Breaking News

उफ! फर्ज अदा करते हुए पत्रकार का मर जाना कोई ‘शहादत’ नहीं होती, अजय बोकिल की कलम से

Posted on: 01 Nov 2018 11:03 by Ravindra Singh Rana
उफ! फर्ज अदा करते हुए पत्रकार का मर जाना कोई ‘शहादत’ नहीं होती, अजय बोकिल की कलम से

उफ ! युद्धों, एनकाउंटरों में मारे जाने वाले सैनिकों, जवानों की ‘शहादत’ की खबरें निडरता से दुनिया को देने वाले मीडियाकर्मी अगर इन्हीं हालात में जान गंवाएं तो खबर इतनी बनती है कि मुठभेड़ में पत्रकार भी मारे गए। खबर, घटना, आपदा और इंवेंट कवर करते मारा जाना कितना रोंगटे खड़े कर देने वाला, पीड़ादायी और चुनौती भरा होता है, यह सोमवार को छत्तीसगढ़ में नक्सली हमले में मारे गए टीवी कैमरामैन की असमय मौत और किसी तरह बच गए उनके एक साथी द्वारा ‘आखिरी घड़ी’ करीब आते देख बनाए वीडियो में मां को याद करने की मार्मिकता से समझा जा सकता है।

पत्रकार समाज का वो सिपाही होता है, जिसके हाथ में कोई बंदूक नहीं होती। सिर्फ कलम या कैमरा होता है। यही उसके अस्त्र और ढाल भी होते हैं। छग के दंतेवाड़ा के नीलवाया जंगलों में दूरदर्शन के ‍टीवी कैमरामैन अच्युतानंद साहू सीआरपीएफ की जिस टीम के साथ गए थे, उसका मकसद चुनाव कवरेज था। शायद सरकार यह बताना चाहती थी कि इस घोर नक्सल प्रभावित इलाके में नक्सलियों के विरोध के बाद भी विधानसभा चुनाव प्रक्रिया किस ‘शांति’ और सुकून के साथ चल रही है।

यह टीम बाइक पर सवार होकर आसपास लगे चुनावी पोस्टर शूट करती हुई जा रही थी कि अचानक नक्सली हमला हुआ। कैमरा शूट कर रहे अच्युतानंद के सिर में गोली लगी। उन्होने वहीं दम तोड़ दिया। दो सिपाही भी ‘शहीद’ हुए। इसी जानलेवा अफरातफरी में साहू के एक साथी मोर मुकुट शर्मा ने मौत का सामना करते हुए एक वीडियो शूट किया, जिसमें चारो अोर सनसनाती गोलियों के बीच उन्हें जन्मदात्री मां की याद आई। वो लेटकर जान मुट्ठी में लिए कहते हैं-‘मम्मी अगर मैं जीवित बचा, गनीमत है। मम्मी मैं तुझे बहुत प्यार करता हूं। हो सकता है इस हमले में मैं मारा जाऊं। परिस्थिति सही नहीं है। पता नहीं क्यों? मौत को सामने देखते हुए डर नहीं लग रहा है। बचना मुश्किल है यहां पर…!

मोर मुकुट ने मौत से साक्षात्कार का झकझोर देने वाला वर्णन किया है। कैसे उन्होने साथी जवानों और सहयोगी कैमरामैन को दम तोड़ते देखा। कैसे एक जवान 45 मिनट तक जाती हुई जान को थाम कर नक्सलियों से लोहा लेता रहा।
देश में शायद यह पहला हादसा था, जिसमें कोई मीडियाकर्मी एनकाउंटर का ‘लाइव’ कवरेज करते हुए जान से हाथ धो बैठा हो। इस मौत ने कई सवाल खड़े किए हैं और खुद मीडिया बिरादरी को अपनी सुरक्षा और कर्तव्य पालन के खतरों को लेकर आत्म चिंतन पर विवश किया है। यह घटना इसलिए भी विचलित करने वाली है, क्योंकि यह ‘हत्या’ उन लोगों ने की है, जो खुद को जन अधिकारों के लिए लड़ने का दावा करते हैं।

चुनाव के दौरान नक्सली इलाकों में ऐसी घटनाएं नई नहीं हैं। वे यह संदेश देना चाहते हैं कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में उनकी कोई आस्था नहीं है। यह जताना चाहते हैं कि इस इलाके में सिर्फ उन्हीं का हुकुम चलता है, जबकि सरकारें यह यह दिखाना चाहती है ‍कि उन्होंने नक्सलवाद का फन कुचल दिया है। इन तमाम दावों के पीछे शोषण, अन्याय और अत्याचार की अलग कहानियां हैं। पत्रकारों को इसी कुहासे में अपनी पत्रकारिता की मशाल सुलगाए रखनी होती है। अपनी कलम की स्याही को सूखने या अपने कैमरे के लैंस को टूटने से बचाना होता है। अगर इस लड़ाई में वह जान गंवा दे तो इस बात की कोई गारंटी नहीं है ‍िक उसकी जान लेने वालों को कोई सजा होगी।

अमूमन ऐसे अपराधी पकड़े भी नहीं जाते। भारत का रिकार्ड तो इस मामले में बहुत ही खराब है। वैश्विक संस्था कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट ( सीपीजे) की ताजा रिपोर्ट बताती है कि पत्रकारों के हत्यारों को सजा दिलाने के मामले में भारत का नंबर विश्व में 14 वां है। 11 साल से वह इसी स्थान पर अटका हुआ है। यानी जितने पत्र कारों की ह्त्याएं देश में हुई हैं, वो किस ने की, कैसे की या क्यों की, यह आज तक रहस्य है। कुछ मामलों में जाचें भी हुई, लेकिन नतीजे तक नहीं पहुंची। मानो पत्रकार का सफर उसके जाने के साथ ही खत्म हो जाता है। ऐसी हत्याअो के दोषियों का पता चले, इसकी सरकार और समाज को भी ज्यादा चिंता नहीं होती। सरकार को मीडिया की दरकार उसका ढिंढोरा पीटने के लिए होती है तो समाज को जरूरत उसकी अपनी लड़ाई लड़ने के लिए होती है। वह त्याग की पराकाष्ठा की अपेक्षा पत्रकारों से ही करता है। लेकिन पत्रकार यह सब किस कीमत पर और किन परिस्थितियों में करते हैं, इससे किसी को खास सरोकार नहीं होता। इसके विपरीत पत्रकारों को ‘सबक’ सिखाने वाले अथवा उन्हें ठिकाने लगाने वाले कई बार राजनीति के दरबार में शान से मुखौटा लगाए घूमते नजर आते हैं। कई बार तो ये हत्याएं राजनीतिक संरक्षण में ही होती हैं। इनसे बचने की पत्रकारों के पास कोई कानूनी ढाल हीं है। पूरे देश में केवल महाराष्ट्र सरकार ने पत्रकार सुरक्षा कानून लागू किया है। बाकी जगह वो ईश्वर के भरोसे हैं।

यहां सवाल यह भी है कि नक्सलियों ने पत्रकारों को क्यों मारा? क्या वे उन्हें भी सुरक्षाबल का हिस्सा समझ बैठे थे या फिर मीडिया को सबक सिखाना भी उनके अांदोलन का हिस्सा है? जबकि मीडिया ही नक्सलियों की तथाकथित ‘बंदूक से निकलने वाली क्रां‍ति’ को निहत्थे नागरिकों तक यह मानकर पहुंचाता रहा है कि लोकतंत्र में सबको अपनी बात करने और अपने ढंग से कहने का बुनियादी हक है।

कुछ लोग पत्रकारों की इस हत्या को ‘हादसा’ कहकर कम आंक सकते हैं। लेकिन ये मौत, अमूमन माफिया, गुंडों, राजनीतिक रंजिश, ब्लैकमेलिंग अथवा सच की जुबान को खामोश करने जैसी असभ्य सोच से उपजी मौत नहीं है। यह विचारधाराअों के टकराव में फंसी रजिया का बेजान हो जाना भी नहीं है। यह हर ‘सरकारी’ तंत्र को दुश्मन मानकर उसे जमींदोज कर देने का जुनून भी नहीं है। बल्कि यह उस आंख को ही फोड़ देने की दुर्योधनी संकल्प है, जो आंख हकीकत को देखना और दिखाने के संकल्प भाव से काम करती है। यह मीडिया को अपना काम पूरी निष्ठा और निष्काम भाव से न करने देने की डरी हुई मानसिकता का प्रतिवार है। इसमें एक ही संदेश है कि निष्पक्ष मीडिया जैसी कोई चीज इस दुनिया में नहीं हो सकती। आप तय कर लें कि आपकी कलम किस बंदूक के साथ है। सरकार के या नक्सलियों के। आपका कैमरा किस की आंख से यह सब देख और दिखा रहा है? सरकार के या नक्सलियों के? अगर कोई तीसरी आंख से यह सब देखने दिखाने की कोशिश कर रहा है तो उस आंख को फोड़ दिया जाना लाजमी है।

अच्युतानंद साहू जैसे कर्तव्यनिष्ठ पत्रकारों की यही दिक्कत है। उनकी अविचलित फर्ज अदायगी ही उनकी जान की दुश्मन है। गोलियों के साए में वीडियो बनाने वाले मोर मुकुट का जज्बा ही सच्चे पत्रकार का, अडिग टीवी जर्नलिस्ट का जज्बा है। ऐसा जज्बा जिसके बूते पर ही कोई पत्रकार ( धंधेबाजों, दलालों को छोड़कर) व्यवस्था से लड़ता है, उसे अव्यवस्था में तब्दील होने से बचाने के लिए लड़ता है, इंसाफ दिलाने के लिए लड़ता है, बिगड़े सांडों को नाथने के लिए लड़ता है, माफिया से लड़ता है, राजनेताअों के झूठ से लड़ता है और दमित सच को उजागर करने के लिए लड़ता है। यह जानते हुए भी कि इस ‘स्वैच्छिक जिहाद’ में जान गंवाने के बदले उसे कुछ नहीं मिलने वाला है। सिवाय दो चार श्रद्धां जलियों के। अफसोस कि पत्रकार का फर्ज अदा करते हुए मर जाना कोई ‘शहादत’ नहीं होती!

Latest News

Copyrights © Ghamasan.com