ब्रह्मांड का पर्यटक!

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‘समय का संक्षिप्त इतिहास’ लिखने वाले ब्रिटिश वैज्ञानिक स्टीफ़न हॉकिंग आज ‘समय पर अपना विस्तृत इतिहास’ लिख अपने प्रिय ब्रह्मांड की अनन्त यात्रा पर निकल गए।

मैं तो विज्ञान का ‘वि’ भी नहीं जानता, पर मेरी आत्मा भी एक अज़ीब-से अनकहे ख़ालीपन से सराबोर है। सम्भव है दुनिया में मेरे जैसे लाखों अविज्ञानी लोगों का भी यही हाल हो। इसलिए कि अपनी कालजयी वैज्ञानिक उपलब्धियों से परे हॉकिंग की अजेय जिजीविषा हमारी पीढ़ी को ‘मनुष्य’ की उसी मूर्ति का दर्शन कराती है जिसकी महिमा का बखान सदियों से सारे धर्मग्रन्थ करते आए हैं।

जो आदमी गम्भीर बीमारी के बहाने बिस्तर पर पड़ जाने का ‘अधिकारी’ था वह मनुष्य होने की ‘जिम्मेदारी’ से खुद को मुक्त न कर सका। उसे अपने मनुष्य होने की जिम्मेदारी का अहसास था। इसलिए उसने ‘हक़’ के मुक़ाबले ‘फर्ज़’ को चुना।जीवन भर कर्म की ऐसी कविता लिखी जिसे युगों की माला फेरता ‘काल’ भी जपता रहेगा।

हम अक्सर छोटे-मोटे शारीरिक कष्टों का रोना रोते रहते हैं। जब-तब केवल अपने अधिकार पर अड़ जाते हैं। इसलिए मनुष्य होने के बावजूद संसार की यात्रा भी ठीक से पूरी नहीं हो पाती। ब्रह्मांड तो शब्दकोश तक ही रह जाता है।

यह संयोग भर नहीं है कि अपनी घोर शारीरिक अशक्तता के बीच हॉकिंग ब्रह्मांड के रहस्य खोज लाए। उन्हें ‘एक मनुष्य होने का दायित्व-बोध’ था। इसलिए शरीर की कमजोरी के नाम पर निष्काम कर्म के कर्तव्य से न डिगे। तब उन्हें ब्रह्मांड-भ्रमण की पात्रता तो मिलना ही थी!

सुबह से भारतीय वैज्ञानिक याद आ रहे हैं, जो ऋषि-मुनियों और तत्ववेत्ताओं के भेष में सदियों पहले ब्रह्मांड के आंगन में पर्यटन करने जाया करते थे। हॉकिंग हमारे युग में मानो उन्हीं की परंपरा के प्रतिनिधि हैं।

फिर हॉकिंग नवयुग की भाषा में ब्रह्मांड का वही ‘रिसर्च’ तो रख गए हैं जिसे भारतीय ब्रह्म विज्ञानियों ने सदियों पहले ‘सर्च’ कर लिया था। जिस बिग बैंग थ्योरी पर अभी-अभी पश्चिम को एकाध सूत्र हाथ लगे हैं, भारत की पीढ़ियों के पास पीढ़ियों से उस महाविस्फोट के सम्पूर्ण सूत्र संरक्षित हैं।

सयाने कह गए हैं, जब तक हम शरीर और अधिकार पर ही टिके हैं संसार की यात्रा तक कठिन है। ब्रह्मांड का पाला छूने वाली छलांग के लिए तो दोनों से ऊपर उठना पड़ता है। हम ऐसा नहीं कर पाते इसीलिए हम, हम रह जाते हैं और हूबहू आप हम जैसा ही एक आदमी ‘द स्टीफ़न हॉकिंग’ बन जाता है।

समय के ताजा इतिहास में हॉकिंग जैसा दूसरा उदाहरण दुर्लभ है। जीवन में बुढ़ापे, बीमारी या बेबसी से तंग आकर मौत मांगने वाले कमजोर मनुष्य हैं। वे संसार की कसौटी पर ही खरे नहीं उतर पाते। तब ‘ब्रह्मांड के पार’ कैसे जा सकेंगे! हॉकिंग मनुष्य की कसौटी पर खरे उतरे इसलिए जीते जी ब्रह्मांड ‘घूम’ आए। शरीर ने साथ न दिया तब भी। आखिर ब्रह्मांड के पर्यटक को सशरीर ‘वीज़ा’ मिलता भी कैसे!

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