Homeइंदौर न्यूज़मानो या ना मानो मगर अब तक 50 लाख..

मानो या ना मानो मगर अब तक 50 लाख..

(एक अनोखी मिसाल)
हर साल की तरह साल का पहला हफ्ता और वो डा सुरेश मेहरोत्रा का स्नेह आमंत्रण। भोपाल के पैतालीस बंगले का वो E – 19 नंबर का मकान जिसके लान में डा मेहरोत्रा बैठे हैं हम कुछ आठ पत्रकार दोस्तों के साथ। डा साब भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार हैं और कुछ हिंदी अंग्रेजी अखबारों की संपादकी के बाद पिछले कुछ सालों से भोपाल से” व्हिस्पर इन द कॉरिडोर” नाम से साइट चलाते हैं जिसकी चर्चा दिल्ली के प्रशासनिक गलियारों में होती है।

सतत्तर साल की उम्र में भी उनकी सक्रियता कमाल की है। वो जल्दी सुबह उठकर देर शाम तक काम करते हैं। अपनी सेहत और साइट की बातें करते करते डा साब ने अपने एकाउंटेंट को इशारा किया और वो “सोसायटी फार जर्नलिस्ट हेल्थ केयर मध्यप्रदेश” के नाम नौ लाख रुपये का चेक लेकर आ गया। हम सब भौंचक्के। डा साब हमारी इस संस्था को पिछले नौ सालों से हर साल बिना नागा, बिना मांगे राशि देते हैं मगर वो अनुदान पांच लाख रुपये तक का होता है। मगर हमारे डाक साब तो अलग ही कुछ सोचकर बैठे थे वो इन नौ सालों में अपनी इस अनुदान राशि को पचास लाख रूप्ये तक करना चाहते थे ये कहकर कि हो सकता है कि आने वाले दिन ना जाने कैसे हों वो देने के काबिल हो या ना हों और हम सब के विरोध के बाद भी डाक साब ने उस चैक पर दस्तखत किये और हमारी संस्था के सदस्यों को सौंप कर प्रेम से फोटो खिचवाई।

डा सुरेश मेहरोत्रा से ये नौ लाख रूप्ये का चेक लेकर हम सब हैरान थे ये जानकर कि डाक साब ने पिछले नौ साल में हमारी संस्था को थोडा बहुत नहीं अब तक कुल पचास लाख रुपये का अनुदान दिया है। वो भी बाकायदा चेक से सबके सामने।
कोई भरोसा करे या नहीं मगर ये सच है कि डाक साब के लगातार मिलने वाले अनुदान से भोपाल के पत्रकारों को स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं में आर्थिक मदद करने वाली इस संस्था की शुरूआत डाक साब के अनमोल सानिध्य से ही शुरू हुयी। नौ साल पहले भोपाल के पत्रकार राजेश दुबे को मदद करने के लिये जब हम कुछ साथी पत्रकारों ने मदद इकटठा करनी शुरू की तो डाक साब आगे आये और शुरुआती अनुदान के बाद हमें कुछ ऐसा प्रारंभ करने की सलाह दी जिससे कभी आगे ऐसी स्थिति में किसी के आगे हाथ ना फैलाना पडे। बस फिर क्या था एक अनौपचारिक सी संस्था बन गयी और वाटस ग्रुप से शुरू हुआ ये प्रयास अब बाकायदा रजिस्टर्ड सोसायटी है जिसने पिछले सालों में 120 पत्रकार साथी और उनके परिवार के सदस्यों के लिये कुल पचास लाख रुपये से ज्यादा की आर्थिक मदद की है।

कोरोना काल की ही बात करें तो उस बुरे दौर में भी संस्था पत्रकार और उनके परिवारों की मदद के लिये सक्रिय रही और 35 लोगों को नौ लाख तीस हजार रुपये की सहायता की। पूरी तरह से अनौपचारिक तरीके से पत्रकार साथियों की मदद करने वाली इस संस्था में 175 ही सदस्य हैं और मदद पाने वाले अधिकतर साथी गैर सदस्य हैं। ये इस बात को दर्शाता है कि आडे वक्त पर मदद देने के लिये किसी प्रकार के सदस्य और गैर सदस्य का पैमाना नहीं लागू किया जाता। बस मदद करनी है जल्दी करनी है बिना किसी अडंगे के। बीच में जब किसी को मदद की जाये या नहीं इस पर तर्क वितर्क होते हैं तो फिर डाक साब आगे आते हैं और अपनी सहदयता से इस मामले को सुलझाते हैं।

शुरुआती दिनों में डाक साब ने जब मदद का सिलसिला शुरू किया तो फिर राज्य सरकार और कुछ मंत्रियों ने भी व्यक्तिगत मदद की जिससे संस्था के पास बचत हो गई जिसके ब्याज के दम पर पत्रकार साथियों की बीमारी में तुरंत सहायता की जाने लगी। दुखद ये है की पत्रकारों की इस संस्था को भोपाल के किसी मीडिया संस्थान से मदद नहीं मिली।

सच तो ये है कि आने वाले दिनों में हम और आप शायद ही भरोसा कर पायें कि किसी पत्रकार ने अपनी पचास लाख रुपये की पूंजी अपने जीवन के उत्तरार्ध में अपने ही शहर के पत्रकारों की बेहतर सेहत और स्वास्थ्य के लिये दे दी। जब किसी बात पर भरोसा ना हो तो उसे ही चमत्कार कहते है और हमारे डा मेहरोत्रा हर साल ये चमत्कार बिना नागा बिना मांगे करते हैं। ईश्वर उनको लम्बी उम्र दे वो यूँ ही सक्रिय रहें और हमें संबल देते रहें..साधुवाद

 

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