आर्थिक आरक्षण से विषमता की नई लामबंदियां शुरू…!

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narendra modi

अजय बोकिल

जैसी कि आशंका थी, सामान्य वर्ग और खासकर सवर्णों को आर्थिक आधार पर आरक्षण लागू होने के पहले ही विवादो में घिर गया है। जातिवादी आरक्षण का घोर विरोध करने वाली संस्था ‘यूथ फाॅर इक्वेलिटी’ ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर इस बिल को निरस्त करने की मांग कर दी है। उधर आरक्षित वर्ग में खामोशी से यह प्रचार शुरू हो गया है कि यह बिल वास्तव में मोदी सरकार का जाति आधारित आरक्षण समाप्त करने की दिशा में यह पहला कदम है। उधर इस आरक्षण ‍बिल को लेकर सवर्णों में कोई उत्साह इसलिए नहीं है कि इससे उन्हें कोई खास राहत नहीं मिलने वाली। जबकि आरक्षित वर्ग में नए बिल का खुलकर विरोध न किए जाने के बाद भी नई गोलबंदी शुरू हो गई है। सवाल यह है कि जिस लोकसभा चुनाव के मद्देनजर वोटबंदी के लिए ताबड़तोड़ तरीके से यह बिल लाया गया है, क्या वह भाजपा की राजनीतिक ताकत बढ़ाएगा या फिर उसे और तार-तार कर देगा?

अहम बात यह है कि जिन सवर्णों और सामान्य वर्ग को 10 फीसदी आरक्षण विधेयक संविधान संशोधन के साथ लाया गया है, वह सामान्य वर्ग ही पूरी कवायद को संदेह की ‍निगाहों से देख रहा है। इस बिल से किसी का दिल बल्लियों उछल रहा है तो वह केवल भाजपा और उसके चंद नेता हैं। नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने सामान्य श्रेणी के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने के प्रावधान को ही ‘अव्यवस्थित सोच’ बताया है। उनके मुताबिक इस फैसले के गंभीर राजनीतिक और आर्थिक प्रभाव हो सकते हैं। क्योंकि मोदी सरकार ने यूपीए के काल में हुई उच्च आर्थिक वृद्धि को कायम तो रखा लेकिन उसे नौकरियों के सृजन, गरीबी के उन्मूलन और सभी के लिए बेहतर स्वास्थ्य तथा शिक्षा में नहीं बदला जा सका।

सवर्ण आरक्षण बिल को चुनौती ‘यूथ फाॅर इक्वेलिटी’ ( वायएफई)संस्था ने दी है। वायएफई ने संसद में पारित 124 वें संशोधन बिल को ही असंवैधानिक बताया है। याचिका के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की सीमा 50 फीसदी तय की है। आर्थिक रूप से आरक्षण देना गलत है और ये सिर्फ सामान्य श्रेणी के लोगों को नहीं दिया जा सकता है। सरकार का यह फैसला केवल वोट बैंक को ध्यान में रखकर किया गया है। अत: इस ‍बिल को निरस्त किया जाए। वायएफई की स्थापना 2006 में एम्स, आईआईटी, जेएनयू, आईआईएम के पूर्व छात्रों ने की थी। वायएफई का तर्क है यह कि यह संविधान संशोधन ‍पूरी तरह से उन संवैधानिक मानदंडों का उल्लंघन करता है, जिसके तहत इंदिरा साहनी केस में नौ जजों ने कहा था कि आरक्षण का एकमात्र आधार आर्थिक स्थिति नहीं हो सकती।

यह संशोधन उस फ़ैसले को नकारता है।” संस्था के अध्यक्ष डॉ. कौशलकांत मिश्रा का कहना है कि ‘यह संशोधन वर्तमान आरक्षण की सीमा जो 50 फ़ीसदी है उसके अलावा 10 फ़ीसदी है, हम इसका विरोध कर रहे हैं। सामान्य वर्ग को दिया जाने वाला 10 फ़ीसदी कोटा, 50 फ़ीसदी की सीमा के भीतर ही होना चाहिए।‘उन्होंने कहा कि धीरे-धीरे जाति आधारित आरक्षण को ख़त्म कर आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया जाना चाहिए।’कोर्ट इस याचिका पर क्या फैसला देता है, यह तो बाद की बात है, लेकिन कौशलकांत मिश्रा के बयान में वही पेंच है, जो जातिगत आरक्षण के पैरोकारों के मन में तेजी से घुमड़ रहा है।

हालांकि बीजेपी इस बात से फूली नहीं समा रही कि लोकसभा चुनाव के पहले मास्टर स्ट्रोक जड़ दिया है। क्योंकि कोई दल इसका सदन में विरोध कर पाया। दरअसल कांग्रेस सहित तकरीबन सभी दलों ने खुले आम बिल का विरोध न कर भाजपा के वोट बैंक में बड़ी खामोशी से गहरी सुरंगें बिछा दी हैं। उनका अपना प्रचार तंत्र अपने जातीय समूहो में कोर्ट के फैसले की व्याख्या अपनी सुविधा से करने में जुट गया है। कहा जा रहा है कि कहने यह सवर्णों को आर्थिक आधार पर आरक्षण है और 50 फीसदी की मान्य सीमा से अलग है। लेकिन गम इस बात का नहीं है कि बुढि़या ने दम तोड़ दिया है बल्कि इसका है ‍िक मौत ने घर देख लिया है। सपा के रामगोपाल यादव ने संसद में सवाल उठा दिया था कि नई व्यवस्था के तहत गरीबों को 10 प्रतिशत आरक्षण और बाकी 2 प्रतिशत अमीरों को 40 प्रतिशत आरक्षण।

यह कैसी समता ? अब गरीब सवर्णों को दिक्कत यह होगी कि उनका ‘कट ऑफ’ जनरल कैटेगरी से भी ऊंचा होगा।’ इससे सवर्णों को मूर्ख नहीं बनाया जा सकेगा। यादव ने पिछड़ों के आरक्षण बैरियर को भी तोड़ने की मांग कर डाली। लेकिन इससे भी ज्यादा एससी/ एसटी के बीच यह प्रचार है ‍कि सरकार ने सभी श्रेणियों में जातिगत के बजाए आर्थिाक आधार पर आरक्षण का रास्ता खोल दिया है। देर-सबेर यह सभी श्रेणियों में लागू होगा। इसका सीधा मतलब यह है ‍कि जातिगत आरक्षण धीरे-धीरे खत्म होगा और आर्थिक आरक्षण लागू होगा।

इसी के साथ ये सवाल भी उठने हैं कि जातिगत आरक्षण आखिर कितनी पीढि़यों तक? क्या यह अनंत काल के लिए है? जातीय दरारों को चौड़ा कर सामाजिक समता का राजमार्ग बनाने की सोशल इंजीनियरिंग का वास्तविक मतलब क्या है? दरअसल आरक्षित वर्गों के लिए सबसे बड़ा दुस्वप्न जातिगत आधार पर आरक्षण की बुनियाद हिलना है। जातिगत आरक्षण से उन्हें वास्तविक लाभ कितना मिला या नहीं मिला, यह सवाल अलग रखें तो भी आरक्षण ने दलितों, आदिवासियों और पिछड़े वर्गों को जातीय शिकंजे में फंसे हिंदू समाज में एक मजबूत मानसिक संबल प्रदान किया है। वे इस संबल को राजदंड की तरह थामे रखना चाहते हैं।

ऐसे में आरक्षण समाप्त करने का प्रचार अगर रंग दिखा गया तो भाजपा के तमाम मास्टर स्ट्रोक उलटे पड़ सकते हैं। क्योंकि जब संघ प्रमुख के इस बयान कि अब जातिगत आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए के बाद खूब बवाल मचा था और भाजपा बिहार विधानसभा चुनाव में निपट गई थी। भले ही यह दुष्प्रचार हो, लेकिन कुछ वैसी ही बात फिर सुरसुरी बनने लगी है कि संघ के इशारे पर मोदी सरकार सभी वर्गों में आर्थिक आरक्षण का पेंच फंसाने वाली है। यह सोच और संदेश अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और‍ ‍पिछड़े वर्ग में गंभीर बैचेनी फैलाने वाला है। क्योंकि आरक्षण उनकी राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक समता और आत्म सम्मान से जुड़ चुका है। राजद के मनोज झा ने तो बिल का विरोध करते हुए इसे ओबीसी, एससी/ एसटी के हकों पर डाका बता दिया।

अगर भविष्य में आर्थिक आधार पर आरक्षण सभी श्रेणियों में लागू हुआ तो इन आरक्षित समाज समूहों में नई उथल-पुथल शुरू होगी, जो वर्तमान में जाति आधारित राजनीति करने वालों के लिए खतरा या अमृत बन सकती हैं। ऐसे में संभावना यही है कि वे ताकतें जातियों को इस आधार पर नए सिरे से लामबंद करेंगी कि आर्थिक आधार जातीय पहचानों को भी मिटाने का सुनियोजित षड्यंत्र है और इससे हिंदू समाज पर सवर्णों का ‍शिकंजा और मजबूत होगा। इस प्रचार की काट भाजपा के पास यह कहने के सिवा कुछ नहीं है ‍कि बाकी श्रेणियों के आरक्षण कोटे में हमने कोई छेड़छाड़ नहीं है। ऐसे में संभव है कि आर्थिक आरक्षण बिल से भाजपा के प्रति सवर्णो की नाराजी घटे न घटे, लेकिन ओबीसी और आरक्षित वर्ग के वोट उसकी झोली से बड़े पैमाने पर ‍निकल जाएंगे। क्योंकि हिंदुत्व के नारे का उनके लिए कोई व्यावहारिक लाभ नहीं है। हालांकि इस बिल से सवर्णों का वोट काफी हद तक भाजपा के पास लौट सकता है, लेकिन अभी तो यही तय नहीं है कि उन्हें वास्तव में कोई आरक्षण ‍मिलेगा भी या नहीं?

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