नितिनमोहन शर्मा

दुनिया वाकई गोल है। नही तो मेसी के लिए इन्दौर में भगवान के समक्ष हाथ क्यो जोड़े जाते? प्रार्थनाएं क्यो की जाती? यहां का खेल तो क्रिकेट है ना?  न भारत, फीफा खेलने गया। न फायनल में उसका कोई मुकाबला था। भारत तो दूर, कोई एशियाई देश भी नही था। फिर भी क़तर में जो कल घटा, उसका कतरा कतरा इन्दौर ने जिया। शुरुआती बढ़त से इत्मीनान में आये तो बराबरी पर मुंह भी लटकाये। टकटकी लगाए टेलीविजन पर ऐसे बेठे रहे जैसे भारत की ही प्रतिष्ठा दांव पर लगी हो। इसमे फुटबॉल के दीवानो से ज्यादा तो क्रिकेट प्रेमी थे। और वो भी थे जिन्हें फुटबॉल का कुछ भी समझ नही आता। पर एक खेल, कैसे देश और दिलो की दूरियां मिटा देता है…कल फिर साबित हुआ।

 

ईश्वर ने भी कल मैसी और अर्जेंटीना की कठोर परीक्षा ली। इतना रोमांचक फाइनल फीफा के इतिहास में आज तक नही हुआ। सांस रोक देने वाला मुकाबला। कमज़ोर दिल वालो के लिए जैसे परीक्षा की घड़ी कि कही दम ही न निकल जाए। एक के बाद एक पलटवार। उफ़्फ़। एक्स्ट्रा टाइम की आखरी पेनल्टी। बाप रे। कलेजा मुंह को आ गया।

जैसे सब किये धरे पर पानी फिर गया। फिर भी आस-उम्मीद कायम। फिर पेनल्टी शूट आउट। ऐसा शूट आउट जो आपको आंख मिचने पर मजबूर कर दे कि शोर मचेगा तो पता चल जाएगा कि गोल हुआ या नही। जिगरे वाले खेल के प्रेमियों का जिगरा भी इस वक्त दम तोड़ चुका था। आखिर कितने आघात सहे? कहा तो एकतरफा जीत रहे थे और कहा ये पेनल्टी शूट आउट की नोबत? लेकिन हुआ वही, जिसके लिए हाथ जोड़े जा रहे थे। अर्जेंटीना ही अकेला नहीं झूमा, हजारों किमी दूर इन्दौर भी गदगद हो गया।

 

अर्जेंटीना से भारत का कोई नाता है? या इंदौर का कोई रिश्ता है? फिर भी दिल से ऐसे धड़ धड़ धड़क रहे थे, जैसे इन्दौर का ख़ालसा क्लब या महू की कोई फुटबॉल क्लब फीफा में खेल रहा हो। खेल के जरिये देशों की दूरियां कैसे मिट जाती है, फीफा ने फिर साबित किया। जिस देश को जानते नही। जिस खिलाडी को साल में कभी देखते नही। उस अर्जेंटीना और मेसी के लिए इन्दौर में दुआओं के लिए हाथ उठते हैं। शीश झुकते है। बस मेसी की टीम जीत जाए। उसका ये आखरी मैच हैं। मेसी ओर उसके देश को भी शायद ये अहसास न हो कि उसके लिए प्रार्थना करने वाले इन्दौर में भी है।

फ्रांस से हमारी कोई दुश्मनी नही। लेकिन एक खेल कैसे आपस मे दिलो की, देशों की, धर्मो की दूरियां मिटाता है…कल ये फिर अक्षरशः साबित हुआ। खेल, खेल की दूरियां भी मिटा देता है। नही तो क्रिकेट वाले, धोनी वाले फुटबॉल के लिए क्यो रतजगा करते? एक क्रिकेट की दीवानी बीटिया तो अंतिम समय मे अचानक बराबरी पर आये मुक़ाबले पर रो पड़ती है। पूछने पर बोलती है कि धोनी मेसी के फैन है और हम धोनी के। इसलिए रोना आ गया।

 

क्रिकेट वालो ने भी वो देखा और जिया, जिसे पाने के लिए उन्हें पूरा दिन स्टेडियम या टीवी के सामने गुजारना पड़ता हैं। घण्टो टीवी के सामने चिपके रहने वाले इस वर्ग ने मिनटों का वो रोमांच देखा जो क्रिकेट में शायद ही देखने को मिले..!!दमखम, जिदारी ओर दमदारी वाला 90 मिनिट का ये खेल क्यो दुनिया मे इतना लोकप्रिय है…फीफा के फाइनल से ये एक बार फिर साबित हो गया।

कहा तो विशेषज्ञ फाइनल मुकाबले को गिनती के गोल तक सीमित रख रहे थे और कहा मुकाबला करीब एक दर्जन गोल तक जा पहुंचा। एक वक्त तो ऐसा भी आया कि लगा फ़्रांस ने अर्जेंटीना के जबड़े में हाथ डालकर जीत निकाल ली लेकिन कहते है न खेल के निर्णायक दिन किस्मत और प्रार्थनाएं भी अपना काम करती है। कल किस्मत अर्जेंटीना और मेसी पर आखिरकार मेहरबान हो ही गई। क्योकि दुनियाभर की दुआओं में इंदोरियो की दुआएं भी शामिल जो हो गई थी।

वाकई खेल होते रहे। देश, धर्म, भाषा, भूषा, वेश, परिवेश की सीमाएं…वर्जनाएं सब टूट जाती है। पूरी दुनिया एक हों जाती है। ‘ गोल’ जैसी गोल। एक परिवार जैसी। जहा न सरहद है। न जाती धर्म के झगड़े है। न कोई ऊंच नीच है। न कोई छोटा बड़ा। ठीक ‘ वसुधेव कुटुम्बकम’ के भारतीय भाव जैसी दुनिया।
खेल….होते रहे।
बधाई लियोनेल मेसी।
बधाई अर्जेंटीना।

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