संविधान द्वारा प्रदत्त समानता का अधिकार, समान परिस्थितियों में ही व्यक्ति के स्थापित होने पर ही लागू

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नीरज राठौर की कलम से

संविधान के अनुच्छेद 14 के अनुसार, विधि के समक्ष समानता एवं विधियों के समान संरक्षण में क्या अंतर है?

संविधान के अनुच्छेद 14 (1) के अनुसार, विधि के समक्ष सभी नागरिक समान हैं। किसी भी नागरिक को विधि के समक्ष किसी भी प्रकार भी प्रकार का विशेषाधिकार प्राप्त नही है। यह एक प्रकार का नकारात्मक अधिकार है।उदाहरण के लिए, एक साधारण नागरिक एवं प्रधानमंत्री कोई अपराध करते हैं। संबंधित अपराध के लिए, दोनो व्यक्ति समान रूप से दंड के पात्र हैं।

संविधान के अनुच्छेद 14(2 )के अनुसार, सभी नागरिकों को विधि या कानून का समान संरक्षण प्राप्त है। यह एक वृहद अवधारणा है यहां संरक्षण का अर्थ समझने का प्रयास करते हैं। अर्थात,
नागरिकों को उनकी परिस्थितियों के अनुसार, विधि/कानून का समान संरक्षण(सुविधा), प्राप्त होगा। देश मे , पिछड़े समुदायों के उत्थान हेतु, पृथक से विधि, इसी अवधारणा के अंतर्गत बनाई जाती है। उसी प्रकार, शारिरिक रूप से सक्षम एवं विकलांगता से पीड़ित व्यक्ति, निर्धन एवं धनी को समान श्रेणी में नही रखा जा सकता है। ऐसे व्यक्तियों के संरक्षण के लिए, राज्य पृथक से कानून बना सकता है। संविधान के अनुच्छेद 14 के भाग 2 का संरक्षण समान परिस्थितियों में स्थापित व्यक्तियों के लिए है। अर्थात, समान परिस्थितियों में कार्यरत व्यक्तियों के बीच भेदभाव नही किया जाना चाहिये। संविधान के अनुच्छेद 14 के अनुसार, राज्य को व्यक्तियों के बीच युक्तियुक्त या उचित वर्गीकरण का अधिकार है, परन्तु, वर्ग विधान की मनाही है । समान परिस्थितियों में, भेदभाव होने पर ही, संविधान के अनुच्छेद 14(2) का संरक्षण कोई व्यक्ति प्राप्त कर सकता है। वर्गीकरण एवं विधि के उद्देश्यों में युक्तियुक्त करण संबंध होना चाहिये। कर्मचारियों मामलों में सिद्धांत पूर्णरूपेण लागू है।