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ढाई किलो का हाथ और राजनीति की बिसात

Posted on: 30 Apr 2019 17:53 by rubi panchal
ढाई किलो का हाथ और राजनीति की बिसात

पर्वतों से आज मैं टकरा गया, तुमने दी आवाज लो मैं आ गया जैसा रूमानी गीत गाते-गाते बेताब सनी देओल ने जब छत्तीस साल पहले फिल्मों में प्रवेश किया और अनेक सख्त नायकों का अभिनय किया तब लगता नहीं था कि वे भी एक दिन हाथ जोड़कर वोट मांगने की अपील करते नजर आएंगे। अपने फिल्मी कैरियर का दशक पूरा होने पर की गई फिल्म दामिनी में अमरीश पुरी के सामने उन्होंने कहा था जब ये ढाई किलो का हाथ किसी पर उठता है ना तो वो उठता नहीं उठ जाता है…, तब पता नहीं था कि इसकी गूंज वर्षों तक होगी। बहरहाल, तमाम फिल्मी पात्रों से इतर अब सनी उर्फ अजय सिंह देओल वल्द धर्मेंद्र अब भारतीय जनता पार्टी के नेता और गुरदासपुर संसदीय क्षेत्र यानी दिवंगत विनोद खन्ना की सीट से उम्मीदवार भी हैं।

उनके पिता धर्मेंद्र भी 2004 से  2009  तक बीकानेर (राजस्थान) बीकानेर से सांसद रहे हैं। वहीं उनके पिता की दूसरी पत्नी हेमामालिनी मथुरा से सांसद हैं और दोबारा चुनाव लड़ रही है। गुरदासपुर में उनका मुकाबला कांग्रेस के उम्मीदवार और ठेठ राजनेता सुनील जाखड़ से होना है। उनके कद्दावर पिता बलराम जाखड़ (अब दिवंगत) लोकसभा के अध्यक्ष, भारत सरकार में कई मंत्रालयों के मंत्री और मध्यप्रदेश के राज्यपाल भी रहे हैं। सनी के राजनीति में आगमन के साथ ही ख्यात कवि कुमार विश्वास ने ट्वीट किया- बीकानेर से धर्मेंद्र जी और मथुरा से हेमा जी ने संसद पहुंचकर जैसे हमारा लोकतंत्र मज़बूत किया, वैसे ही अपनी अंतिम फ़िल्म “भाईसाहब” के बाद गुरुदासपुर से लोकतंत्र मज़बूत करने के लिए सन्नी दयोल संसद जाने हेतु चुनाव में उतरें हैं ! हम और हमारा “लोकतंत्र” शायद यही डिज़र्व भी करते है।

बहरहाल,, सनी नामांकन दाखिल कर चुके हैं और पंजाब में मतदाताओं को रिझाने के लिए पगड़ी भी धारण कर ली है, भले ही केश और दाढ़ी-मुंछ घनी न हो। राजनीति के लिए इतना अभिनय तो करना ही पड़ेगा। उनका पहला मुकाबला दिवंगत विनोद खन्ना की पत्नी कविता से होगा जो खुद को टिकट न दिए जाने से नाराज हैं। उनके स्थानीय न होने का मुद्दा भी ढाई किलो का साबित हो सकता है, जिसे उठाने को कांग्रेस तैयार बैठी है। इसके अलावा भाजपा-शिरोमणि अकाली दल को लेकर जितनी नाराजी विधानसभा चुनाव के समय थी उतनी नहीं तो थोड़ी कम आज भी है। राज्य में कैप्टन अमरिंदरसिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस की सरकार है। उसे लेकर भी माहौल अभी तक तो बिगड़ा हुआ नहीं लग रहा है। इन सारी दुश्वारियों के बीच सनी संसद में जाने के लिए गदर कर रहे हैं तो उन्हें यह तो कहा ही जा सकता है कि यहां केवल डायलॉग से काम नहीं चलने वाला।

जैसा चुनाव वैसी ही जाति हो जाती है बड़बोले सिंह की

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ अपने बड़बोलेपन के चलते सत्रहवीं लोकसभा के चुनाव अभियान के दौरान ही चुनाव आयोग का प्रचार पर लगाया प्रतिबंध झेल चुके हैं। ऐसा ही प्रतिबंध केंद्रीय मंत्री और उत्तरप्रदेश की ही सांसद मेनका गांधी को भी झेलना पड़ा। फिर भी योगी के मंत्री काहे चुप रहेंगे भाई। उन्हीं के मंत्रिमंडल के एक सदस्य हैं एसपी सिंह बघेल। जनाब टुंडला विधानसभा क्षेत्र से जीतकर विधायक बने। तब जाति प्रमाण पत्र लगाया धनगर जाति का। तब तक यह जाति ओबीसी में आती थी। बाद में राज्य सरकार ने नोटिफिकेशन जारी कर इसे अनुसूचित जाति घोषित कर दिया। उस पर हाई कोर्ट की रोक है।इसी विवाद के चलते पार्टी ने आगरा (सुरक्षित) सीट से लोकसभा का टिकट दिया तो खुद को दलित बताते हुए तैयार हो गए। प्रमाण पत्र भी चस्पा कर दिया, जिस पर विवाद चल ही रहा है। हालांकि उन्हें चुनाव लड़ने से नहीं रोका गया।

चुनाव मैदान में उनका मुकाबला हुआ कांग्रेस की प्रीता हरित और बहुजन समाज पार्टी (गठबंधन) के मनोज सोनी सहित कुल आठ उम्मीदवारों के साथ। बतौर दलित नेता पार्टी ने उन्हें इलाहाबाद और फुलपुर जैसी हाई प्रोफाइल सीटों पर भी चुनाव प्रचार के लिए भेजा। बघेल का अपना रंग और भाजपा के पक्ष में मतदाताओं को रिझाने के अपने तर्क हैं। वे कहते हैं दुष्कर्म की नब्बे प्रतिशत घटनाएं शौचालयों की कमी के चलते ही होती थी। इसका प्रमाण पुलिस रिकॉर्ड देखकर पाया जा सकता है। उनके क्षेत्र के थानों में दर्ज मामलों में महिलाओं के बयान से यह बात उजागर हुई है। घर-घर शौचालय बन जाने से महिलाओं को कई तरह की परेशानियों से भी सहज ही छुटकारा मिल गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशभर में गांव-गांव में शौचालय बनाने की दिशा में अच्छा काम किया है और इसे ‘इज्जत घर’ का नाम भी दिया। केंद्र की मोदी और राज्य की योगी सरकार की ऐसी ही कल्याणकारी योजनाओं के कारण मतदाताओं का पूरा समर्थन भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशियों को मिलकर रहेगा।

आज की स्थित में जब देश में चार चरणों का मतदान हो चुका है और तीन चरण बाकी है, एसपी सिंह का यह आत्मविश्वास भाजपा प्रत्याशियों को कितनी जगह जीत दिला सकता है और बतौर उम्मीदवार खुद उनका क्या हश्र होने वाला है इसके लिए तो नतीजों का इंतजार करना ही होगा, जो अगले महीने के चौथे सप्ताह में निर्धारित है।

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