सीतारमण का आर्थिक ज्ञान और ओला, उबर की गहरी मार…!

कांग्रेस ने सवाल किया कि ( कारों के अलावा) क्या वित्त मंत्री बसों और ट्रकों की बिक्री में गिरावट को भी युवा वर्ग के व्यवहार में आए बदलाव से जोड़ती हैं ?

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अजय बोकिल

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने देश में आॅटोमाबाइल उद्दयोग में जारी भारी मंदी के जो कारण गिनाए हैं, उससे उनकी आर्थिकी की समझ पर सवालिया निशान लग रहे हैं। सीतारमण ने हाल में मोदी सरकार की सौ दिन की उपलब्धिमयों का बखान करने के मौके पर आॅटो इंडस्ट्री की बदहाली के संदर्भ में कहा कि आज का युवा वर्ग नई कार के लिए ईएमआई का भुगतान करने से अधिक ओला और उबर की सेवा का उपयोग करना पसंद कर रहा है। उसकी सोच अपनी कार खरीदने के झंझट में पड़ने के बजाए ओला या उबर या मेट्रो से यात्रा को तरजीह देने की है। इस पर विपक्षी पार्टियों और सोशल मीडिया पर लोगों ने वित्त मंत्री के बयान के खूब मजे लिए। कांग्रेस ने सवाल किया कि ( कारों के अलावा) क्या वित्त मंत्री बसों और ट्रकों की बिक्री में गिरावट को भी युवा वर्ग के व्यवहार में आए बदलाव से जोड़ती हैं ? जबकि सोशल मीडिया में कमेंट आया कि इसरो को इसलिए अंतरिक्ष यात्री नहीं मिल रहे क्योंकि युवा पीढ़ी की दिलचस्पी केवल अंतरिक्ष में है।

सरकार कुछ भी दावे करे लेकिन कड़वी हकीकत यह है कि आज आॅटोमोबाइल उद्दोग दो दशको की सबसे बड़ी मंदी का सामना कर रहा है। भारतीय वाहन निर्माता कंपनियों के संगठन (सियाम) द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक इस अगस्त में देश में वाहनो की बिक्री में वर्ष 1997-98 के बाद की सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। देश में वाहनो की बिक्री पिछले साल इसी माह की तुलना में 23.55 फीसदी घट गई है। केवल यात्री वाहनो की बिक्री ही 31.57 फीसदी कम हो गई है। आलम यह है कि वाहन निर्माता कंपनियों ने अपने कारखाने हफ्ते में दो दिन बंद रखना शुरू कर दिया है। कई शोरूम बंद हो चुके हैं या फिर उसकी कगार पर है। हजारों लोगों की नौकरियां चली गई हैं।

आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? क्या लोगों में चार पहिया वाहन और खासकर कारें खरीदने का उत्साह खत्म हो गया है या कारें खरीदने के लिए उनके पास पैसे ही नहीं हैं? मिलेनियल ( 21 वीं सदी में जन्मी) पीढ़ी की रूचि कार में अब नहीं रही है या कार अब सम्पन्नता और वैभव के प्रदर्शन का वैसा मोबाइल पोस्टर नहीं रही , जैसा कि पिछली सदी में जन्मी पीढ़ी के लिए हुआ करता था। कार को अलग रखें तो बाकी यात्री वाहनो में घटत की वजह क्या होनी चाहिए? जब देश की आबादी लगातार बढ़ रही हो और यात्रा व यात्रियों की तादाद में भी इजाफा हो रहा हो, तब यात्री वाहनो की मांग का कम होना वाकई चौंकाने वाला है। ठीक वैसे ही कि घर में बहुअों की संख्या बढ़े लेकिन जेवरों की मांग घट जाए।

अर्थ विशेषज्ञों का कहना है कि बाजार में मांग नहीं है, इसलिए वाहन उद्दयोग भी हाथ पर हाथ रखकर बैठने पर मजबूर हुआ है। नकदी का संकट तो पहले से ही था, लेकिन जिनके पास पैसा है, उन्होंने भी कार वगैरह की खरीदी को रईसी मानकर हाथ तंग कर लिया है। सरकारी मांग भी वैसी नहीं है, जैसे पहले हुआ करती थी। कुलमिलाकर आलम यह है कि तैयार गाडि़यों के लिए ही खरीदार मुश्किल से मिल रहे हैं तो नई गाडि़यों के खरीदार कहां से लाएं। फिर कोई आॅटो मोबाइल कारखाना मांग देखकर सिंदूर नहीं भरता। उसे बाजार में सतत मांग चाहिए, तभी धंधा चलता है।

वित्त मंत्री ने जो कहा, उसका एक अर्थ यह है कि नई पीढ़ी के उपभोक्ता व्यवहार में एक गुणात्मक बदलाव आया है। कारों आदि को लेकर उसमें वो आकर्षण नहीं है, जो पिछली पीढ़ी में था। वो खुद कारें इसलिए नहीं खरीद रहे कि कर्ज लेकर कार खरीदने से अच्छा है कि किसी अोला उबर को हायर करें और पेटीएम से पेमेंट कर किसी का अहसान न ढोएं। क्योंकि उनमें से ज्यादातर की मासिक आय इतनी है ही नहीं कि वे अपना पेट भी भरें और बैंक की ईएमआई भी नियमित भरें। लिहाजा अोला और उबर जैसे टैक्सी एग्रीगेटर्स से टैक्सी हायर करके अपना काम चलाएं। यकीनन यह एक तरह का कल्चरल चेंज है। यानी युवा कार में बैठना तो चाहते हैं, लेकिन उसे पालने का बोझ नहीं उठाना चाहते।

बेशक, ऑटोइंडस्ट्री की सुस्ती का यह एक कारण हो सकता है, लेकिन अगर ऐसा ही है तो ओला और उबर के बटुए तो खचाखच भरे होने चाहिए थे। भारत में ऑनलाइन टैक्सी नेटवर्क में अोला का कारोबार सबसे बड़ा है। नौ साल पहले एक भारतीय भावेश अग्रवाल द्वारा स्थापित इस कंपनी का सालाना राजस्व 22 करोड़ से ज्यादा का है। इसके बावजूद यह कंपनी दो साल पहले तक घाटे में थी। पिछले साल ही कंपनी को महज 9.6 लाख रू. का मामूली फायदा हुआ है। कमोबेश यही हाल मूलत: अमेरिकी कंपनी उबर का है। भारत में अपने आगमन के बाद से घाटे में चल रही उबर ने इस वित्तीय वर्ष में 3.2 लाख रू. के लाभ का अनुमान रखा है। हो सकता है कि लाभ के आंकड़ो में कुछ हेराफेरी हो, लेकिन जो सामने है, वह दांत खुरच कर पेट भरने जैसा है।

अगर वित्त मंत्री का आॅब्जर्वेशन सही है तो अोला और उबर को फायदे के मामले में अंबानी से टक्कर लेनी चाहिए थी। वैसा कुछ भी नहीं है। युवा अोला आदि के भरोसे इसलिए नहीं हैं कि वो अब किराए की जिंदगी बसर करके खुश हैं, बल्कि इसलिए हैं कि उनके पास पैदल चलने के अलावा यही ‍िवकल्प है। ताजा खबर तो यह है कि अब अोला व उबर के यात्रियों की संख्या भी घट रही है, क्योंकि ये भी लोगों के लिए अफोर्डेबल नहीं रहा है।

केन्द्रीय वित्त मंत्री ने एक हवाला सड़कों पर बढ़ते ट्रैफिक, पर्यावरण नियमो बीएस 6 तथा गाडि़यों पर ज्यादा टैक्सेशन का दिया। ये भी कारण हैं, लेकिन ये ही कारण नहीं हैं। क्योंकि कार या यात्री वाहन कोई साइकल अथवा आॅटो रिक्शा खरीदना नहीं है। जब कोई कार या बड़ा यात्री वाहन खरीदने का मन बनाता है तो उसकी कीमत मय करों के अदा करने की ‍तैयारी से ही बनाता है। रजिस्ट्रेशन चार्ज अथवा जीएसटी बढ़ने से कारों की खपत घट गई, यह कहना वैसा ही है कि जैसे मसाले के भाव बढ़ जाने से मुर्गों की बिक्री घट जाना।

भारत का ऑटोमोबाइल उद्योग विश्व का चौथा सबसे बड़ा ऑटोउद्योग है। लेकिन अब यह कराह रहा है। हालांकि उम्मीद अभी टूटी नहीं है कि अच्छे दिन लौटेंगे। लेकिन कैसे, यह कहना मुश्किल है। कई लोग इसके पीछे सरकार की अदूरदर्शी नीतियों को कारण मानते हैं। कहा यह भी जा रहा है कि युवा पीढ़ी में छोटी हैचबैक कारों का आकर्षण खत्म हो गया है। बड़ी और महंगी कारें खरीदना आसान नहीं है। सामाजिक तौर पर एक बदलाव यह भी हुआ है ‍कि जो मध्यम वर्ग जो कारें खरीदने में सक्षम था अथवा यह उसकी आर्थिक सम्पन्नता का प्रतीक थी, उसके पास अब सेचुरेशन की स्थिति है। एक से ज्यादा कार अफोर्ड करना सब के बस की नहीं है। उनकी पार्किंग और भीड़ में बदलता ट्रैफिक भी कार खरीदी को लेकर बढ़ती विरक्ति का प्रमुख कारण है।

लेकिन सबसे बड़ा कारण है अर्थ व्यवस्था और आर्थिक व्यवहारों को लेकर बढ़ता अविश्वास। इस बात का भरोसा घटना कि आज जेब खाली हुई तो कल फिर भर जाएगी। बाजार में भीड़ देखकर यह निष्कर्ष निकाल लेना कि अब हर दिन धन तेरस है, आंखों पर पट्टी बांध कर दौड़ने जैसा है।

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