नाइट लाइफ: सचमुच ‘रात की बाहों में’ जाने को तैयार मुंबई

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अजय बोकिल

मशहूर लेखक और फिल्मकार ख्वाजा अहमद अब्बास सत्तर के दशक में एक फिल्म बनाई थी- ‘बंबई ( अब मुंबई) रात की बांहों में।‘ तब उन्होंने सोचा न होगा कि पचास साल बाद यह हकीकत में बदल जाएगी। महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे सरकार ने अब मुंबई में नाइट लाइफ को मंजूरी दे दी है। लिहाजा गणतंत्र दिवस के बाद मुंबई के लोग रात में ‘एक नई सुबह’ का अहसास करेंगे। बताया जाता है कि यह उद्धव के बेटे आदित्य ठाकरे का पुराना ड्रीम था कि मुंबई भी दुनिया के उन चुनिंदा शहरों की तरह रात में जागती और नाचती रहे, जहां हर रात एक नई दुनिया करवट लेती है।

इससे भी मजेदार हैं वो तर्क, जो मुंबई में नाइट लाइफ की गरज के पक्ष में दिए जा रहे हैं। राज्य कैबिनेट के फैसले की जानकारी देते हुए प्रदेश के पर्यटन मंत्री आदित्य ठाकरे ने कहा कि मुंबई चौबीसों घंटे दौड़ते रहने वाला शहर है। यहां बड़ी तादाद में पर्यटक आते हैं। इसलिए कई लोगों के सामने समस्या होती थी कि रात 11 बजे के बाद कहां जाएं, कहां खाएं, कहां पीएं? ऐसे में नाइट लाइफ’ शुरू होने से खान-पान और मनोरंजन की भरपूर सुविधा उपलब्ध रहेगी। इसके तहत शहर के व्यावसायिक इलाकों में मौजूद माॅल, सिनेमाघर और दुकानें 24 घंटे खुली रहेंगी। अर्थात इन्हें चलाने वाले भी रतजगा करेंगे। निशाचर लोग जमकर सैर सपाटा कर सकेंगे। हालां‍कि यह सब नियम-कायदे के दायरे में ही होगा। आदित्य ने दावा किया कि इस फैसले से राज्य का खजाना भरेगा और नौकरियां मिलेंगी। बता दें कि इस समय मुंबई के लगभग पांच लाख लोग सर्विस सेक्टर में काम कर रहे हैं। बकौल ठाकरे यह पुलिस के लिए भी राहतकारी है, क्योंकि उसे रात 1:30 तक सभी दुकाने व प्रतिष्ठान बंद करवाने की झंझट मु्क्ति मिलेगी। अलबत्ता पब और बार के शटर पहले की तरह रात डेढ़ बजे ही बंद होंगे।

सरकार के इस ‘लोकरंजक’ फैसले पर राजनीति भी शुरू हो गई है। विरोधी भाजपा ने इसी मुंबई में ‘किलिंग नाइट’ की शुरूआत बताया है। भाजपा नेता राज पुरोहित ने कहा कि नाइट लाइफ कल्चर से महानगर में शराबखोरी और निर्भया जैसी घटनाएं बढ़ेंगी। इस नहले पर आदित्य ठाकरे का दहला है ‍िक राज्य में सत्तारूढ़ ‘महाराष्ट्र विकास आघाडी’ जन आकांक्षाअोंको पूरा करने के लिए काम कर रही है। ‘नाइट लाइफ’ शुरू करने मकसद नेक है। जो इसकी आलोचना कर रहे हैं, उन्हीं के मन प्रदूषित हैं। उधर खुद आघाडी में भी नाइट लाइफ का श्रेय लेने की होड़ मची है। सत्तासीन गठबंधन के प्रमुख घटक एनसीपी के नेता और राज्य के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री नवाब मलिक ने उत्साह के साथ बताया कि पूर्ववर्ती कांग्रेस-एनसीपी सरकार ने ‘नाइट लाइफ’ का निर्णय 2005 में ही कर लिया था।

लेकिन उसे शरद पवार ने इस बिना पर रूकवा दिया कि इससे शहर में बिजली की खपत बहुत बढ़ जाएगी।यानी पवार साहब की मुख्य चिंता ऊर्जा की कमी थी न कि नाइट लाइफ से होने वाले सांस्कृतिक प्रदूषण के।

चूं‍कि भारत जैसे ‘संस्कारों’ वाले देश में कानूनी ‘नाइट लाइफ कल्चर’ ( गैर कानूनी नाइट लाइफ सबको पता है) अभी नया है। इसलिए यह समझना जरूरी है कि किसी भी शहर के रात की बांहों में जाने का सामाजिक- सांस्कृतिक अर्थ क्या है। ‘नाइट लाइफ’ बोले तो शहर में देर रात से लेकर तड़के तक चलने वाले मनोरंजन के कारोबार और गतिविधियां हैं। इसके तहत तमाम पब, बार, नाइट क्लब, पार्टियां, कानफोड़ू संगीत, कैबरे, कॅसीनो, थियेटर, सिनेमा और शो आदि आते हैं। इस नाइट लाइफ में विचरण करने वालों को अंग्रेजी में ‘नाइट आउल्स’ (रात के उल्लू) कहा जाता है। दुनिया के कई बड़े शहरों जैसे लंदन, पेरिस, रोम, शिकागो, हांगकांग, न्यूयाॅर्क, टोक्यो, बर्लिन, तेल अवीव आदि शहरों में ऐसी रातों में लोग अपनी तमाम हसरतें पूरी करते हैं। चकाचौंध भरी ‘नाइट लाइफ’ में पैसा पानी की तरह बहता है। सरकार और सरकारी मुलाजिमों की भी खूब कमाई होती है। इस रंगीन दुनिया में वो सब काम होते हैं, जो रात के अंधेरे में ही ज्यादा होते हैं।

अब सवाल यह कि चौबीसों घंटे धड़कती मुंबई में ‘नाइट लाइफ’ की जरूरत क्यों समझी गई और इसके बिना मुंबई कहां कम पड़ रही थी? दरअसल नाइट लाइफ की पक्षधर वो कारोबारी और काले धंधों वाली लाॅबी रही है, जो रात में भी लोगों की जेबें खाली कराना चाहती है। कई का मानना है कि बगैर ‘नाइट लाइफ’ के मुंबई की जिंदगी में वो मजा नहीं, जो नाइट लाइफ ‘लाइव’ होने से है। कुछ लोग शराब-कबाब, नाच-गाने, धुएं, शोर और सुरूर में डूबी जिंदगी को ही असली जिंदगी समझते हैं। इस नाइट लाइफ का भी अलग समाजशास्त्र है। अमेरिकी समाजविज्ञानी डेविड ग्रेजियन के अनुसार किसी शहर की वायब्रेंट नाइट लाइफ एक नई संस्कृति और राजनीतिक आंदोलन को बढ़ाने में मुफीद होती है। उनके मुताबिक अमेरिका में समलैंगिकों के अधिकार आंदोलन की शुरूआत एक नाइट क्लब से ही हुई थी। नाइट लाइफ महिला सुरक्षा को बढ़ावा देती है और स्त्री प्रताड़ना को हतोत्साहित करती है। क्योंकि रात में खुलने वाले इन माॅल बार और क्लबों में बड़ी तादाद में महिलाएं काम करती हैं। हालांकि नाइट लाइफ के नकारात्मक पक्ष भी बहुत हैं।

बीजेपी आज महाविकास आघाड़ी के इस फैसले को जनविरोधी बताकर विरोध कर रही है, लेकिन राज्य में इसकी नींव उसी के कार्यकाल में रखी गई थी, जब मुंबई के तत्कालीन पुलिस कमिश्नर ने तो नाइट लाइफ चालू करने की घोषणा कर दी थी। लेकिन बाद में मुख्य मंत्री देवेन्द्र फडणवीस ने उस पर रोक लगा दी थी। कुछ लोगों की नजर में यह ‘बाल हठ’ ही है। वैसे नई सरकार के इस फैसले की बुनियाद में भी मोदी सरकार का वह ‘माॅडल शाॅप्स एंड एस्टेब्लिशमेंट एक्ट- 2016’ भी है, जिसके अनुसार महिलाअों को भी रात की ‍िशफ्ट में काम करने तथा व्यावसायिक संस्थानों को रात भर खुले रखने की इजाजत दी गई है। शिव सेना ने इसे नाइट लाइफ में जान फूंकने वाला कानून माना।

बहरहाल ‘सपनो की नगरी’ मुंबई में ‘नाइट लाइफ’ शुरू होने का सामाजिक-सांस्कृतिक असर क्या होगा, यह देखने की बात है। कहते हैं कि ‘नाइट लाइफ’ उन्हीं के लिए है, जिनके पर्स में जरूरत से ज्यादा पैसे हैं। जो दिन में भी पेट नहीं भर पाता, वह नाइट लाइफ क्या खाक एंज्वाय करेगा। बताया जाता है ‍िक मुंबई में नाइट लाइफ की पैरवी करते हुए सीएम उद्धव ठाकरे ने मप्र के इंदौर की ‘नाइट लाइफ’ का हवाला दिया। उन्हें शायद पता नहीं होगा कि इंदौर में यह केवल खवैयों की नाइट लाइफ है, जो सराफे में बटले की कचोरी से शुरू होकर रबड़ी पर खत्म हो जाती है। मुंबई की नाइट लाइफ इतनी ‘शाकाहारी’ यकीनन नहीं होगी।

आम मुंबईकर को डर है कि नाइट लाइफ कानूनी होने से अपराधों को भी पर न लग जाएं। ब्रिटेन की ही रिपोर्ट है कि वहां नाइट लाइफ वाले शहरों में हिंसक और यौन अपराध तेजी से बढ़ रहे हैं। लेकिन आदित्य ठाकरे की मानें तो मुंबई में यह इसलिए संभव नहीं है, क्योंकि क्योंकि सरकार वहां नाइट लाइफ ‘शुद्ध अंत:करण’ से शुरू करने जा रही है। उनके इस जज्बे की कद्र की जानी चाहिए। वरना जानकारों का छातीठोंक मानना है ‍कि बिना शराब, शबाब और कबाब के कोई भी नाइट लाइफ ‘लाइफलैस’ होती है। नाइट लाइफ लोगों के ‘डे लाइफ’ को भी बदल सकती है। देश की सांस्कृतिक-आर्थिक राजधानी के चरित्र को बदल सकती है। जिंदगी को देखने और जीने के अंदाज को बदल सकती है। यह सब कैसे, कितना और किस रूप में होगा, यह वक्त बताएगा। फिलहाल तो रात की बाहें मुंबई को अपने आगोश में लेने को बेकरार लगती हैं, क्योंकि बालहठ भी अपने आप में मासूम ही होता है। है ना..!