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दिल की कलम से | From the Pen of Heart

Posted on: 12 Apr 2019 16:06 by Surbhi Bhawsar
दिल की कलम से | From the Pen of Heart

डॉ हिरालाव अलावा

अनुसूचि क्षेत्रो के हो रहे चुनावों में सभी राजनीतिक दलों की मंशा बहुत खतरनाक है और उससे भी जायदा खतरनाक अनुसूचित क्षेत्रो में चुनाव लड़ने वाले जायदातर नेताओ की मंशा से है जो ना तो अपने चुनावी एजेंडे के अनुसूचित क्षेत्रों के लिए मिले संवैधानिक अधिकारों की बात करते है और ना अनुसूचित क्षेत्रों में रहने वाले जनजातीय समुदायों की सुरक्षा और संरक्षण से संबंध में कोई चर्चा अपने चुनावी भाषणों में करते नजर आ रहे है। ऐसे में अनुसूचित क्षेत्रो में आजादी के 70 सालों बाद भी चुनावो के माध्यम से कोई नेता चुनकर नही बल्कि राजनीतिक पार्टियों के गुलाम ही संसद में जायेगे और जाने के बाद पूरे पांच सालों सिर्फ अपनी राजनीतिक पार्टियों की ही गुलामी करेगे।

आज मैंन खुद एक जनप्रतिनिधि हूं और इस अफसोस के साथ लिख रहा हूं कि अनुसूचित क्षेत्रों में होने वाले चुनाव में जिनमे पूरे देश भर में आदिवासियों के लिए 47 सीट आरक्षित है लेकिन उनमे से एक भी संसदीय सीट पर जनजातीय समुदायो के प्रमुख मुद्दे जो उनके जल जंगल और ज़मीन से जुड़े है जो भूखमरी, गरीबी,कुपोषण और पलायन और बदतर स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े है। किसी भी राजनीतिक पार्टी के एजेंडे में नही है और ना ही आरक्षित सीटों से चुनाव लड़ने वाले नेताओं के एजेंडे में है। ऐसे में देश का 10 करोड़ से जायदा आदिवासी आज भी सिर्फ वोट बैंक बनकर रह जायेगा ऐसी संभावना लग रही हैं।

हम पिछले कुछ वर्षों से देख रहे है। युवाओ में अपने अधिकारों के प्रति काफी जनजागरूकता आई है। जनजातीय समुदायों के जायदातर युवाओ में राजनीतिक चेतना भी देखने को मिल रही है लेकिन फिर भी जैसे ही चुनाव नजदीक आते है जायदातर युवा राजनीतिक दलों से झांसे में आकर अपने मूल मुद्दे से भटक जाते है। ऐसे में नया आदिवासी नेतृत्व बनते बनते और बिगड़ जाता है।

आज सोशल मीडिया में आरोप प्रत्यारोप अक्सर देखने को मिल जाता है वह भी सबसे जायदा जनजातीय समुदायों के युवाओ में सबसे जायदा देखने को मिलता है। ऐसा लगता है सबसे जायदा ज्ञान उन्ही लोगो के पास है लेकिन सच तो यही है दूर दृष्टि के आभाव में और गहन अध्ययन के बिना सोचे समझे शोसल मीडिया में कुछ भी ऊटपटाँग लिखना और पोस्ट करना कुछ लोगो के लिए फैशन सा बन गया है। लेकिन वास्तव में समाज मे बदलाव चाहते है तो समाज को सही दिशा देने वाले युवाओ की बातों को गंभीरता से समझना होगा, दूर दृष्टि रखना होगा। अन्यथा जिस प्रकार जनजातीय समुदाय पीछले 70 सालो से इस लोकतांत्रिक प्रणाली में सिर्फ वोट बैंक बना हुआ है आगे भी यही दस्तूर जारी रहेगा।

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