आप उतने शुद्ध और सात्विक नहीं हैं…

ईश्वर ने सृष्टि का निर्माण करते हुए शुद्ध-अशुद्ध, धर्म-जाति या ऊंच-नीच कुछ भी नहीं बनाया। अपने ऊपर सब कुछ हमने थोपा है।

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रमेश रंजन त्रिपाठी

एक प्राचीनकाल के कुटियानुमा घर में लगे ‘अतिथिगृह’ के बोर्ड को देखकर मुझे उसमें रुकने की उत्सुकता जागी। ‘आपके अतिथिगृह में ठहरना चाहता हूं।’ मैंने कुटिया में बैठे सज्जन से कहा। उन्होंने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा, फिर बोले- ‘आप यहां विश्राम करने योग्य नहीं हैं।’ ‘क्यों ?’ मुझे यह बात बड़ी विचित्र सी लगी।

‘इस अतिथिगृह को अत्यंत पवित्रता एवं सावधानी के साथ बनाया गया है, आप उतने शुद्ध और सात्विक नहीं हैं।’ उन्होंने मुंह बिचकाया। आप ऐसा कैसे कह सकते हैं?’ अब क्रोधित होने की मेरी बारी थी- ‘मैं पूरा पाक-साफ इंसान हूं। क्या कमी है मुझमें?’ सर्वप्रथम यह कि आपकी भाषा दूषित है।’ वे बोले- ‘न तो आप शुद्ध हिंदी बोल रहे हैं न ही संस्कृत। आपकी भाषा में अपमिश्रण है।’

मैं चुप रहूंगा। कोई बात नहीं करूंगा।’ मैंने चिढ़कर कहा- ‘अब तो खुश! केवल भाषा की समस्या नहीं है।’ सज्जन बोले- ‘हमारे कण-कण में शुचिता है। आपके ठहरने से हमारा विश्रामस्थल दूषित हो जाएगा, शुद्ध व्यक्तियों के रुकने योग्य नहीं रहेगा। अपनी शुचिता का वर्णन करें।’ मैं बोला- ‘हम भी तो सुनें।

वे मुझे ध्यान से देखने लगे। फिर बोले- ‘इस अतिथि निवास को हमने ऐसे भूखंड पर निर्मित किया है जिसके स्वामी हमारे पंथ को मानने वाले रहे हैं। हमने इस भवन को अपने व्यक्तियों द्वारा खनन की गई मिट्टी से निर्मित किया है। कुदाल तथा फावड़े हमने अपने सामने गांव के लोहार से बनवाए थे। ईंट, गिट्टी, लोहा या सीमेंट जैसी वस्तुओं का प्रयोग नहीं किया गया है क्योंकि पता नहीं उन वस्तुओं को किसने बनाया हो। छप्पर घास-फूस का है। जिस लकड़ी का उपयोग हुआ है उसे हमने अपने खेत में लगे पेड़ों से काटकर बनाया है।’

अच्छा !’ मैं अचंभित था। ‘इतना ही नहीं, सारे बिछौने और ओढ़ने के वस्त्र हमने अपने चरखे पर काते गए सूत से तैयार किए हैं। प्रकाश के लिए अपने समक्ष निर्मित दीपक एवं स्वयं तैयार किए गए तेल-घी का प्रयोग किया जाता है।’ वे मुस्कुराए- ‘अग्नि प्रज्ज्वलित करने हेतु चकमक पत्थर का उपयोग करते हैं। खाद्य सामग्री अपनी धरती पर उगाते हैं। हमारे व्यक्ति स्वयं तैयार की गई पाषाण की चकिया पर गेहूं इत्यादि पीसते हैं। मिट्टी के उपकरणों में भोजन परोसते हैं। अपनी गोशाला की गायों के दूध का प्रयोग करते हैं। शास्त्रों में भैंस के दूध, चाय, आलू, प्याज जैसी अनेक वस्तुओं का उल्लेख नहीं है अतएव हम उनका उपयोग नहीं करते। वार्तालाप में शुद्ध भाषा का प्रयोग होता है। लिखने के लिए भोजपत्र एवं पुष्पों के सत्व से निर्मित मसि का उपयोग किया जाता है। यहां कोई दूरभाष यंत्र नहीं हैं। टेलीविजन अथवा रेडियो की तो सोचें ही नहीं।’

मैं अचंभित था। मेरा माथा चकरा रहा था। अचानक मेरे मुंह से निकल गया- ‘हवा का क्या? वह तो सभी स्थानों से होकर आती है। उसे कैसे शुद्ध करते हैं?’ ‘हमारे कुछ व्यक्ति निरंतर मंत्रोच्चार करते हुए दूषित वायु को पवित्र करने के प्रयास में लगे रहते हैं।’ वे हंसे। अति सुंदर।’ मेरे मुंह से निकला- ‘चंचल मन को अपवित्र विचारों के साथ भटकने से कैसे रोकते हैं?’

वे मुझे और ध्यान से निहारने लगे। संक्षिप्त चुप्पी के बाद बोले- ‘आप अत्यंत सूक्ष्म परीक्षण कर रहे हैं। कहीं मेरा स्थान छीनने तो नहीं आए हैं?’ ‘कदापि नहीं।’ मैंने ठहाका लगाया- ‘मुझे आदिम युग में जाने का कोई शौक नहीं है। ईश्वर ने सृष्टि का निर्माण करते हुए शुद्ध-अशुद्ध, धर्म-जाति या ऊंच-नीच कुछ भी नहीं बनाया। अपने ऊपर सब कुछ हमने थोपा है। भगवान की दी हुई बुद्धि का उपयोग करिए और ईश्वर की बनाई सभी वस्तुओं की खोज करिए, उन्हें मानव कल्याण के लिए प्रयोग में लाइए। हमारी प्रगति ईश्वर द्वारा प्रदत्त मेधा का परिणाम है। सदुपयोग में आने वाली सभी वस्तुएं पवित्र हैं। प्रत्येक जीव ईश्वर ने बनाया है, वह उतना ही शुद्ध है जितने आप हैं। आप परमात्मा की इच्छा के विपरीत काम कर रहे हैं। ध्यान लगाया करें, अच्छा साहित्य पढ़ें और अपने मष्तिष्क को पुनः रीसेट करें।’

मैं उपदेश देकर विदा मांगने के लिए हाथ जोड़ने लगा कि पत्नी ने जगा दिया। ‘किसके सपने देख रहे हो?’ वह हंसी। सोच रहा हूं, उसे पूरी बात बता दूं। आप क्या कहते हैं?

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