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बापू की जयंती पर रेलवे में ‘शाकाहार दिवस’ मनाने के मायने, अजय बोकिल की कलम से

Posted on: 21 May 2018 11:12 by Ravindra Singh Rana
बापू की जयंती पर रेलवे में ‘शाकाहार दिवस’ मनाने के मायने, अजय बोकिल की कलम से

अच्छी बात है कि मोदी सरकार महात्मा गांधी की 150 वीं जयंती धूमधाम से मनाना चाहती है। इसको लेकर कई आयोजन भी हो रहे हैं। इसी कड़ी में रेल मंत्रालय ने 2 अक्टूबर को रेलों और रेल परिसरों में केवल शाकाहारी भोजन परोसने का प्रस्ताव केन्द्र सरकार को भेजा है। इस पर निर्णय अभी होना है, लेकिन ऐसा प्रस्ताव भेजने के पीछे असल मंशा क्या है, यह समझना जरूरी है।

यह सही है कि महात्मा गांधी शाकाहार के प्रबल समर्थक थे, लेकिन दूसरों का मांसाहार बंद करने के समर्थक भी नहीं थे। यह इसलिए भी कि रेलवे से रोाजाना यात्रा करने वाले करोड़ों पैसेंजरों में न तो सभी शाकाहारी होते हैं और न ही होना चाहते हैं। हो सकता है ‍कि रेलवे के प्रस्ताव के पीछे मांसाहािरयों से एक दिन संयम बरतने की अपेक्षा हो। ठीक उसी तरह कि बापू के जन्मदिन को ‘ड्राय डे’ के रूप में भी मनाया जाता है। यह बात दूसरी है कि ‘सजग’ शौकीन अपनी ‘व्यवस्था’ एक दिन पहले ही कर लेते हैं। यानी सांप भी मर जाता है और लाठी भी नहीं टूटती।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती देश में धूमधाम से मने, इस पर ‍िकसी को क्या ऐतराज हो सकता है। उनके जन्म के डेढ़ सौ साल बाद बापू के विचारों का प्रचार- प्रसार हो, उस पर सच्चे मन से अमल हो, नई पीढ़ी बापू को वर्तमान परिप्रेक्ष्य में समझे, बूझे और उनके आदर्शों को गहराई से आत्मसात करे, इसमें दो राय नहीं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वच्छता के प्रति गांधीजी के आग्रह को ध्यान में रखकर बापू को उनकी डेढ़ सौं वीं जयंती पर स्वच्छ भारत का तोहफा देने का संकल्प किया। इसके लिए देश में स्वच्छता अभियान चलवाया। इससे एक सही संदेश गया, भले ही उसके व्यावहारिक पक्ष पर कई सवाल हों।

जहां तक आहार की बात है तो बापू स्वयं शाकाहार के हामी थे। वे इसे नैतिक रूप से भी सही मानते थे। उन्होने कि‍ताब भी लिखी थी ‘शाकाहार का नैतिक आधार।‘ इसके पीछे शाकाहार का सात्विक होना तथा मांसाहार के लिए पशु अों की हत्या का विरोध था। बापू अंडे को शाकाहार व मांसाहार के बीच की चीज मानते थे। हालांकि उनकी मांसाहार की व्याख्या व्यापक थी।

वे दूध को भी मांसाहार की श्रेणी में मानते थे, क्योंकि वह पशु के शरीर से निकलकर आता है। उन्होने स्वयं दूध लेना बंद कर दिया था। हालांकि बाद में वे बकरी का दूध लेते थे। इसके पीछे उनका मानना था ‍िक इसमें बी‍मारियों से लड़ने की शक्ति होती है। गांधीजी कहते थे कि ‘बकरी का दूध लें, लेकिन उसका मांस नहीं।‘ बापू गो हत्या के भी विरोधी थे, लेकिन उन्होने इसे पूरी तरह प्रतिबंधित करने की वकालत कभी नहीं की। उन्हें अंदाज था कि मांसाहार को लेकर वैष्णव हिंदुअों और जैनों की जो भावनाएं है, वे अन्य सभी हिंदुअो की भी हैं, ऐसा नहीं है।

रेलवे ने सरकार को जो प्रस्ताव भेजा है, वह इस बात की अोर इंगित करता है कि बापू की जयंती को ‘शाकाहार दिवस’ माना जाए। लेकिन इसमें पेंच यह है कि ‘विश्व शाकाहार दिवस’ भारत सहित सभी देशों में गांधीजी के जन्म दिन के ठीक एक दिन पहले यानी 1 अक्टूबर को मनाया जाता है। अगर रेलवे का प्रस्ताव मान लिया गया तो भारत में शाकाहार दिवस लगातार दो दिन मनेगा। रेलवे के सुझाव के मुताबिक गांधी जयंती पर रेलवे में मांसाहार प्रतिबंध 2 अक्टूबर 2018 से 2 अक्टूबर 2020 तक रहेगा। यानी इस दिन यात्रा करने वाले सभी मांसाहारी रेल यात्री मांसाहार से वंचित रहेंगे।

रेलवे के सुझाव में यह स्पष्ट नहीं है कि ‘मांसाहार’ में क्या-क्या शामिल है। क्योंकि इस देश की बड़ी आबादी के लिए मछली दैनिक भोजन का हिस्सा है। क्या रेलवे इसे भी मांसाहार बताकर बंद करेगा, यह साफ नहीं है। यहां तर्क दिया जा सकता है कि रेल यात्रा के दौरान एक दिन मांसाहार न किया तो कौनसी आफत आ जाएगी? शाकाहारियों की भावनाअोंको देखते हुए मांसाहारियों को इतना ‘त्याग’ तो करना ही चाहिए। साथ ही यह बापू की भावना का भी सम्मान होगा। जिन्हें मांस खाना ही है, वह बाहर भी खा सकते हैं।

या फिर इस दिन रेल यात्रा ही रदद कर सकते हैं। पिछले दिनों एक मामला काफी उछला था कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में रमजान में दिन में मेस बंद होने से हिंदू छात्रों को बाहर ही खाना पड़ता है। या फिर बीएचयू के होस्टलों में शाकाहार जरूरी कर दिया गया है। इसका प्रति तर्क यह है कि भारतीय रेलवे केवल शाकाहारियों के लिए नहीं बनी है। वह एक व्यावसायिक और जन सेवा का माध्यम है। वह किसी एक विचार को सभी पर आरोपित कैसे कर सकती है? और ऐसा करने का असली उद्देश्य क्या है?

जिन बापू के नाम पर यह पाबंदी आयद करने की पैरवी की जा रही है, वे स्वयं भी इस मामले में बेहद सहिष्णु थे। गांधी जी का मानना था कि स्वाद का मूल जीभ में नहीं, मन में होता है। अगर किसी का मन मांसाहार करने को सही मानता है तो करे। इसे रोकने का नैतिक अधिकार किसी को नहीं है, क्योंकि कोई क्या खाए, क्या नहीं खाए, यह तय करना न तो सरकार का काम है और न ही रेलवे का। अगर शाकाहार के अपने तर्क हैं तो मांसाहार के भी अपने तर्क हैं। कौन ज्यादा सही है, यह आज तक तय नहीं हो सका है।

हां, बापू के नाम पर कोई एजेंडा रेलवे में भी लागू करने की कोशिश हो तो भी यह सही इसलिए नहीं है कि स्वयं कट्टर शाकाहारी होने के बावजूद बापू ने दूसरों पर शाकाहारी होने का दबाव कभी नहीं बनाया। बापू को रेलवे की सच्ची श्रद्धांजलि तो यह होगी कि रेलवे में जो भी खाना परोसा जाए, वह शुद्ध, गुणवत्तापूर्ण और स्वादिष्ट हो। क्योंकि रेलवे यात्रियों से इसके पैसे वसूलता है। अगर बापू आजादी के बाद की रेलें भी देख पाते तो हो सकता है कि उन्हें रेल यात्रियों को सप्लाई किए जाने वाले भोजन की क्वालिटी और शुद्धता को लेकर भी सत्याग्रह करना पड़ता।

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