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बर्फीले मरुस्थल का ऊंट है याक

Posted on: 07 Jan 2019 18:36 by mangleshwar singh
बर्फीले मरुस्थल का ऊंट है याक

गुरुमीत बेदी

जंगली गाय और भैंस का मिश्रित रूप-सा दिखने वाला ‘याक’ बर्फ के बीच रहने वाला उपयोगी जानवर है। इसे कुछ लोग ‘बर्फीले मरुस्थल का ऊंट’ भी कहते हैं। सफेद, काले और भूरे रंगों में पाये जाने वाले इस जानवर के शरीर पर घने लंबे बाल होते हैं। पांच हजार से आठ हजार फुट की ऊंचाई पर रहने वाला यह जानवर हिमाचल के बर्फीले क्षेत्रों लाहौल-स्पिति और किन्नौर में अक्सर देखा जा सकता है। यहां इसे ‘याकबां’ और ‘सूरा गाय’ के नाम से भी जाना जाता है।

 

स्पिति घाटी के तो जनजीवन का पर्याय है याक। यहां उससे खेतों में हल जोतने से लेकर, बोझा ढोने और सवारी करने तक का काम लिया जाता है। पांच से छह फुट तक पड़ी बर्फ में याक बड़ी आसानी से रास्ता बना लेता है। अत: हिमपात के मौसम में याक पर सवार होकर ही लोग एक गांव से दूसरे गांव तक जाते हैं। याक का मूल स्थान तिब्बत माना जाता है, चूंकि हिमाचल के लाहौल-स्पिति और किन्नौर जिले तिब्बत की सीमा से सटे हैं और भारत-चीन युद्ध से पूर्व इन क्षेत्रों का तिब्बत के साथ आपसी व्यापार भी था। इसलिए तिब्बती व्यापारी ही याक को यहां ले आये।

 

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अब हजारों की संख्या में याक यहां हैं।

याक की औसत उम्र १८ से २० वर्ष के बीच होती है और एक मादा याक पांच-छह वर्ष की उम्र में गर्भधारण करना शुरू कर देती है। मादा याक का दूध भी काफी स्वास्थ्यवर्धक माना जाता है और एक समय में दो से तीन किलो तक दूध उससे लिया जा सकता है, चूंकि याक ठंडी जलवायु में ही जीवित रह सकता है। इसलिए जैसे-जैसे पहाड़ों पर बर्फ पिघलने लगती है, याक हिमानी पर्वत श्रंृखलाओं में चढऩा शुरू कर देता है। अक्तूबर-नवंबर में भारी बर्फबारी के दौरान वह फिर नीचे चरागाहों में आ जाता है।

 

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याक के सींग भी होते हैं और नहीं भी होते। सीगों वाले याक काफी आकर्षक दिखते हैं, चूंकि याक पालतू जानवर भी है इसलिए कई लोग इसके सींग इसकी बाल्यावस्था में ही काट देते हैं, ताकि कभी याक के हिंसक होने पर इसके सींग खतरनाक साबित न हों। याक के शरीर के बाल जहां बहुत उपयोगी हैं, वहीं इसकी पूंछ के बाल अत्यंत पवित्र माने जाते हैं। इसकी पूछ के बालों से ‘चंदर’ जैसे पूजा के पवित्र उपकरण भी बनते हैं और ग्रामीण देवताओं के सिर पर भी इन्हें सजाया जाता है, स्थानीय भाषा में इसे ‘चौरी सजाना’ भी कहते हैं।

 

काले याकों की बजाय सफेद याकों की पूंछ के बाल अधिक पवित्र माने जाते हैं और इसकी कीमत एक हजार रुपये तक आंकी जाती है। सफेद याक, जिनका उल्लेख ‘पौराणिक बाड़मय’ में ‘चमरी गाय’ के रूप में आया है, इस क्षेत्र में काफी कम दिखते हैं, याक ‘बाल’ दो किस्म के होते हैं। एक लंबे और मोटे, जिनसे गद्दे, स्वेटर व गलीचे तक बनते हैं और दूसरे महीन रेशमी मुलायम, जिनसे पशमीना निकाला जाता है। एक याक की कीमत पांच से सात हजार के बीच होती है और बर्फानी इलाकों के लोगों के लिए यह ‘कामधेनु’ से कम नहीं, स्पिति घाटी में तो लोग ‘याक’ को बड़ा पवित्र मानते हैं और इसे मारना पाप समझते हैं।

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