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स्कूल जाने की उम्र में पुरुषोत्तम अग्रवाल बन गए थे ट्रांसपोर्ट के टारजन…

Posted on: 09 May 2018 10:27 by Praveen Rathore
स्कूल जाने की उम्र में पुरुषोत्तम अग्रवाल बन गए थे ट्रांसपोर्ट के टारजन…

इंदौर। बारह साल की उम्र में बच्चे स्कूल जाते हैं पढ़ाई और खेलकूद में व्यस्त रहते हैं लेकिन इंदौर के जाने-माने उद्योगपति अग्रवाल समूह के चेयरमैन पुरुषोत्तम अग्रवाल पिताजी की मदद करने के लिए नौकरी करने लगे, इस दौरान उन्हें क्लास चार के बाद पढ़ाई छोडऩी पड़ी। हालांकि बाद में उन्होंने पंजाब बोर्ड से आठवीं और एमपी बोर्ड से हायर सेकंडरी की प्राइवेट परीक्षा दी। जीवन में संघर्ष को इंजॉय करते हुए उन्होंने आज ये मुकाम पाया। उन्होंने आठवी तक के बच्चों के लिए लर्न बाय फन पद्धति इजाद की, जो आज दस हजार स्कूलों ने अपना रखी है। घमासान डॉटकॉम से उन्होंने अपनी जीवन के पहलुओं पर खुलकर बात की और हर सवाल के जवाब दिए। प्रस्तुत है उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश… p agr 1

सवाल : लर्न बाय फन पद्धति अभी तक कितने लोगों तक पहुंच पाई है?
जवाब : लर्न बाय फन स्कूलों के लिए बनाई गई पद्धति है। अब तक करीब आठ से दस हजार स्कूलों ने इस पद्धति को अपनाया है। आज ये स्कूल नर्सरी से लेकर आठवीं क्लास तक इस पद्धति से बच्चों को पढ़ा रहे हैं। ये एक सरल शब्दों में बनाया गया पाठ्यक्रम है। जैसे हिंदी की शुरुआत बारह खड़ी से शुरू होती है तो गणित की शुरुआत गिनती से शुरू होती है, फिर नंबर आता है पहाड़े का। एलबीएफ में आधा और पाव का पहाड़ा भी दिया गया है। पूरा पाठ्यक्रम इस तरह बनाया गया है कि बच्चों को आसानी से समझ आ जाए। pagr2

सवाल : आपने एजुकेशन में काफी काम किया, आपके स्कूल-कॉलेज भी हैं, आपकी शिक्षा कहां तक हुई?
जवाब : मैंने कोलकाता में क्लास 4 तक पढ़ाई की। पिताजी तकलीफ में थे। मैं आठ साल का था, तब से ही सोचता था कि पिताजी की कुछ मदद कर सकूं ताकि अकेले परिवार का बोझ उन पर नहीं पड़े। इन दिनों मेरा परिवार कलकत्ता छोडक़र हरियाणा आ गया। मेरी क्लास चार तक पढ़ाई रेगुलर हुई, उसके बाद मैने पंजाब बोर्ड से आठवीं की परीक्षा दी। इसके बाद एमपी बोर्ड से हायर सेकंडरी की परीक्षा दी। 28 साल पहले अग्रवाल स्कूल की शुरुआत की। स्कूल में मैंने ऐसा कुछ वाक्या मैंने देखा, उसके बाद एलबीएफ के लिए काम करना शुरू किया। एलबीएफ में आठवी क्लास तक की किताबें तैयार की। इस पद्धति को तैयार करने में मुझे आठ साल लगे। मुझे यह कहने में जरा भी संकोच नहीं है कि चूंकि मैं कम पढ़ा-लिखा था, इसलिए प्रारंभिक दौर में जब एलबीएफ लांच किया तब मेरा मजाक भी उड़ा गया।

सवाल : शिक्षा की गुणवत्ता पर आप क्या कहेंगे?
जवाब : व्यक्ति का आधार मजबूत होना चाहिए। इसी प्रकार शिक्षा भी है। जिस प्रकार मजबूत बिल्ंिडग के लिए मजबूत नींव की जरूरत होती है, उसी तरह व्यक्ति का आधार भी मजबूत होना चाहिए। एलबीएफ जब मैंने शुरू की, तो प्रारंभ में मेरा बहुत मजाक उड़ाया गया। आज जिस स्तर की पढ़ाई हो रही है, उन डिग्रीधारी लोगों को कोई प्यून का जॉब भी नहीं देगा।

सवाल : आपके करियर की शुरुआत कब और कहां से शुरू हुई?
जवाब : मैंने 12 साल की उम्र में इंदौर में एक ट्रक एसोसिएशन में जॉब कर लिया।14 घंटे तक मेहनत करता था। 17 साल की उम्र में मैं उसी ट्रांसपोर्ट कंपनी में 50 फीसदी का पार्टनर बन गया। उसके बाद मैंने कोयले का बिजनेस शुरू किया। ट्रांसपोर्टर होने के नाते मुझे देशभर के सभी रुटों का अच्छी तरह ज्ञान हो चुका था। पांच साल तक मेरी पांच पैसे की आमदनी भी इससे नहीं हुई। पांच साल बाद जब में मार्केट में आया तो मैंने उन पुराने साथियों (ट्रांसपोर्टरों) से सहयोग लिया और चार सौ ट्रक वाले मेरे साथ हो गए। सबका ब्लाइंड सपोर्ट मिला, जिसने मुझे संबल प्रदान किया। ट्रांसपोर्ट के बाद ट्रेन से कोयला सप्लाय किया उसके बाद पानी के जहाज कोयला सप्लाय किया। इस तरह मैंने जीवन में रोड, ट्रेन या शिप सभी ट्रांसपोर्ट किया। देशभर में जहां जिस इंडस्ट्रीज में धुआं उठता देखा, उनको मैंने कोयला बेचा, फिर चाहे सीमेंट फैक्टरी हो या स्टील या अन्य कोई फैक्टरी। धीरे-धीरे कारोबार विदेशों तक फैलाया। कारोबार के सिलसिल में देश तो घूमा ही दुनिया की 36 देशों की यात्रा भी की। जब पैसा कमा लिया तो समाज को कुछ रिटर्न देने के उद्देश्य से 28 साल पहले अग्रवाल पब्लिक स्कूल की स्थापना की। इसके बाद और विस्तार किया। इसके अलावा रियल एस्टेट का भी कारोबार है।

सवाल : आपके प्रेरणा स्त्रोत कौन हैं?
जवाब : मेरी प्रेरणा स्त्रोत मेरी माताजी हैं। जब रात को 1 या 2 बजे तक मैं घर पहुंचता था, तो मां गरम खाना बनाकर खिलाती थीं। मां चमेलीदेवी कहती थी काम का प्यारा है, चमड़े का नहीं। यानि मां ने मुझे हमेशा मेहनत करने और सच्चाई के रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित किया। जीवन में कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना यह सीख भी उन्होंने ही दी थी, जो जीवनपर्यन्त के लिए गांठ बांध ली। वही कैरेक्टर डेवलप होता चला गया, किसी ने कुछ देने की कोशिश की भी तो मैंने कभी स्वीकार नहीं की। जहां ईश्वर की कृपा है, उसे कोई क्या दे सकता है? और ईश्वर की कृपा वहां है, जिसकी नीति और नियत साफ हो। कभी गलती भी हो सकती है, लेकिन नीति और नियत हमेशा साफ होना चाहिए।

सवाल : नए इंटरप्रेन्यूअर को क्या संदेश देना चाहेंगे?
जवाब : सबसे पहले मेहनत करो, ईमानदारी रखो, किसी को धोखा मत दो। कुल मिलाकर मिनिमम मार्जिन और गुड सर्विस से ही कस्टमर सेटिस्फेक्शन मिलता है। इसके अलावा कमिटमेंट का बड़ा इम्पार्टेंस रोल होता है, फेक्ट्स बताकर ही अपना कारोबार करो, सफलता जरूर मिलेगी। वैसे मेरा मानना है कि असफलता ही सफलता का द्वार होता है।

सवाल : पारिवारिक पृष्ठभूमि क्या है?
जवाब : मेरे पांच भाई और तीन बहनें हैं। तीन लडक़े हैं, एक उद्योगपति है, दूसरा रियल एस्टेट का कारोबार देखता है और तीसरा लडक़ा लर्न बाय फन की किताबों की मार्केटिंग, प्रिंटिंग और स्कूल का काम संभलता है।

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