इंग्लैंड में सड़क पर ‘स्कूल’..जिंदगी पढ़ाते हैं !

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लंदन से परीक्षित यादव

स्कूली परीक्षा पास करके डिग्री तक तो पहुंचा जा सकता है, लेकिन समझ की गारंटी नहीं है। गहराई के लिए तजुर्बा जरूरी है।वह सिर्फ किताबों से तो नहीं आ सकता। सड़कों ,चौराहों ,बस स्टेशन और रेलवे स्टेशन पर जो ‘ज्ञान’ मिलता है वही इंसान को जिंदगी में काम आता है।असली पढ़ाई सिर्फ किताबों में नहीं है, बाहर भी झांकना होता है। विदेशों में स्कूली बच्चों को हर महीने बस स्टेशन, रेलवे स्टेशन ,म्यूजियम यह किसी और धरोहर पर घुमाने ले जाया जाता है।

मस्ती -मजाक तो है ही तो होता ही है लेकिन पढ़ाई भी चालू रहती है। इस दौरे के पीछे मकसद होता है कि बच्चा सीख सकें कैसे चलना है ..कैसे उठना बैठना है… कैसे पेश आना है… कैसे बात करना है। धरोहर ओं पर खास तवज्जो दी जाती है। ताकि बचपन से बच्चा समझ जाए कि देश के लिए क्या और कोई क्यों खास है। मैनचेस्टर, लंदन ,नॉटिंघम सहित कई शहरों में यह सब होता है ।लंदन की वॉटरलू स्टेशन पर बच्चों की टोली देखी।

टीचर जेरेमी स्कॉट ने कहा यह सब हमारी स्कूल नीतियों का हिस्सा है ।अगर आपको बेहतर शहर, देश और समाज बनाना है तो पढ़ा लिखा होने से ज्यादा जरूरी है जानकार और समझदार होना। यह दोनों चीजें सिर्फ पन्ने पलटने से नहीं आ सकती, खुद जाकर देखना होता है। साथी टीचर स्टैनली ने कहा बच्चों को भी रूटीन क्लासेस से ज्यादा मजा इसी में आता है ।ठंड और बारिश के वक्त कई बार यह दौरे रद्द करना पड़ते हैं, लेकिन जब धूप निकलती है तो भरपाई की जाती है।

भारत में भी यह चलन शुरू तो हुआ है ,लेकिन अंजाम तक नहीं पहुंच रहा है ।हमारे यहां से प्रैक्टिकल का नाम दिया गया है लेकिन ज्यादातर जगह सिर्फ खानापूर्ति ही है । फोटो खींचाने और प्रोजेक्ट जमा करने पर ही सबका ध्यान रहता है ।बच्चे कितना समझ और सीख रहे हैं यह पीछे छूट जाता है ।जिस दिन हमारे देश में किताबों से ज्यादा जिंदगी पढ़ाई जाने लगी शायद ही कोई बेरोजगार घूमेगा।

इंग्लैंड में होने वाली होने वाले स्कूली दौरों पर बच्चों ने क्या सीखा इसकी परख भी होती है। स्कूल स्टाफ का कोई पूरे नोट तैयार करता है । वह बच्चों को दिए जाते हैं। कुछ वक्त बाद टेस्ट लिया जाता है। कहां गए थे ,क्या देखा ,क्या सीखा ,क्या सोचते हैं जैसे दर्जनों सवाल होते हैं ।इस टेस्ट में पास होना जरूरी रखा गया है ।यह नंबर आगे जोड़े जाते हैं ।उसी के बाद बच्चा अगली क्लास में दाखिल होता है। उम्र और क्लास के हिसाब से दौरे करवाए जाते हैं ।लंदन के सेंट जोसेफ एकेडमी के छात्र जमशेद मलिक ( 12 )ने बताया कि लगातार हमे दौरे पर लगातार सवाल पूछने की आजादी होती है।

माता पिता को भी हर अपडेट दी जाती है। उनकी भी जिम्मेदारी है कि वह हमें जनरल नॉलेज पढ़ाते रहें। हमारी स्कूलिंग में माता-पिता काफी दखल होता है। ऐसा नहीं है इन दौरों में हर बच्चे की दिलचस्पी होती है। कुछ ऐसे भी हैं जो सिर्फ इसलिए लाइन में चल रहे होते हैं क्योंकि टीचर का हुक्म होता है ।इस लिस्ट में छोटे बच्चे ज्यादा है। छोटी क्लास की छात्रा जेज ( 6 )से सवाल किया तो बोली मुझे नहीं पता यहां क्यों आए हैं, टीचर जैसा कहती हैं मैं करती हूं। वह मुझे गुड गर्ल कहती हैं। टीचर हंस पड़ी और कहां ‘डेट्स माय गुड गर्ल’।

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