परदे के पीछे वाले हमारे चौकसे जी

अभी 25 फरवरी को ही तो उन्होंने दैनिक भास्कर में अपना आखिरी कालम परदे के पीछे लिखा था और कहा था कि यह विदा है अलविदा नहीं कभी विचार की बिजली कौंधी तो फिर रूबरू हो सकता हूं मगर संभावनाएं शून्य हैं।

ब्रजेश राजपूत

अभी 25 फरवरी को ही तो उन्होंने दैनिक भास्कर में अपना आखिरी कालम परदे के पीछे लिखा था और कहा था कि यह विदा है अलविदा नहीं कभी विचार की बिजली कौंधी तो फिर रूबरू हो सकता हूं मगर संभावनाएं शून्य हैं। दैनिक भास्कर के पाठकां के लिये वो उस दिन की सबसे बडी खबर थी जो अंदर तक हिला गयी थी। भास्कर वो भी बिना चौकसे जी के कालम के कल्पना ही नहीं की जा सकती। ये कालम लगातार पिछले छब्बीस सालों से प्रकाशित हो रहा था और इसकी लोकप्रियता बेजोड थी।

बिना थके बिना रुके बिना शिकायत के ऐसा पसंदीदा कालम आप कैसे लिख लेते हैं जब ये सवाल मैंने चौकसे जी से उनके इंदौर में एमआईजी कालोनी में घर में पूछा तो वो बिना गर्व किये बोले भाई अब तो ये कालम जिंदगी की आदत हो गयी है। मेरा दिन कॉलम लिखने के बाद यानी कि ग्यारह बजे के बाद ही शुरू होता है। उसके पहले मैं किसी से ना मिलता ना बात करता हूं। सुबह के अखबार पढे फिर उसके बाद कॉलम लिखा। मेरी पत्नी उषा उसे देखती पढती हैं। अखबार में भेजती हैं उसके बाद ही मैं अपने सारे जरूरी काम करता हूं।

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ये सिलसिला सालों से चल रहा है। मेरी और पत्नी की बीमारी के बाद भी प्रिय राज कपूर के शब्दों में शो मस्ट गान के मंत्र के साथ चल रहा है जब तक शरीर साथ देगा लिखूंगा। ये सच है कैंसर की गंभीर बीमारी से जूझते हुये भी वो लगातार लिखते रहे। तेरासी साल की उम्र तक ऐसे रोज लेखन की मिसाल मिलनी मुश्किल है। उनके कालम में एंटरटेनमेंट इंफॉर्मेशन और एनलाइटमेंट तीनों चीजों होती थी जो किसी एक कॉलम में मिलनी मुश्किल होती थी इसलिये परदे के पीछे लाखों पाठकों की आदत बना हुआ था।

सालों से मध्यप्रदेश के बुरहानपुर सरीखे छोटे कस्बे से निकलकर सागर और इंदौर में पढाई कर मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में झंडे गाड़ने वो बिरले ही थे। इंदौर के होलकर कॉलेज से हिंदी से एम ए करने की चाह रखने वाले चौकसे जी को जब दाखिला नहीं मिला तो अंग्रेजी से एम ए किया और गुजराती कॉलेज में तेरह साल अंग्रेजी पढायी। कालेज में भी वो जिस अंदाज में किस्से कहानियों को फिल्म की पटकथा की तरह पढाते थे उससे कालेज प्रबंधन हैरान तो छात्र खुश रहते थे। मगर उनकी फिल्मों की समझ उनको मुंबई ले गयी और वहां फिल्म लेखन से वितरण तक के सारे काम किये।

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फिल्म इंडस्ट्री में चौकसे जी ने नाम पैसा दोस्ती कमायी और बहुत सारा घाटा भी सहा। मगर मजबूत कलेजे जयप्रकाश चौकसे ने सब खुशी खुशी झेला। कालेज अध्यापक से लेकर फिल्म निर्माण फिल्म वितरण और फिर लोकप्रिय कालम लेखक तक का चौकसे जी का सफर मिसाल है कि मन में लगन और कुछ करने की चाह हो तो चो चाहो वो पाया जा सकता है। मेरी किताब ऑफ द स्क्रीन पर उन्होंने परदे के पीछे में पूरा कॉलम लिखा था जो मैंने फ्रेम करवा कर अपने डाइंग रूम में टांग रखा है। लिखने के साथ बोलने में भी बेबाक चौकसे जी अपने पाठकों और हम जैसे लिखने वालों को हमेशा याद आयेंगे।