उत्तम स्वामी जी: प्राप्त ज्ञान को लोगों के बीच बांटने की इच्छा से प्रवचन करने लगे

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जब पहली बार उत्तम स्वामी से उनके प्रवचन मे मिले थे और उनसे काफी प्रभावित हुए थे उनके प्रवचन की आकर्षक शैली, सरल शब्द रचना और सहज प्रस्तुति उन्हें आकर्षित कर गई श्रीधर पराड़कर जी ने उनपे किताब लिखी है जिसका नाम ‘सिध्द्योगी-श्री उत्तम स्वामी’ है.हम उसीके कुछ अंश रोज आपके साथ साझा करेंगे।

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चिंचवड का वास्तव्य पूर्ण कर उत्तम जन्म स्थान लोहा गांव लौट आया मगर रहता मठ में ही था। शांतिनाथ महाराज के मठ में प्रतिवर्ष एकनाथ षष्ठी के अवसर पर भागवत सप्ताह का विशाल आयोजन होता है। आयोजन में महाराष्ट्र भर के विद्वान सम्मिलित होते हैं। दिन में भागवत कथा व सायंकाल कीर्तन होता है। उत्तम ने 15 वर्ष की आयु में पहली बार अपने गांव में कीर्तन किया आवाज समुद्र मधुर थी। अब तो वेद वेदांग व संगीत में भी निश्चित हो चुका था एकत्रित विद्वान बाल ब्रह्मचारी के प्रवचन प्रवचन से प्रभावित हुए कई ने कीर्तन पश्चात उसकी पीठ के यहां से उत्तम नियमित रूप से कीर्तन करने लगा। आसपास के स्थानों से कीर्तन के लिए निमंत्रण आने लगे ध्यान धारणा का क्रम भी जारी था

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गांव में रहने पर भी कभी घर नहीं जाता था। यहां तक कि किसी कष्ट अथवा अस्वस्थता में भी घर की याद नहीं करता। एक बार की बात है एक पड़ोसी दर्शन के निमित्त मठ गया था। उसने देखा उत्तम मठ में अकेला ही है ज्वर चढ़ने से शरीर तवे समान तप रहा है सेवा तो दूर औषधी आदि ला कर देने वाला भी कोई नहीं था। वह मठ से सीधे उनके घर गया और देवीदास जी से पूछा आप लोग मठ कब गए थे? काफी दिनों से नहीं जाने का उत्तर मिलने पर उसने उत्तम कि अस्वस्थता के बारे में बताया।

उत्तम की लोकप्रियता दिनों दिन बढ़ रही थी मानवीय दुर्बलताए सन्यासी बन जाने पर भी आसानी से पीछा नहीं छोड़ती है। उनकी योग्यता और लोकप्रियता से आश्रम के बाकी लोग इर्ष्या करने लगे। मठ से उसे मोह तो था नहीं। मठाधीश बनने अथवा मठ से चिपके रहने की इच्छा भी नहीं थी। प्राप्त ज्ञान को लोगों के बीच बांटने की इच्छा भर मन में थी। इधर माता-पिता आग्रह कर रहे थे कि तपस्या और घूमना काफी हो चुका है। पूजा पथ और प्रवचन जो करना है करे और घर पर रहे। कई बार विवाह की चर्चा करपुत्र का मन टटोलनेका प्रयास किया गया। बार-बार के आग्रह से तंग आकर सन्यासी पुत्र ने हाथ में जल लेकर सबके सामने संकल्प लेते हुए कहा कि आपका पुत्र आजीवन ब्रह्मचारी ही रहेगा। टूट जाएगा पर संकल्प से डिगेगा नही।

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विवाह का विषय समाप्त हो चुका था। यह भी ध्यान में आ गया था कि पुत्र का मन मठ से उजड़ गया है। इस कारण शंका थी कि फिर से कहीं निकल न जाए। इसलिए परिजन विशेष ध्यान रख रहे थे। मगर जल के प्रवाह को कब तक बांध कर रखा जा सकता था।

एक बार स्वामी जी खंडवा के दादाजी धूनीवाले के समाधि के दर्शन करने बड़ौदा से पैदल निकले। साथ में कोई न था। मार्ग में जो मिल गया खा लिया और जहाँ रात हुई वाही पर सो गए। लंबी यात्रा से शरीर क्लान्त हो चुका था। पैर के तलवों में छाले पड़ गए थे। उस पर पैर की पुराणी चोट ने अपना रंग दिखाना प्रारंभ कर दिया। मगर खंडवा अभीभी 20 किलोमीटर दूर था। पैर आगे बढ़ने को तैयार नहीं थे। एक एक पग उठाना कठिन हो रहा था। इस अवस्था में रात को सोए जरूर पर मन में कसक थी कि कल सुबह दर्शन करने थे, अब पहुंच नहीं सकूंगा। क्या किया जा सकता है। जैसी बाबा की मर्जी। शरीर बुरी तरह थका हुआ तो था ही, गहरी नींद आई और आश्चर्य, सुबह उठे तो देखा कि समाधि मंदिर के सामने है .

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