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जानिए क्या है कुंभ मेले का इतिहास

Posted on: 12 Jan 2019 18:52 by mangleshwar singh
जानिए क्या है कुंभ मेले का इतिहास

कुंभ मेले का इतिहास हजारों साल पुराना है। ऋग्वेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद में भी ‘कुंभ’ शब्द का उल्लेख है मगर वो सांकेतिक है। इसके कारण कुंभ पर्व की सही जानकारी उनसे नहीं हासिल हो पाती है। पुराणों में कुंभ के संदर्भ में जिन कथाओं का वर्णन है उनमें सबसे प्रचलित प्रसंग श्रीमद्भागवतपुराण का समुद्र मंथन से जुड़ा प्रसंग है। मान्यता है कि जब समुद्र मंथन के दौरान अमृत कलश निकला तो उसे हासिल करने के लिए देवताओं और राक्षसों में छीना-झपटी शुरू हुई। उसी वक्त अमृत की बूंदें नासिक, उज्जैन, हरिद्वार और प्रयाग में गिरी। तब से इन चार जगहों पर हर तीन साल के अंतराल पर कुंभ का आयोजन किया जाता है।

१२  साल बाद ये मेला अपने पुराने स्थान पर लौटता है। वैसे कुंभ मेले के आयोजन का प्रावधान कब से है इस विषय पर विद्वान अलग-अलग राय रखते हैं। कुछ कहते हैं कि ये ५०० ईसा पूर्व से शुरू हुआ तो कुछ मानते हैं कि गुप्त काल में इसका आयोजन शुरू हुआ। कुंभ के ऐतिहासिक पहलू पर गौर करें तो पता चलता है कि नसांग ने अपने भारत भ्रमण के दौरान प्रयाग में सन् ६३४ में एक बड़े स्नान पर्व का जिक्र किया था। राशियों और ग्रहों से भी कुंभ का आयोजन जुड़ा हुआ है।

प्रयाग में कुंभ का आयोजन तब होता है, जब माघ के महीने में अमावस्या के दिन सूर्य और चंद्रमा मकर राशि में होते हैं और गुरु मेष राशि में। इसी प्रकार अन्य तीन शहरों में भी कुंभ से जुड़ी अपनी पौराणिक और ऐतिहासिक मान्यताएं हैं। मगर इलाहाबाद का कुंभ इसलिए प्रमुख माना जाता है, क्योंकि ये गंगा, यमुना और विलुप्त सरस्वती के संगम स्थल पर आयोजित होता है। कुंभ के इतिहास के साथ-साथ ये जान लेना आवश्यक है कि हिंदू मान्यताओं में अर्धकुंभ की जड़ें आदिकाल से नहीं जुड़ी हैं, जिस तरह महाकुंभ की हैं।

कहा जाता है कि अर्धकुंभ का आयोजन मुस्लिम शासकों के आने के बाद से किया जाता है। उस समय उन शासकों द्वारा हिंदुओं और उनकी मान्यताओं पर अत्याचार होता था, जिसके कारण हिंदू धर्मगुरुओं ने हिंदुओं की एकता के बारे में सोचा और बारह साल नहीं हर छह साल पर एकत्रित होने का निर्णय लिया। इससे उन्हें हिंदुओं को संगठित करना था। तब से महाकुंभ के बीच में हर छह साल पर अर्धकुंभ का आयोजन किया जाने लगा।

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