इंदौर। 3500 मेहमानो का रजिस्ट्रेशन हुआ था न? तो फिर 2200 क्षमता वाला हाल किसने तय किया? जजमान की जगह मेजबान कैसे कुर्सियों पर काबिज़ हो गए? कौन स्थानीय नेता ओर उनके समर्थक थे जो मेजबान होते हुए भी कुर्सी कब्जाए हुए थे? बाहर चल रहे हंगामे की खबर क्या अंदर सभागृह तक नही आई? बावजूद इसके मेजबानों ने कुर्सियां क्यो नही खाली की? या खाली करवाई गई? सुबह 8 बजे से हाल किन लोगों से भराने लगा, इसकी चिंता किसी ने की? विदेश मंत्रालय का आयोजन कहकर स्थानीय नेतृत्व को किनारे क्यो किया गया?

बड़े आयोजन के अनुभवी बड़े नेता क्यो दरकिनार किये गए? नोसीखिये और नए नेताओ को ‘ सरदारी ‘ किसके कहने से दी गई? और सबसे बड़ा सवाल- प्रदेश के मुखिया को दो दो बार माफ़ी क्यो मांगनी पड़ी? जवाबदेही तो बनती है न इस सब अव्यवस्थाओं पर? तो जवाबदेही तय होगी? इन्दौर जानना चाहता है क्योंकि उसकी मेहमाननवाजी वाली बरसो बरस पुरानी प्रतिष्ठा पर आंच आई है। इन्दौरी आहत है। उसके लिए तो ‘खाया पिया कुछ नही, गिलास फुटने के बारह आने अलग से’….जैसे हाल हो गए। फोकट में शहर के हिस्से में अपयश आ गया।

नितिनमोहन शर्मा। प्रवासी भारतीयों की बिदाई के संग संग मालवा के इस सिरमौर इन्दौर की साख भी फुर्ररर हो गई। हम बावले इन्दौरी तो बेगानी शादी में अब्दुल्लाह जैसे थे। पर आप सब चतुर सुजान भी मिलकर इस अहम आयोजन को इन्दौरी आन बान शान के हिसाब से सम्पन्न नही करवा पाये। हमें, हमारे शहर और हमारे शहर के नेताओ को आपने ‘ विदेश मंत्रालय का आयोजन है’ कहकर ऐसे किनारे कर दिया, जैसे दूध में से मक्खी निकालकर एक तरफ कर दी जाती है।

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श्रीमान आप, आपके शहर के खास नेता और प्रिय अफ़सरो के हाथ मे ही तो पूरी कमान थी। सम्मेलन के पहले भी। सम्मेलन के दौरान भी और सम्मेलन के बाद भी। आप सब ही तो स्थान देख रहे थे। बैठके कर रहे थे। फिर 3500 से ज्यादा पंजीयन के बाद भी 2200 की क्षमता वाला हॉल कैसे मुक़र्रर कर लिया? क्या इसलिए छोटा हाल तय कर लिया कि हाल भरा भरा दिखे? फिर जिनकी बाहर फ़ज़ीहत हुई, उसका क्या करे? वे तो मेहमान थे न। उनको तो सबसे पहले बतौर जजमान ससम्मान स्थान दिया जाना चाहिए था न? तो फिर जजमान की कुर्सी कौन लोग कब्जाए हुए थे?

किस नेता के रसूख के जरिये ये अंदर ‘ठसाये’ गए थे? जहां सुरक्षा के नाम पर शहर के नेतृत्व को एक तरफ धकेल दिया गया था, वहां ऐसे कौन से नामचीन नेता हो गये जिन्हें ‘ श्रीमान ‘ आप ओर आपके अफसर भी नही रोक पाए? क्या बाहर के हंगामे की खबर सभागृह के अंदर नही आ पाई थी? फिर भी मेज़बान कैसे कुर्सी पर ढीठ जैसे डटे रहे? ‘श्रीमान’ आपने तो पूरा फोकस प्रवासी भारतीय सम्मेलन पर किया था। उस चक्कर मे आपकी ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट तो दब सी गई। सम्मेलन अव्यवस्था का शिकार हो गया और समिट का शोर आंकड़ों से बाहर असर नही दिखा पाया।

श्रीमान, तो क्या जवाबदेही तय होगी इस सब कमियों पर किसी की? ये शहर तो अपने महापौर के साथ हो रहे रवैये पर भी आपसे जवाब मांगता है कि आखिर क्या कारण रहा जो शहर के प्रथम नागरिक को मंच, भोज में स्थान न मिला। आखिर सफाई के दम पर ही तो इस शहर के दुनिया जहा के लोग न्योते गए थे। तो ये सफाई क्या विदेश मंत्रालय ने की थी या प्रदेश सरकार ने? इन्दौर नगर निगम का ये काम था तो उस निगम का मुखिया कहा था इस आयोजन में? साफे तो कोई और बाँध रहा था न? इन्दौर की साख से हुए खिलवाड़ पर ये शहर जवाबदेही तय होते देखना चाहता है ‘श्रीमान’।

ये उस इन्दौर के साख की बात है जहां सालभर आयोजन होते है। जहां भागवत, भजन, भंडारों में गली मोहल्लों में ही हजारों जीम चुठ लेते है। जहां आजकल भंडारे भी पाटे पर हो रहे है, सुंदर बिछात के साथ। जिस शहर में भाजपा राष्ट्रीय परिषद की हजारों संख्या वाली बैठक शान से करती है। उस ‘भाजपाई शहर’ में प्रवासी मेहमान वीडियो जारी कर शहर की मेहमाननवाजी को धिक्कारे… सहन नही होता ‘ श्रीमान’। श्रीमान, जवाबदेही तो तय कीजिये आप। ताकि आपको, हमको ओर इस शहर को फिर न मेहमानों के ताने सुनना पड़े और कोई इस शहर की प्रतिष्ठा से खिलवाड़ कर सके।