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योग दिवस में छिपा ‘राज-योग’ और सियासी वियोग, अजय बोकिल की कलम से….

Posted on: 22 Jun 2018 10:19 by krishnpal rathore
योग दिवस में छिपा ‘राज-योग’ और सियासी वियोग, अजय बोकिल की कलम से….

योग दिवस की सबसे बड़ी सफलता यह है कि लगातार चौथी बार दुनिया के 177 देशों में लोगों ने योगाभ्यास किया तो इसकी सबसे बड़ी असफलता यह है कि भारत में योग दिवस भी एक सरकारी और भाजपा के आयोजन में तब्दील होता जा रहा है। यहां तक कि सत्ता में हिस्सेदार उसकी सहयोगी पार्टियों ने भी योग दिवस से दूरी बनाए रखी। इस दृष्टि से सर्वाधिक चर्चा बिहार में जदयू भाजपा गठबंधन की पार्टनर जदयू और प्रदेश के मुख्यभमंत्री नीतीश कुमार का योग दिवस में शामिल न होना है। जदयू का तर्क था कि योग एक निजी मामला है। इसका सार्वजनिक दिखावा से करने का क्या मतलब ? उधर भाजपा ने नीतीश की गैरमौजूदगी पर यह कहकर लीपा पोती की कि योग करना न करना स्वैच्छिक है। इसी संदर्भ में केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि योग जोड़ता है। इसमें राजनीति ढूंढने की जरूरत नहीं है। मुख्यसमंत्री नीतीश कुमार खुद योग प्रेमी हैं। यहां योग कार्यक्रम भी सरकारी स्तर पर आयोजित किया गया है। उधर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 55 हजार लोगों के साथ योग किया तो बाबा रामदेव ने अपेक्षानुरूप 2 लाख लोगों के साथ योग कर नया रिकाॅर्ड बनाया। भारतीय सेना ने भी चारों दिशाअो और विपरीत जलवायु और भौगोलिक परिस्थितियों में योग किया। यह बात दूसरी है कि योग के जन्मदाता ऋषि पंतजगलि की जन्मस्थली कोडर गांव में योग करने की किसी राजनेता को नहीं सूझी।

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स्वास्थ्य और आध्यात्मिक चेतना जगाने की दृष्टि से योग का महत्व निर्विवाद है। इसका धार्मिक कर्मकांड से ज्यादा सम्बन्ध नहीं है। योग की कई व्याख्याएं हैं। इनमें चित्तवृत्तियों का निरोध, पुरूष का स्व स्वरूप मंे अवस्थित होना, जीवात्मा और परमात्मा का मिलन और कुशल‍ चित्त की एकाग्रता आदि है। योग में भी सर्वश्रेष्ठ राजयोग को माना गया है। मोटे तौर पर योग के दो प्रकार हैं, एक शरीर को स्वस्थ रखने वाली योगिक क्रियाएं और दूसरी आध्यात्मिक चेतना का विकास करने वाली जटिल क्रियाएं। ‘अंतरराष्ट्रीय योग दिवस’ के संदर्भ में जिस योग की बात होती है, वह मुख्यवत: शरीर और मन को निरोगी रखने वाले योग के बारे में है। योग करके दुनिया स्वस्थ और खुशहाल रहे, इसमें किसी को क्या आपत्ति हो सकती है ? वैसे भी योग भारत में और बाहर भी पहले से किया जाता रहा है। कई लोगों ने इसे पैसा बनाने का जरिया भी बना लिया। लेकिन योग की महत्ता हमेशा बनी रही। सरकार इसे सरकारी योजना की तरह जन-जन तक पहुंचाना चाहती है, यह भी अच्छी बात है। इससे बच्चों में भी योग के प्रति जागरूकता बढ़ी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की फिटनेस का असली राज योग ही है। और भी कुछ राजनेता खुद की ‍सक्रियता बनाए रखने के लिए नियमित योग करते हैं। उनके लिए योग ऊर्जा का स्रोत है। 

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इतना सब कुछ होने के बाद भी यदि नीतीश कुमार जैसे घुटे हुए राजनेता योग से दूर रहते हैं तो इसके पीछे कारण शारीरिक योग न होकर ‘राज-योग’ है। बल्कि यह कहना ज्यादा ठीक होगा कि योग को जश्न का स्वरूप देने के पीछे भी असली मंशा राजनीतिक ही है। वैसे भी
भारत में अब योग जिस पैमाने पर और जिस नीयत से किया और कराया जा रहा है, उस पर भी सवाल उठने लगे हैं। क्योंकि पहले योग ‍शिविरों में, कक्षाअों में या आध्यात्मिक समागमों में ही ज्यादा होता था। अब वह मैदानो में, स्टेडियमों में और सड़कों पर भी होने लगा है। वह किसी ध्यान योग के बजाए पीटी का स्वरूप लिए ज्यादा दिखता है। जिसका उद्देश्य केवल रिकाॅर्ड बनाना है। चूंकि योग सरकार प्रायोजित है, इसलि्ए कई ऐसे मंत्री भी मंच पर दिखते हैं, जिनका शरीर योग तो क्या भोग के हिसाब से भी लचक नहीं खाता। जो साल भर जोड़ तोड़ जुगाड़ में ही रहते हैं, वो एकदिन अचानक कपालभांित कैसे कर सकते हैं? योग दिवस के बहाने राजनेताअों की अलग वेशभूषा भी दिखाई पड़ी। योगी आदित्यनाथ भगवा चोला अलग रखकर भगवा टी शर्ट मंग नजर आए तो मंत्री रविशंकर प्रसाद स्पोर्ट्स टीशर्ट और हाफ पेंट में दिखे। हालांकि योग के लिए कोई ड्रेस कोड शायद नहीं है। क्योंकि बाबा रामदेव हमेशा की तरह अपनी धोती को लंगोट की तरह बांधकर पूरी सफाई के साथ योग करते दिखे। उन्होने तो अपने शिष्य के जरिए ‘सुपरफास्ट योग’ का एक आयटम भी पेश किया। यहां विचार का मुख्यत मुद्दा नीतीश के योग से दूर रहने का है। दरसअल ऐसा करके नीतीश से यह राजनीतिक संदेश दिया कि योग कार्यक्रम दरअसल भाजपा का कोर इश्यु है और इसमें उनकी पार्टी जदयू भागीदार नहीं है। दूसरे शब्दों में योग का छिपा मकसद हिंदुत्व को आगे बढ़ाना ही है और यह जदयू को मंजूर नहीं है। क्योंकि नीतीश और कुछ दूसरे नेता यह मानते हैं कि योग से दूरी बनाए रखने से अल्पसंख्यक और खासकर मुसलमानों की सहानुभूति मिलेगी। यानी अगर योग करने से भाजपा को मजबूती मिलती है तो योग न करने से गैर भाजपा दलों को ताकत मिलती है। यही योग के पीछे छुपा ‘राज –गणित’ योग है। शायद इसीलिए टीवी चैनलों पर यह बहस चली या चलवाई गई कि नीतीश कुमार की रोजा इफ्ताार से नजदीकी और योग से दूरी क्यों? अगर योग वैयक्तिक मामला है तो ऐसे सवाल उठाने का अर्थ क्या है?

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सबसे हैरानी की बात यह रही कि जिस पंतजलि के नाम पर एक बड़ी भारी कंपनी खड़ी हो गई, जिस पंतजलि ने पूरी दुनिया को योग सूत्र दिया, उसी की जन्मस्थली की याद योग दिवस पर किसी ‘योगाचार्य’ को नहीं आई। माना जाता है कि यूपी के गोंडा ‍जिले का कोडर गांव ही महर्षि पंतजलि की जन्मस्थली है। यह स्थान अयोध्या से 22 किमी दूर है। यहां पंतजलि के नाम पर एक चबूतरा है, जो श्री पतंजलि जन्म भूमि न्यास के प्रयासों से बन सका है। यहां अंतरराष्ट्रीय योग विवि की स्थापना की मांग भी हुई, लेकिन इससे सत्ता पाने या भुनाने में कोई मदद मिलने वाली नहीं थी।

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 दरअसल योग शास्त्र में राजयोग का अर्थ अंतर जगत की यात्रा है। वह चेतना के मर्म की अोर लौटने की भीतरी सफर है। लेकिन भौतिक ‘राज योग’ का इससे कोई सम्बन्ध नहीं है। यह राज-योग तो सांसारिक चित्त वृत्तियों के अधिकतम उपभोग को भुनाने का राज योग है। फिर चाहे वह दोस्ती से हो या दुश्मनी से। स्वामी विवेकानंद ने राजयोग की व्याख्यान करते हुए कहा था कि कर्म,उपासना,मनसंयम अथवा ज्ञान,इनमे से एक या सभी उपायों का सहारा लेकर अपना ब्रह्म भाव व्यक्त करो और मुक्त हो जाओ। बस यही धर्म का सर्वस्व है। मत, अनुष्ठान, शास्त्र, मंदिर अथवा अन्य बाह्य क्रिया कलाप तो गौण अंग-प्रत्यंग मात्र हैं।‘ लेकिन जब योग से भी ‘राज भोग’ की बू आने लगे तो वही होता है तो मंजूरे नीतीश कुमार होता है।

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