चलें देखें अमरकंटक…माँ का उद्गम

"नर्मदा मैय्या को उन धुरंधरों से भी मुक्ति दिलाएं जो मां के वक्षस्थल पर पाखंड का चिमटा गाड़कर भावनाओं का धंधा कर रहे हैं"

जयराम शुक्ल

नर्मदा जयंती पर अब प्रतिवर्ष भव्य आयोजन होने लगे हैं। मुख्य समारोह होशंगाबाद के सेठानी घाट पर है जहाँ आज से इस नगर की बल्दियत बदलकर नर्मदापुरम् हो जाएगी। अमरकंटक में भी संस्कृति विभाग ने कार्यक्रम रचे हैं। हर गली चौराहे नमामि देवि नर्मदे ..के पोस्टरों, होर्डिंग्स से पटे थे। आदि शंकराचार्य विरचित नर्मदाष्टक की पंक्ति..त्वदीय पाद पंकजम् नमामि देवि नर्मदे ..अब सरकारी विग्यापनों की अमिट पंच लाईन बन चुकी है।

शंकराचार्य अमरकंटक आए थे ऐसा कई ग्रंथों में उल्लेख मिलता है। मंडन मिश्र जिनकी पत्नी भारती से उनका शास्त्रार्थ हुआ था वे नर्मदा तट के ही वासी थे। कुछ विद्वान मंडला को मंडन मिश्र के साथ जोड़ते हैं। सांख्य योग के प्रवर्तक भगवान कपिल और दुर्गा शप्तशती के रचयिता महर्षि मार्कण्येय भी नर्मदा के आराधक रहे हैं। अमरकंटक के आसपास ही उनके आश्रमों का उल्लेख मिलता है। कालिदास के मेघदूत का यक्ष अमरकंटक के शिखरों पर विचरने वाले मेघों के माध्यम से अपनी प्रियतमा को संदेश प्रेषित करता था।

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इस युग के दो महापुरुष कबीर और नानक ने अमरकंटक को ही अपने मिलनस्थल के रूप में चुना। वहीं मिले थे जहां डिंडोरी-बिलासपुर तिराहे के पास, जहां कबीर चौरा है। अमरकंटक का इतिहास जहां धर्म और अध्यात्म की दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा है वहीं विग्यान के अध्येता भी यहां आकर प्रकृति के रहस्यों का शोध व अध्ययन करते रहे हैं। पुस्तकों में वर्णित वह अमरकंटक कहां है. अब यही खोज का विषय है। क्योंकि यहां शीतल, मंद, सुगंध की त्रिविध बयार अब नहीं बहती।

पहली बार मैं कोई छत्तीस साल पहले गया था, मई के आखिरी हफ्ते। सुबह स्वेटर वाली लगी थी। रात में कंबल ओढना पड़ा था। तब यहां के रेस्ट हाउस के रखवाले खानसामा कूलर एसी का नाम ही नहीं जानते थे। पर अब तो यहां वैसी ही गर्मी होने लगी है जैसे हमारे अपने शहर में। सालों पहले यहां सर्दियों में बर्फवारी हुआ करती थी शिमला की तरह। अब जैसे अनूपपुर की ठंड वैसे ही उसके कस्बे अमरकंटक की। यहां पर्यटन विभाग व निजी व्यवसाइयों के रिसोर्ट, होटल , लाँज तो हैं ही, पांच सितारा आश्रमों की श्रृंखला है जहां भगतों के लिए हैसियत मुताबिक एसी, देसी सभी तरह के सुईट हैं।

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तीन दशक पहले तक अमरकंटक में साल के ऐसे घने जंगल थे कि सूरज की किरणें आर-पार नहीं जा सकती थीं। अब साल के वृक्षों का दायरा सिकुड़ता जा रहा है। आश्रम जंगलों में घुस रहे हैं। अमरकंटक अपनी जैव विविधता के लिए जाना जाता रहा है। पर उसकी सीमा में घुसते ही यूकेलिप्टस और पाईन के बदसूरत वन हैं। जमीन से सफेदा उड़ता है। ये प्राकृतिक तो नहीं, जाहिर है नैसर्गिक वनों को उजाड़कर इन्हें रोपा गया होगा। ताकि इसी जिले में स्थित अमलई वाले बड़े सेठजी की कागज फैक्ट्री(ओपीएम) का पेट भरा जा सके। ( जब यहाँ प्रधानमंत्री मोदी आए थे, और मीडिया ने इस ओर ध्यान आकर्षित किया तब शिवराज जी ने भुज उठाय प्रण कीन्ह..कि यूकेलिप्टस की जगह नैसर्गिक वन लगाए जाएंगे.. लेकिन इस बार भी जब वे अमरकंटक पहुँचे तो यूकेलिप्टस के सरसराते पेंड़ों ने ही उनका स्वागत किया)

मां नर्मदा के कुण्ड में बने मंदिर आजकल कुछ ज्यादा ही जगमग रहते हैं। आश्रमों को जगमगाने की होड़ सी मची है…पर ये क्या..उद्गम कुण्ड से पांच सौ मीटर आगे चलें तो नर्मदा मैय्या से कई गटर भैय्या मिलकर नर्मदा मैय्या को गटर्दा बनाते हैं। आइए देखिए..चेक डेम के ठीक नीचे एक मरघट भी है। यह पाँच साल वर्ष पूर्व उस दिन भी सलामत था जिस दिन श्री नरेंद्र मोदीजी मध्यप्रदेश में आयोजित नर्मदा परिक्रमा यात्रा का समापन करने पहुंचे थे। और चिता की राख भभूत बनकर उड़ रही थी। मैं उसका साक्षी था। वही हाल आज भी है।

कबीर चौरा जाने वाली सड़क पर बने पुल से पूरब की ओर नजर डाली तो एक समूचा आश्रम ही नदी की धार में दिखा। बाद में पता चला कि यह बोर्डिंग स्कूल है,यहां छात्र रहते और पढ़ते हैं। आश्रम के महंत जी ऊँची पहुंच वाले हैं। किसी की भी सरकार रहे उसे महंतजी के भगत ही चलाते हैं। जाहिर है निस्तार भी यहीं करते होंगे। या तो शौचालय का आउटलेट होगा या सोख्ता के जरिये मलजल नर्मदा मैय्या की धार में मिलता होगा। अरे भाई मिलता होगा नहीं.. मिलता है जिसे आप खुली आँख देख सकते हैं।

अब बड़े मठाधीश जब कब्जा करें तो झुग्गियों का हक बनता है। सो धार और कैचमेंट में भी झुग्गी बस्ती दिख गयी..और उधर संझबाती चल रही थी, इधर झुंड के झुंड नदी के तीरे फारिग हो रहे थे। नदी के पानी से शौंच भी कर रहे थे। अब अमरकंटक में मोक्षार्थियों की होड़ सी लगी है। बड़े भगत लोग जमीन के टुकडे खोज रहे हैं। आसान तरीका है आश्रम और मंदिर का। एक मंदिर ऐसा भी बनकर लोकार्पित होने को तैय्यार बैठा है जिसके बारे में एक साइनबोर्ड यह दावा करता है कि इसकी मूर्ति व मंदिर अपने आपमें एक विश्वरिकार्ड बनाएगी।

दावा है कि साल में दस लाख लोग आया करेंगे इन्हें देखने। पर ये कहां रहेंगे, कहाँ फारिग होंगे इसका समाधान यहां की नगरपालिका पूछने पर भी नहीं बता रही है। साधूबाबाओं को सीधे..सीधे जगह नहीं मिली तो ..सबै भूमि गोपाल की..कब्जा कर लो। आगे..धरम की जय हो अधरम का नाश हो प्राणियों में सद्भावना हो, भले ही नर्मदा मैय्या का बेडा गर्क हो। वेद पुराणों में पढ़ते आए कि नर्मदा मैय्या साक्षात् देवी हैं। हैं भी अंतरमन यही कहता है। तो फिर जब मां साक्षात् ही हैं तो मठ मंदिरों, आश्रमों की क्या जरूरत।

मां नर्मदा को प्रवाह के लिए हिमालय के बर्फ की जरूरत कहां..। वे मैकलसुता हैं। इन्ही की कोख से जन्मी हैं। गर्भ से ही जल लेती हैं और जड़ी बूटियों से अभिषिक्त करके अमृततुल्य बना देती हैं। अमरकंटक की समूची बस्ती उद्गम की परिधि में बसी है। यहां का मल जल या तो सीधे प्रवाह में जाता है या फिर धरती में जज्ब होकर अंदर ही अंदर झिरन से जुड़ जाता है। जरूरी है की समूची अमरकंटक बस्ती को कहीं और बसा दें। मठ और आश्रमों को भी। उद्गम से कम से कम दस किमी की परिधि जीरो कान्सट्रक्शन जोन बनाकर हेरीटेज घोषित कर संरक्षित करें।

नमामि देवि नर्मदे सुनने में पवित्र अभियान है, वस्तुतः यह महज एक वोट कबाडूं पराक्रम है। रेत की खदानें वैसे ही चल रही हैं। माँ का उद्गम स्लम से घिरा है उस पर पंद्रह हजार से ज्यादा की आबादी का बोझ है। माँ को कारोबारी ठेकेदारों से मुक्त कराएं ही, इन्हें उन धुरंधरों से भी मुक्त कराएं जो मां के ह्रदय में पाखंड का चिमटा गाडे भावनाओं का धंधा कर रहे हैं। यह मुक्ति का अभियान अमरकंटक से ही शुरू होना चाहिए …मां का उद्गम रहे, माई की बगिया रहे, वही प्राकृतिक सुषमा लौटे, फिर त्रिबिध बयार बहे, कालिदास का यक्ष पुनः अपनी प्रियतमा तक मेघदूतों के जरिए प्रणय निवेदन प्रेषित करे..। मां के कुशल क्षेम से ही आर्यावर्ते रेवाखंडे का कल्याण है।