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भगवान शिव को क्यों पसंद हैं भस्म, जाने राज़

Posted on: 07 Jul 2019 12:04 by Ayushi Jain
भगवान शिव को क्यों पसंद हैं भस्म, जाने राज़

इंदौर : महादेव मोक्ष के देवता हैं। उनकी आराधना करके मनुष्य अपनी मनोकामनाएं पूर्ण करता है। भगवान भोलेनाथ को विचित्र सामग्री ही प्रिय हैं। चाहे वह जहरीला धतूरा हो, या नशीली भांग। शिव जी सभी देवताओं में सबसे अलग और विरले हैं। वह वेश-भूषा, गले में सर्प, मस्तक पर चंद्रमा, जटा में गंगा, हाथ में त्रिशूल और डमरू धारण किए होते हैं।

आपको बता दे, शिवजी के पूजन में भस्म अर्पित करने का विशेष महत्व है। बारह ज्योर्तिलिंग में से एक उज्जैन स्थित महाकालेश्वर मंदिर में प्रतिदिन भस्म आरती विशेष रूप से की जाती है। यह प्राचीन परंपरा है। आज आपको बता रहे हैं कि भगवान शिव अपने शरीर पर भस्म क्यों लगाते हैं और उसके मायने क्या हैं?

भस्म

इस लिए लगाते हैं भस्म –
धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान शिव को मृत्यु का स्वामी माना गया है। इसीलिए उनका नाम शव से शिव बना। उनके अनुसार शरीर नश्वर है और इसे एक दिन इस भस्म की तरह शरीर राख हो जाना है।इस लिए वह अपने शरीर पर भस्म लगते है। दूसरी तरफ कथा के अनुसार जब समुद्र मंथन के समय हलाहल विष निकला था, तब भगवान शिव ने उस विष का पान करके पूरे संसार की रक्षा की थी। उस विष का ताप अधिक है, जिसे शांत करने के लिए भगवान शिव अपने पूरे शरीर पर भस्म लगाते हैं। भस्म के लेप से उनका शरीर शीतल रहता है।

महाकाल की भस्मार्ती
उज्जैन स्थित महाकालेश्वर की भस्मार्ती विश्व भर में प्रसिद्ध है। ऐसी मान्यता है क‌ि वर्षों पहले श्मशान भस्‍म से भूतभावन भगवान महाकाल की भस्‍म आरती होती थी लेक‌िन अब यह परंपरा खत्म हो चुकी है और अब कंडे की भस्‍म से आरती-श्रृंगार क‌िया जा रहा है। वर्तमान में महाकाल की भस्‍म आरती में कपिला गाय के गोबर से बने औषधियुक्त उपलों में शमी, पीपल, पलाश, बड़, अमलतास और बेर की लकड़‌ियों को जलाकर बनाई भस्‍म का प्रयोग क‌िया जाता है।

कैसे बनता है भगवान शिव के लिए भस्म
गोबर के उप्पलों को जलाकर उसकी राख को छाना जाता है। फिर उस राख को ठंडा करके उसमें कच्चा दूध, शहद और मक्खन मिलाकर उसे मला जाता है। इससे वह राख शीतल हो जाती है। जब उस राख को शरीर पर लगाते हैं तो वह अत्यंत शीतलता प्रदान करती है। भगवान शिव के शरीर पर इसी भस्म का लेप लगाया जाता है।

श्मशान की राख भी लगाते हैं भगवान शिव
भगवान शिव स्वयं काल के देवता हैं, तभी तो हम उनको महाकाल कहते हैं, वह श्मशान वासी भी हैं। वह अपने शरीर पर शवों को जलाने के बाद बची राख को भी अपने शरीर पर धारण करते हैं। मृत्यु के बाद शरीर पवित्र हो जाता है, उसमें काम, क्रोध, लोभ, मोह कुछ नहीं रहता। उस शव को जलाने के पश्चात वह राख तो पवित्र ही होगी। ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव उस पवित्र राख को अपने शरीर पर लगाकर आत्माओं से स्वयं को जोड़ते हैं।

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