्रमा के नियम अत्यंत कठोर है।

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यात्रा काल में पादत्राण नहीं पहने जाते। पास में पैसा नहीं रखा जाता। गृहस्थ के घर में रात्रि विश्राम नहीं किया जाता। मठ मंदिर अथवा आश्रम में रात बिताई जाती है। किसी चीज का संग्रह नहीं किया जाता। भिक्षा मांगकर उदार निर्वाह किया जाता है। परिक्रमा पूर्ण होने तक नर्मदा को पार नहीं किया जाता। परिक्रमा वासी इन नियमों का यथाशक्ति पालन करते हैं। स्वामी जी सामान्य परिक्रमा वासी थोड़े ही थे, उन्होंने सारे नियमों का अक्षरश से पालन किया। गृहस्थी का घर तो दूर, स्वामी जी मंदिर, मठ, आश्रम में भी नहीं रुकते थे। रात्रि होने पर नर्मदा मैया के घाट, वृक्ष तले अथवा श्मशान में रात गुजारते। पांच घरों से भिक्षा मांगते प्रत्येक घर से केवल एक रोटी लेते भिक्षा मिली तो ठीक अन्यथा छठे घर का द्वार नहीं बजाते थे। भिक्षा में पका हुआ भोजन ही लेते थे। दीक्षा प्राप्त कर नर्मदा मैया के घाट पर जाते और 5 रोटियां नर्मदा में छोड़ते जो उनकी तरफ आती उसे ग्रहण करते हैं और आगे की ओर जाती उसे नर्मदा मैया के लिए छोड़ देते। इस नियम के कारण कई बार निराहार भी रहे क्योंकि पाचो रोटिंया नर्मदा मैया ग्रहण कर लेती थी।

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परिक्रमा मार्ग में एक स्थान आता है- शूलपानी। इस बन के वनवासी यात्रियों का धन सामान लूट लेते हैं। यहां तक कि सारे कपड़े उतरवा लेते हैं। आनाकानी करने पर मारपीट करने में संकोच नहीं करते। प्रत्येक परिक्रमा वासी को इससे गुजरना ही पड़ता है। स्वामी जी का वनवासियों से सामना अलग प्रकार से हुआ वनवासियों ने अपने चिर परिचित चर्या के विपरीत व्यवहार किया। लूटने के स्थान पर उन्होंने स्वामी जी का स्वागत किया। ना तो लूटपाट की और ना ही किसी प्रकार का कष्ट दिया। आग्रह कर स्वामी जी को रोक लिया स्वामी जी उन्हें भागवत कथा सुनाते थे। इस प्रकार 8 दिन गुजरे स्वामी जी के मन में विचार आया कि यहीं रुक गया तो परिक्रमा पूर्ण नहीं होगी। इधर वनवासियों का आग्रह वह प्रेम पूर्ण व्यवहार पर आगे बढ़ने नहीं दे रहा था। रात्रि में सोए थे कि 2:00 बजे के लगभग आवाज सुनाई दी तू यहां क्या कर रहा है आगे जा स्वामी जी हडबडाकर जगे। आवाज साफ सुनाई दी थी लेकिन आसपास कोई नहीं था।

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