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किसानों का पर्व है मकर संक्रांति न कि दान दक्षिणा का!

Posted on: 14 Jan 2019 15:54 by Surbhi Bhawsar
किसानों का पर्व है मकर संक्रांति न कि दान दक्षिणा का!

नीरज राठौर

मकर संक्रांति के दिन किसान अपनी अच्छी फसल के लिए प्रकृति को धन्यवाद देकर अपनी अनुकम्पा को सदैव लोगों पर बनाये रखने का आशीर्वाद मांगते हैं। इसलिए मकर संक्रांति के त्यौहार को फसलों एवं किसानों के त्यौहार के नाम से भी जाना जाता है। दरअसल मकर संक्रांति किसानी पर्व है, इसका दान दक्षिणा से कोई संबंध नहीं है। संक्रांति फसलों के आगमन की ख़ुशी रूप में मनाया जाता है और इस पर्व का नाम संक्रांति नही है, ये तो पंडो का दिया हुआ नाम है।

उत्तर प्रदेश में खिचड़ी, पंजाबियों के लिए लोहड़ी, असम में मघ बिहू और दक्षिण भारत में पोंगल नाम से जाना जाता है। संपूर्ण भारत में मकर संक्रांति विभिन्न रूपों में मनाया जाता है। विभिन्न प्रांतों में इस त्यौहार को मनाने के जितने अधिक रूप प्रचलित हैं उतने किसी अन्य पर्व में नहीं।

हरियाणा और पंजाब में लोहड़ी

हरियाणा और पंजाब में इसे लोहड़ी के रूप में एक दिन पूर्व 13 जनवरी को ही मनाया जाता है। इस दिन अंधेरा होते ही आग जलाकर अग्निदेव की पूजा करते हुए तिल, गुड़, चावल और भुने हुए मक्के की आहुति दी जाती है। इस सामग्री को ‘तिलचौली’ कहा जाता है। इस अवसर पर लोग मूंगफली, तिल की बनी हुई गजक और रेवड़ियां आपस में बांटकर खुशियां मनाते हैं। बहुएं घर-घर जाकर लोकगीत गाकर लोहड़ी मांगती हैं। नई बहू और नवजात बच्चे के लिये लोहड़ी का विशेष महत्व होता है। इसके साथ पारंपरिक मक्के की रोटी और सरसों के साग का आनंद भी उठाया जाता है।

बिहार में खिचड़ी

बिहार में मकर संक्रांति को खिचड़ी नाम से जाता हैं। इस दिन उड़द, चावल, तिल, चिवड़ा, गौ, स्वर्ण, ऊनी वस्त्र, कंबल दि दान करने का अपना महत्त्व है। महाराष्ट्र में इस दिन सभी विवाहित महिलाएँ अपनी पहली संक्रांति पर कपास, तेल व नमक आदि चीजें अन्य सुहागिन महिलाओं को दान करती हैं। तिल-गूल नामक हलवे के बांटने की प्रथा भी है। लोग एक दूसरे को तिल गुड़ देते हैं और देते समय बोलते हैं -“लिळ गूळ घ्या आणि गोड़ गोड़ बोला” अर्थात तिल गुड़ लो और मीठा-मीठा बोलो।

तमिलनाडु में पोंगल

तमिलनाडु में इस त्यौहार को पोंगल के रूप में चार दिन तक मनाते हैं। प्रथम दिन भोगी-पोंगल, द्वितीय दिन सूर्य-पोंगल, तृतीय दिन मट्टू-पोंगल अथवा केनू-पोंगल और चौथे व अंतिम दिन कन्या-पोंगल। इस समय खरीफ की फसल कट चुकी होती है और खेतों में रबी की फसलें लहलहा रही होती हैं, खेतों में सरसों के फूल मनमोहक लगने लगते हैं। तो भला किसान अपनी खुशी क्यों ना जताए? सही मायनो में यह किसानो का पर्व है ना कि धर्म के नाम पर लुटने एवं लुटाने का।
पता नही मकर संक्रांति के नाम पर ठगों ने आज कितने लोगो की जेबे काटी होंगी।

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