देश में पड़े-लिखे डिग्रीधारी अनपड़ो की फोज बढती जा रही है

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नीरज राठौर की कलम से

यह तस्वीर अपने आप में प्रमाण है कि लार्ड मेकाले की शिक्षा पद्धति से डिग्रीधारी बने युवा वास्तव में अशिक्षित ही रह जाते हैं | शिक्षा से तो उनका कोई परिचय हो ही नहीं पाता | चूँकि इसी शिक्षा के अंतर्गत इनके माता-पिता भी शिक्षित हुए होते हैं, इसलिए वे भी नहीं जान पाते कि वास्तव में उनके बच्चे शिक्षित हो रहे हैं या केवल डिग्रीधारी |

जानेंगे भी कैसे?

वे स्वयं भी अशिक्षित डिग्रीधारी ही होते हैं और केवल रट्टामार शिक्षा को ही शिक्षित होना समझे बैठे है | न तो माता-पिता का कोई दोष है और न ही समाज का | पिछली दो तीन पीढ़ी ने यही जाना है, समझा है, और माना है, कि डिग्रीधारी हो जाना मात्र ही शिक्षित हो जाना होता है | वास्तव में डिग्री और शिक्षा का आपस में कोई सम्बन्ध ही नहीं है | कोई व्यक्ति शिक्षित है या नहीं, यह डिग्रियों से ज्ञात नहीं हो सकता |

नीचे मैं जापान के स्कूलों के विषय में बता रहा हूँ | ऐसी ही शिक्षा पद्धति से हमने भी पढ़ाई की थी अपने गाँव के स्कूल में, और वही गाँव की शिक्षा आज तक हमें संस्कारी व शिक्षित बनाये हुए है | हम होस्टल में भी रहे इंदौर के मल्हाराश्रम में जहा हमने स्वावलंबन, गुरु के प्रति सम्मान एवं बड़ो के प्रति आदर सीखा |कहते हैं जब नींव मजबूत हो तो मकान भी मजबूत ही बनेगा |
कोई सफाई कर्मचारी या चौकीदार नहीं होता स्कूल में :

जापान के स्कूल में विद्यार्थी अपनी कक्षा की सफाई खुद ही करते हैं और उनके इस काम में उनके शिक्षक बच्चों की सहायता भी करते हैं। वहाँ बच्चों को बचपन से ही स्वयं सफाई करना सिखाया जाता है ताकि वे सफाई रखना भी सीखें। यहाँ तक वो लोग अपने स्कूल के टॉयलेट्स भी खुद ही साफ़ करते हैं। वहाँ स्कूल लाइफ बहुत अच्छी और मस्ती भरी होती है। बच्चों को बचपन से ही मेहनत करना, बड़ों का आदर करना, सफाई रखना और अपना काम करना सिखाया जाता है। इन सब कारणों से जापान का विकास जल्दी हुआ है और वह एक उन्नत देश है और स्कूल लाइफ बेस्ट लाइफ है।

मैंने एक नौवीं के बच्चे की बात बताई थी कि कैसे उसके स्कूल के शिक्षक रट्टामार शिक्षा को महत्व देते हैं | कैसे उसके स्कूल के शिक्षक अयोग्य हैं बच्चों के बौद्धिक कौशल जगाने में | लेकिन माता-पिता इस बात से खुश हैं कि बच्चा अंग्रेजी बोल रहा है | उन्हें बच्चों को शिक्षित करने में कोई रूचि नहीं, अंग्रेज बनाने में रूचि है | उनका तर्क होता है कि यदि बच्चा कान्वेंट में नहीं पढ़ेगा तो उनकी कोई इज्जत नहीं होगी | यही भावना वे अपने बच्चों के मानस पटल में भी डाल देते हैं |

बड़े होकर यही बच्चे डिग्रीधारी अशिक्षित बन जाते हैं और कभी बेरोजगारों की लाइन में खड़े दिखाई देते हैं, कभी नेताओं के पालतू गुंडों-मवालियों के रूप में दिखाई पड़ते हैं, कभी जाति, धर्म, सम्प्रदाय के नाम पर गुंडागर्दी करते दिखाइ देते हैं, कभी राजनैतिक पार्टियों के आईटी सेल में बैठकर देश भर में आग लगाते फिरते हैं……तो कभी पकोड़े तलते दिखाई देते हैं |
आज यही डिग्रीधारी अशिक्षित युवाओं ने देश भर में उत्पात मचा रखा है क्योंकि शिक्षा के नाम पर इनकी विवेक बुद्धि कुंद करके, इन्हें भक्त बना दिया गया | और भक्त केवल नेताओं, धर्मों के ठेकेदारों के इशारों पर लड़ने मरने के और कुछ नहीं सोच सकते | सोचेंगे कैसे, उनकी बुद्धि तो बचपन में ही छीन ली गयी |

अगर इनके माता-पिता शिक्षित होते, तो ये युवा भी शिक्षित होकर आत्मनिर्भर हो चुके होते | भले ही इनके पास कोई डिग्री न होती, लेकिन कम से कम शिक्षित तो होते और शिक्षित युवाओं ने ही देश को आगे बढ़ाया है, न कि पढ़े-लिखे डिग्रीधारी अशिक्षित लोगों ने |

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