‘राइट टू वाटर’ की सार्थकता तभी जब पानी पैसे की तरह बचे…

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अजय बोकिल

मध्य6प्रदेश की कमलनाथ सरकार राज्य में ‘पानी का अधिकार’ कानून लागू करके देश में ‘सबसे पहले’ का तमगा अपने सीने पर टांक सकती है, लेकिन इस ‘राइट’ के साथ जो व्यावहािरक मसले जुड़े हुए हैं, वो किसी भी राजनीतिक अथवा सामाजिक पहल को टाइट कर सकते हैं। मप्र के लोकस्वास्थ्यि मंत्री सुखदेव पांसे ने कहा कि मध्य प्रदेश देश का पहला पानी का अधिकार कानून लागू करने वाला प्रदेश होगा। प्रस्तावित कानून के तहत सरकार की गाइडलाइन के अनुसार प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 55 लीटर पानी दिया जाएगा। कानून में पानी के नागरिकों की पहुंच में, पर्याप्त और पीने योग्य होने के प्रावधानों को शामिल किया जाएगा। इस कानून में पानी की बरबादी रोकने के कड़े प्रावधान भी होंगे।

बारिश के पानी को सहेजा जाएगा। तालाब, बांध और जलस्रोतों के कैचमेंट एरिया में पौधरोपण किया जाएगा। जल संवर्धन के काम किए जाएंगे। कैचमेंट एरिया पर अतिक्रमण पर निगरानी रखने के लिए कानून में प्रावधान होंगे। पानी के दोबारा उपयोग (रि-साइकलिंग), वाटर रिचार्जिंग, पानी का परिवहन, वितरण प्रबंधन योजना भी होंगे। इसी संदर्भ में राजधानी में 24 जून को एक सेमीनार भी हुआ, जिसमें ‘पानी के अधिकार’ से जुड़े विभिन्न बिंदुअों पर ‍िवशेषज्ञों ने अपने विचार रखे।
कहा जा रहा है कि अगला विश्व युद्ध जमीन के बजाए जल को लेकर ही होगा, क्योंकि पेयजल का संकट विश्वव्यापी है। दरअसल ‘राइट टू वाॅटर’ से आशय उस कानूनी अधिकार से है, जिसके अंतर्गत एक व्यक्ति को किसी जल स्रोत से पानी प्राप्त करने का हक मिलता है। एक तरह से साफ पानी प्राप्त करना व्यक्ति का मौलिक ‍अधिकार है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2010 में स्वच्छ जल की उपलब्धता को लेकर एक प्रस्ताव मंजूर किया था कि जल एवं स्वच्छता व्यक्तियों का मौलिक अधिकार है और इसे सुनिश्चित करना सभी की जिम्मेदारी है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में भी नागरिकों को स्वच्छ पेयजल पाने का अधिकार मान्य किया गया है।

अब सवाल है कि क्या मप्र में इतना पानी उपलब्ध है कि राज्य की करीब 8 करोड़ आबादी को प्रतिदिन 3.5 अरब लीटर (निर्धारिक मानक के मुताबिक) उपलब्ध कराया जाए ? अगर हां तो कैसे? जब वर्तमान में सरकार ,स्थानीय निकाय व पंचायतें शहरों और गांवों में समुचित साफ पानी मुहैया नहीं करा पा रहीं है तो पानी का अधिकार लागू होने के बाद कैसे करेंगी? क्योंकि मप्र में जल का मुख्यर स्रोत वर्षा जल ही है। राज्य की सभी नदियों में पानी बारिश अथवा जंगलों से रिसकर आता है। लेकिन आज राज्य की 40 में से ज्यादातर नदियां सूखी हैं। राज्य में वर्षा का औसत भी हर साल कम हो रहा है,क्योंकि जंगल लगातार कट रहे हैं। दूसरा और अहम उपाय बारिश के पानी का संरक्षण है।

इसके लिए मप्र में पिछले 30 सालों में वि‍भिन्न सरकारों ने जल संरचनाओं के निर्माण और उनके संधारण की कई योजनाएं चलाई, लेकिन नतीजा यह है कि आज राज्य की बड़ी आबादी प्यासी है। मप्र में तीन दशक पहले तत्कालीन मोतीलाल वोरा सरकार ने ‘सरोवर, हमारी धरोहर’ योजना चलाई थी। उसके बाद दिग्विजयसिंह सरकार ने ‘एक पंच, एक तालाब’ योजना लागू की। मकसद वही था। फिर शिवराज सरकार ने ‘बलराम तालाब योजना’ लागू की। इनके अलावा एक ‘खेत तालाब योजना’ भी लागू है। इन तमाम योजनाअोंपर अरबों रू. खर्च हुए ,लेकिन जमीन पर ये जल संरचनाएं आज कहां है और किस हाल में हैं, कोई नहीं जानता।

जहां तक जल स्रोतों का सवाल है तो मप्र की ‍स्थिति राजस्थान जैसे राज्यों से बेहतर है, लेकिन जिस अंधाधुंध तरीके से भूजल दोहन किया जा रहा है, वह अलार्मिंग स्तर पर है। जल पुरूष राजेन्द्र सिंह का कहना है कि ‘राइट टू वाटर’ के पहले ‘वाटर सेफ्टीम‘ (जल सुरक्षा) ज्यादा जरूरी है। क्योंकि जितना भूजल जमीन के गर्भ से बेरहमी से खींचा जा रहा है, उसका केवल 5 फीसदी रिचार्ज हो रहा है। कहने को राज्य में ‘रेन वाटर हार्वेस्टिंग’ कानून लागू है, लेकिन बहुत कम बसाहटों में इस पर अमल हुआ है। अगर वाटर रिचार्ज का काम ही ईमानदारी से हो जाए तो वाटर का राइट अपने आप मिल जाएगा। इसी के साथ उपलब्ध पानी के साथ उसकी शुद्धता का प्रश्न भी अहम है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, भारत में लगभग 9.7 करोड़ लोगों को पीने का साफ पानी उपलब्ध नहीं होता। गांवों में तो स्थिति और भी खराब है।

एक और अहम मुद्दा घटते जल संसाधनो और बढ़ती आबादी का है। आधुनिक जीवन शैली पानी का तुलनात्मक रूप से ज्यादा इस्तेमाल करती है। पानी सीमित है, लेकिन उसे पीने वाले कंठों की तादाद बढ़ती जा रही है। इस बारे में कोई बात नहीं करना चाहता, क्योंकि उससे राजनीतिक हितों को नुकसान पहुंचने का खतरा है। जबकि जल एक बुनियादी और जीवनावश्यक प्राकृतिक संसाधन है। मप्र में इसे बचाने के लिए बीते वर्षों में पैसा पानी की तरह बहाया गया, फिर भी पानी पैसे की तरह नहीं बच सका। पानी के अधिकार की यह पहल यकीनन अच्छी है, बशर्ते कि इस पर सर्वांगीण विचार के साथ ठोस पहल हो। जल ही जीवन है और इसे बचाने तथा उसके समुचित वितरण की चिंता विश्वव्यापी है।

‘राइट टू वाटर’ की सार्थकता तभी है, जब पानी का उपयोग, उसे बचाने की संकल्पशक्ति के साथ करें। बूंद बूंद की कीमत समझें। अनेक व्यावहारिक कठिनाइयों और चुनौतियों के बाद भी ‘पानी’ जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण पर कमलनाथ सरकार गंभीरता से सोच रही है तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए। इस विश्वास के साथ कि यह सिर्फ एक सियासी जुमला बनकर नहीं रहेगा।

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