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समरसता की चाशनी में ‘कंकड़’ सा उभरता पत्थलगड़ी आंदोलन, अजय बोकिल की टिप्पणी

Posted on: 05 Jun 2018 03:43 by Ravindra Singh Rana
समरसता की चाशनी में ‘कंकड़’ सा उभरता पत्थलगड़ी आंदोलन, अजय बोकिल की टिप्पणी

किसानों की राजी-नाराजी में उलझे मध्यप्रदेश के लिए पत्थलगड़ी शब्द थोड़ा अजाना हो, लेकिन इसका धुंआ राज्य के आदिवासी इलाकों में फैलने लगा है। पत्थलगड़ी दरअसल आदिवािसयों की संवैधानिक स्वायत्तता का आंदोलन है जो प्रकारांतर से अलगाववाद में तब्दील होने का पूरा खतरा है। इसकी शुरूआत झारखंड के खूंटी जिले से हुई, जिसकी ताजा परिणति वहां पृथक आदिवासी बैंक की स्थापना के रूप में सामने आई है। इसे ‘बैंक आॅफ ग्रामसभा’ नाम दिया गया है कि क्योंकि आदिवासी व्यवस्था में ग्रामसभा को सर्वोच्च संस्था माना गया है। हालांकि इस आदिवासी बैंक की वैधानिकता शून्य है, फिर भी यह भारत और राज्य सरकार को कानून के दायरे में सीधे-सीधे चुनौती है। वहां पत्थलगड़ी आंदोलन प्रो. युसूफ ( या जोसेफ ? ) पूर्ति के नेतृत्व में चल रहा है।

इसके तहत वे सीधे तौर पर राज्य सरकार और शासन व्यवस्था का बहिष्कार कर अपनी समांतर व्यवस्था लागू कर रहे हैं। राज्य की भाजपा सरकार इसे राजनीतिक आंदोलन और कानून व्यवस्था की समस्या मानती है। उसने इसे रोकने के लिए सख्त कदम उठाए हैं, लेकिन मूल समस्या के समाधान में किसी की रूचि नहीं है। कुछ लोगों का मानना है कि यह नक्सली आंदोलन का ही नया चेहरा है। यह वास्तव में अहिंसक तरीके से आदिवासियों को उनके अधिकारों के प्रति जागृत करने तथा उनकी स्वतंत्र पहचान को मनवाने की सोची समझी चाल है।

भाजपा सरकारें इसे धर्मांतरण करने वाली ताकतों की साजिश के रूप में देखती हैं। जो भी हो, यह भाजपा शासित राज्यों के लिए नया सिरदर्द है। दरअसल पत्थलगड़ी आंदोलन के तहत आदिवासी संविधान की पांचवीं अनुसू‍ची में दिए अपने अधिकारों को बहाल करने की मांग कर रहे हैं। इसके तहत संविधान प्रदत्त अधिकारों की जानकारी देने वाले पत्थर गांव गांव में गाड़े जा रहे हैं। साथ ही इसके जरिए आदिवासी गांवों का सीमांकन कर बाहरी व्यक्तियों को वहां घुसने से रोका जा रहा है। उधर सरकारें इसे हतोत्साहित करने के लिए पुलिस बल का सहारा ले रही हैं। जगह-जगह बोर्ड और पोस्टर लगाए गए हैं ‍कि पत्थलगड़ी असंवैधानिक हैं। इसके जरिए आदिवासियों को बहकाया जा रहा है।

पत्थलगड़ी दरअसल आदिवासी समाजों में मृतकों की याद को संजोने, गांव के सीमांकन और अपने अधिकार क्षेत्र को दर्शाने की सदियों पुरानी मान्य परंपरा है। इसे पत्थर गाड़कर दर्शाया जाता है। मुंडा भाषा में इसे ससनदिरी कहते हैं। लेकिन इस आंदोलन के तहत जो पत्थर गाड़े जा रहे हैं, उन पर आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों का वर्णन है, वो अधिकार, जिनसे उन्हें अभी तक वंचित रखा गया है।

पत्थलगड़ी आंदोलन झारखंड में करीब सवा साल से चल रहा है। यह सुर्खियों में तब आया, जब राज्य के खूंटी जिले की कई ग्रामसभाअों ने मिलकर पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारियों को यह कहते हुए बंधक बनाया था कि उन्होने संविधान के पांचवीं अनुसूची का उल्लंघन कर बगैर ग्रामसभा के आदेश के इन इलाकों में ‘घुसपैठ’ की है। पत्थलगड़ी आंदोलन के पीछे धर्मातरंण करने वाली और अलगाववादी ताकतें भी हो सकती हैं, लेकिन असल समस्या आदिवासियों के सामने अपना अस्तित्व बचाने की है। विकास का आधुनिक माॅडल उनसे जल, जंगल, जमीन और यहां तक उनकी अपनी पहचान और संस्कृति को छीन रहा है। उनकी खनिज और वन सम्पदा दूसरों के उपभोग का आधार बन रही हैं। ऐसे में उनके सामने दो ही विकल्प हैं या तो वे कथित मुख्याधारा में विलीन हो जाएं या फिर अपने वजूद को बचाने आखिरी दम तक लड़ें। यह लड़ाई किस तरह से हो, इस पर मतभेद हो सकते हैं।

अलबत्ता पत्थलगड़ी आंदोलन के जरिए आदिवासियों को यह समझाने की कोशिश की जा रही है कि उनके सामने अपनी हैसियत बचाने का यही तरीका है कि वे व्यवस्था के मालिक खुद बनें और उन पर ‘थोपी गई’ व्यवस्था को पूरी तरह नकार दें। इसके पक्ष में तर्क दिया जा रहा है कि संविधान के अनुच्छेद 19(5) एवं (6) में प्रावधान है कि सामान्य या आदिवासियों के अस्तित्व पर आंच आने की स्थिति में सरकार इन इलाकों में बाहरी जनसंख्या के अवागमन, जमीन खरीदने, रहने-बसने, नौकरी करने एवं व्यावसाय चलाने पर रोक लगा सकती है। आंदोलनकारियों का आरोप है कि चूंकि केन्द्र एवं राज्य सरकारों ने आदिवासी हितों की रक्षा के लिए अब तक कोई कदम नहीं उठाया है, उल्टे वे आदिवासियों की जमीने पूंजीपतियों के हवाले करने के लिए भूमि सुरक्षा कानूनों में ही संशोधन कर रही हैं। इसका जवाब आदिवासी ग्रामसभा की शक्तियो और अधिकारों का प्रयोग कर अपनी रक्षा से दे सकते हैं। यह भी कहा जा रहा है कि संसद में 1996 में पारित पेसा कानून के अंतर्गत आदिवासियों को पारंपरिक स्वशासन व्यवस्थाज को कानूनी मान्यता दे दी है। इससे आदिवासियों को अपने क्षेत्र में स्वशासन का अधिकार मिल गया है।

अत: कोई भी बाहरी हस्तक्षेप यहां ‘अवैधानिक’ है। पत्थलगड़ी आंदोलन का सबसे चौंकाने वाला कदम आदिवासियों के बैंक का शिलान्यास है। झारखंड के खूंटी ज़िले के उदबुरू गांव में तीन जून को इस बैंक की शुरूआत की गई। तीन जून इसलिए कि आदिवासी इस दिन भगवान बिरसा मुंडा की जयंती मनाते हैं। हालांकि सरकारी स्तर पर यह जयंती 15 नंवबर को मनाई जाती है। पत्थलगड़ी आंदोलन से जुड़े आदिवासी नेता जोसेफ पूर्ति ने पारंपरिक ढंग से भूमिपूजन कर इसका शिलान्यास किया। बैंक में 100 ग्रामीणों का खाता भी खोला गया है। कहा गया ‍िक किसी भी गैर आदिवासी का इस बैंक में खाता नहीं खोला जाएगा। बैंक में वर्तमान करेंसी ही चलेगी। यह बैंक स्व सहायता समूह की तरह ही काम करेगा। यही नहीं, इस दिन ‘आदिवासी भारत सरकार’ के गठन के साथ रक्षा, स्वास्थ्य और शिक्षा विभाग खोलने की भी घोषणा की गई। उधर राज्य सरकार ने इस मामले की जांच की बात कही है।

पत्थलगड़ी आंदोलन में गुजरात के सती पति आंदोलन की अहम भूमिका है। नक्सल समर्थक प्रोफेसर नलिनी सुंदर की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि पत्थलगड़ी आंदोलन से जुड़े लोग सती पति सम्प्रदाय को मानने वाले हैं। इस सम्प्रदाय के लोग मानते हैं कि जमीन पर आदिवासियों का हक है। इसलिए वो किसी को न तो कर देते हैं, न वोट देते हैं और न ही सरकार की किसी योजना का लाभ लेते हैं। सती पति आंदोलन दक्षिण गुजरात में सक्रिय है। वे अपने और मुंडा आदिवासियों के आंदोलन में कई समानताएं देखते हैं।

ऊपरी तौर यह पत्थलगड़ी आंदोलन बौद्धिक चिंताअों से भरा ज्यादा लगता है। इसका मकसद आदिवासियों को उनका जायज हक दिलवाना है। लेकिन इसका परोक्ष उद्देश्य भाजपा को सत्ता से बेदखल करना भी है। क्योंकि एक तो यह आंदोलन हाल के वर्षों में ही पनपा है और दूसरे भाजपाशासित राज्यों की विपक्षी पार्टियों और खासकर कांग्रेस ने इस आंदोलन को जायज ठहराना शुरू कर दिया है। यह कहकर कि पत्थलगड़ी आंदोलन भाजपा के विकास के गलत माॅडल की अनिवार्य परिणति है।

यहां सवाल यह भी है कि क्या संविधान की पांचवीं अनुसूची में उल्लेखित आदिवासी क्षेत्र के विशेषाधिकारों को पूरी तरह से लागू किया जा सकता है ? क्योंकि राज्यपालों को ऐसे क्षेत्रों में आदिवासी मंत्रणा परिषद गठित करने का अधिकार है। हालांकि इस पर लेकिन इस पर अमल अपवादस्वरूप ही हुआ है। बहरहाल आंदोलन में छिपी गंभीर चेतावनी यह है कि आदिवासियों की समस्या को समसरता की चाशनी में नहीं समेटा जा सकता। पत्थकलगड़ी आंदोलन किसी अभेद्य किले में तब्दील हो, इसके पहले ही सम्बन्धिअत सरकारों और समाजों को आदिवासियों को साथ लेकर चलने और उनको बराबरी का दर्जा देने के बारे में संजीदगी से पहल करनी होगी। वरना इसके परिणाम एक और विभाजन में भी हो सकते हैं।

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