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Indore News: मेदान्ता हॉस्पिटल के डॉक्टर्स ने किया एंडोस्कोपिक प्रोसीजर से सफल इलाज

इंदौर( Indore News ) : शुजालपुर के पास कालापीपल के निवासी 55 वर्षीय किसान मोहनलाल पाटीदार एक महीने पहले अचानक बेहोश हो गए। करीब आधे घंटे बाद होश आया और संभल पाते उसके पहले चक्कर आने के साथ गर्दन में जकड़न महसूस हुई और उल्टियां भी होने लगीं। इसके बाद परिजन मरीज को लेकर इलाज के लिए भोपाल के अस्पताल पहुंचे जहां एमआरआई जांच करवाई गई। एमआरआई में पता लगा कि उनके दिमाग के पिछले हिस्से की वर्टिब्रल आर्टरी चारों और से सूजकर फट गई और खून निकल रहा था, जिसे डॉक्टर्स की भाषा में डाइसेक्टिंग एन्यूरिज़्म कहते हैं। वर्टिब्रल आर्टरी दिमाग के ठीक बीच में से गुजरती है इसलिए यह हमारे नर्वस सिस्टम का बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा होती है।

भोपाल में कई न्यूरोलॉजिस्ट को दिखाने के बावजूद उनका इलाज संभव नहीं हो पाया क्योंकि उन्हें पोस्टेरिअल सर्कुलेशन में यानि दिमाग के पिछले हिस्से में एन्यूरिज़्म हुआ था और ओपन सर्जरी में वहां तक पहुंचना संभव नहीं हो पाता है। दूसरी परेशानी यह थी कि पूरी धमनी चारों और से फूल गई थी इसलिए इसे ब्रेन सर्जरी के जरिए ठीक करना संभव नहीं था। भोपाल में इस बीमारी का इलाज करने में डॉक्टर्स ने अपनी असमर्थता व्यक्त की, क्योंकि ऐसी बीमारी में पैर की धमनी के रास्ते मस्तिष्क तक पहुंचकर अंदर से इलाज करना एकमात्र तरीका है, जिसके लिए मेदांता अस्पताल इंदौर की कन्सलटंट – न्यूरोइंटरवेंशन व न्यूरोरेडिओलॉजिस्ट डॉ. स्वाति चिन्चुरे को रेफर किया गया।

डॉ. स्वाति चिन्चुरे ने इलाज की प्रक्रिया के बारे में बताया कि हमने इस मरीज की ब्रेन एंजियोग्राफी कर स्थिति को बेहतर ढंग से समझा। इसके बाद हमने पी – 64 नामक एक विशेष फ्लो डाइवर्टेर को ‘पाइप विद इन पाइप’ तकनीक से ख़राब धमनी के अंदर डाला, जिससे रक्त का प्रवाह ख़राब धमनी के बजाए अपना रास्ता बदलकर डाइवर्ट होकर अच्छी धमनी में होने लगे। इस इंडोवेस्कुलर प्रोसेस को पूरा करने के सिर्फ पांच दिनों बाद ही मरीज को पूरी तरह से ठीक होने के बाद डिस्चार्ज कर दिया गया। गौरतबल है कि पी – 64 नामक इस विशेष फ्लो डाइवर्टेर को कुछ ही दिनों पहले देश में लांच किया गया है और सिर्फ कुछ बड़े शहरों में ही इसका सफल प्रयोग किया गया है। मध्यप्रदेश में पहली बार मेदांता अस्पताल, इंदौर में ही पी-64 फ्लो डाइवर्टेर के जरिए किसी मरीज का सफल इलाज किया गया है।

डॉ स्वाति ने ब्रेन एन्यूरिज़्म में सेलेब्रल एन्यूरिज़्म (यानि खून की नली का गुब्बारा) के बारे में बताया कि इस बीमारी में धमनी की दीवार के कमजोर क्षेत्र में उभरता है, यह गुब्बारा फटने पर दिमाग में रक्त स्त्राव यानि इंट्राक्राइनल हेमरेज होता है। दिमाग में रक्त स्त्राव होने से स्ट्रोक, कोमा और लकवा हो सकता है। परेशानी बढ़ने पर मरीज की मौत भी हो सकती है। लगभग 25 प्रतिशत मरीज इसमें बच नहीं पाते और अगले 24 घंटों में ही उनकी मौत हो जाती है। लगभग 30 प्रतिशत मरीज अगले 6 महीनों में इस बीमारी की गंभीरता से मरते हैं। इस बीमारी का जल्द से जल्द पता लगने और सही इलाज मिलने पर मरीज की जान बच सकती है।

इस बीमारी के प्रमुख लक्षण:

• अचानक सर में तेज़ दर्द होना,
• जी मचलाना,
• उल्टियां होना,
• स्तब्ध हो जाना,
• बेहोश होना,
• गर्दन में जबरदस्त अकड़न,
• पलकों का लटकना
• दौरा पड़ना

इस बीमारी का खतरा इन्हें अधिक होता है:

• धूम्रपान – इससे न सिर्फ एन्यूरिज़्म बनने का खतरा होता है बल्कि इसके फटने से हेमरेज की आशंका भी बढ़ जाती है।
• अनियंत्रित रक्तचाप – इससे धमनी की दीवार कमजोर हो जाती और यह एन्यूरिज़्म बन जाता है।
• फैमिली हिस्ट्री – यदि किसी के परिवार में 2 लोगों से ज्यादा लोगों को यह समस्या है तो इसके अगली पीढ़ी में आने की आशंका बढ़ जाती है।

इसका इलाज सर्जरी है

1. पारंपरिक तरीके से ओपन सर्जरी – इसमें सर की हड्डी को काटकर ओपन सर्जरी की जाती है और धमनी में गुब्बारे वाली जगह पर क्लिप लगाकर रक्तस्त्राव को रोक दिया जाता है। परंतु इसमें मरीज का अधिक रक्त बह जाता है इसलिए बड़ी उम्र के मरीजों और पहले से ही डाइबिटीज़, ब्लड प्रेशर और दिल के मरीजों को ओपन सर्जरी की सलाह नहीं देते हैं। साथ ही कुछ ऐसे एन्यूरिज़्म भी होते हैं, जहाँ ओपन सर्जरी के जरिए पहुंचना संभव नहीं होता है जैसे पोस्टेरिअल सर्कुलेशन एन्यूरिज़्म जो दिमाग के पिछले हिस्से में होता है। इस क्षेत्र में ओपन सर्जरी में खतरा अधिक होता है। कुछ एन्यूरिज़्म ऐसे होते हैं, जिनके आकार के कारण भी ओपन सर्जरी संभव नहीं होती जैसे फ्यूजीफोम या डाइसेक्टिंग एन्यूरिज़्म, इसमें पूरी धमनी में ही चीरा लग जाता है। इस तरह के मामलों में मिनिमम इनवेसिव टेक्निक के जरिए इलाज की सलाह दी जाती है।

2. मिनिमम इनवेसिव टेक्निक: इंडोवेस्कुलर रुट – इसमें पैर में छोटा-सा चीरा लगाकर केथेटर के जरिए दिमाग की ख़राब धमनी तक पहुंचकर एन्यूरिज़्म कोइल डालकर उसे बंद किया जाता है। कभी-कभी इसमें फ्लो डायवर्टर डालकर रक्त प्रवाह को एन्यूरिज़्म से हटा कर अच्छी धमनी की ओर प्रवाहित कर देता है। यह तीन स्थितियों में डाला जाता है; पहला है फ्यूजीफोम एन्यूरिज़्म जिसमें पूरी नस फूल जाती है। या फिर डाइसेक्टिंग एन्यूरिज़्म जिसमें पूरी नस में चीरा लग जाता है। तीसरी स्थिति तब बनती है जब दिमाग में 25 मिलीमीटर से ज्यादा बड़ी एन्यूरिज़्म होने पर ओपन सर्जरी और कोइल उपयोगी साबित नहीं होती है, तब फ्लो डायवर्टर डाला जाता है।

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