आज नए वर्ष में हम आपको एशिया के सबसे बड़े बॉयो CNG प्लांट की सैर कराने जा रहे हैं। आपको बता दें कि यहां कभी कचरे के पहाड़ हुआ करते थे। देश की राजधानी नई दिल्ली में कचरा आज भी राजनीतिक मसला बना हुआ है लेकिन इंदौर ने इसे एक वर्ष पहले ही मीलों पीछे छोड़ दिया है। इंदौर के घरों से रोजाना 500 टन गीला कचरा मतलब सब्जी, फल, जूठन को कभी यूं ही फेंक दिया जाता था, पर आज उसी से नियमित 17 हजार किलो बायो CNG और 100 टन जैविक खाद भी बन रही है।

हर महीने की कमाई 4 करोड़ रुपए। है ना मजे की बात! हम स्टेप बाय स्टेप बताएंगे कि कैसे गीले कचरे से गैस बनती है, और इस प्रकिया में कितना समय लगता है, फिर कैसे वो पंपिंग स्टेशनों तक पहुंचती है और वहां से आपकी गाड़ियों में.

Also Read – प्रदेश के युवाओं को नए साल में शिवराज सरकार का बड़ा तोहफा, मिलेगी नौकरियों की भरमार, पढ़े पूरी खबर

पहले जानिए, इस प्लांट को लगाने की जरूरत क्यों पड़ी

इंदौर ने सफाई में नंबर वन बनने की शुरुआत लगभग सात साल पहले की थी। वह निरंतर 6 बार देश का नंबर 1 स्वच्छ शहर बना हुआ है। अब सातवें आसमान को छूने की तैयारी है। नियमित घर, दुकानों से निकलने वाली सब्जियां, फलों के छिलके और जूठन के अतितिक्त सूखे कचरे को डंप करने से इंदौर-देवास बायपास पर बड़े-बड़े पहाड़ बन गए थे। सवाल यह उठा कि कचरा तो घर-घर से उठा लिया और इसे इसी तरह फेंकते रहे तो यह पहाड़ कभी खत्म ही नहीं होगा। यहीं से आइडिया आया कि इस कचरे को रिसाइकिल कर लिया जाए तो. फिर निश्चित हुआ कि इससे मिलेगा क्या।

एक्सपर्ट्स बुलाए गए, और यह तय हुआ

नगर निगम के अतिरिक्त सरकार से जुड़े विशेषज्ञों ने सलाह दी कि गीले कचरे से न सिर्फ बॉयो CNG बन सकती है, अपितु खाद भी तैयार हो जाएगी। फिर क्या था मिशन की तरह टीमें लगा दी गईं। अंतत: 19 फरवरी 2022 को देवगुराड़िया के पास इस भारी-भरकम प्लांट का प्रारंभण हो गया। आज यहां से 17 हजार किलोग्राम गैस नियमित बनाकर पंपिंग स्टेशंस आदि को सप्लाई होती है। इससे प्रत्येक महीने 4 करोड़ रुपए की कमाई हो रही है। दावा है कि 5 से 6 वर्ष में इस प्लांट को बनाने में खर्च किए गए 150 करोड़ रुपए की लागत निकल जाएगी।

अब जानिए कैसे कचरा CNG में बदला जा रहा है

स्टेप 1 : घरों से निकला गीला कचरा कलेक्शन कर प्लांट तक डंपिंग की प्रोसेस

नगर निगम करीब 600 कचरे की गाड़िया पुरे शहर में चला रहा है। इनसे घर-घर जाकर गीला, सूखा कचरा, बॉयो मेडिकल अपशिष्ट आदि अलग-अलग लिया जाता है। यहां से नगर निगम के 10 सब स्टेशनों पर अलग-अलग डंप कर दिया जाता है। यहां से बड़ी गाड़ियों में गीला कचरा लेकर बॉयो CNG प्लांट पर पहुंचाया जाता है। सभी गाड़ियों का कचरा एक जगह इकट्‌ठा कर दिया जाता है।

स्टेप 2 : आटा चक्कीनुमा मशीन में डालते हैं कचरा

बहुत बड़े पंजे वाली मशीन (जैसे जेसीबी की तरह काम करती है) इस कचरे को उठाती है। यहां से आटा चक्कीनुमा मशीन में प्री ट्रीटमेंट यूनिट हॉपर में डाला जाता है। ये दो मशीनें लगी हुई हैं जिसमें रेगुलर कचरा डाला जाता है। ट्रायल में स्क्रीनिंग होने के बाद सेकेंड हॉपर मशीन में इसे आगे बढ़ा दिया जाता है। ये मशीनें UK, जर्मनी, इटली और डेनमार्क से लाई गई हैं।

स्टेप 3 : दो दिन तक स्टोर कर कीचड़ में बदल देते हैं कचरे को

सेकेंड हॉपर से कचरा हेमर मिल में भेजा जाता है। व्यर्थ मटेरियल को अलग कर मशीन (हेमर मिल) से हाई क्वालिटी की स्लरी (कीचड़ की तरह दिखने वाला) बनाते हैं। स्लरी को पानी जैसे पदार्थ को मिलाने के लिए हाइड्रोलिसिस टैंक में डालते हैं। इसे टैंक में अलग से एक्टिव स्लरी यानी जिसमें बैक्टिरिया एक्टिव (कल्चर ) होते हैं, वह भी डाला जाता है। करीब दो दिन तक स्लरी को इसी पदार्थ में कीचड़ में बदल चुका कचरा रखा जाता है।

स्टेप 4 : 25 दिन डायजेस्टर टैंक में रखने पर बनती है मिथैन और Co2 गैस

हाइड्रोलाइज में बनी स्लरी को मेन डायजेस्टर टैंक में भिजवाते हैं। यहां हाई क्वालिटी बाॅयो गैस तैयार होने लगती है। यहां पर स्लरी को करीब 20 से 25 दिन रखते हैं। बायो गैस में मिथेन गैस (यही बॉयो CNG गैस है) की मात्रा करीब 55% और बाकी 45% कॉर्बन डाइ ऑक्साइड (Co2) रहती है। यहां से गैस को एक बड़े बलून में स्टोर करके प्रोसेस शुरू कर देते हैं। यहां कॉर्बन डाय ऑक्साइड को मिथेन से हटाना होता है।

स्टेप 5 : मिथेन से Co2 को अलग करते ही बॉयो सीएनजी होती है तैयार

लक्ष्य यह रहता है कि 45 में से कम से कम 40% कॉर्बन डाय ऑक्साइड को मिथेन से पृथक कर दिया जाए। जैसे-जैसे यह प्यूरीफिकेशन हो जाता है, फिर बलून में सिर्फ मिथेन बच जाती है। 4 से 5% Co2 फिर भी मिथेन में रहती ही है। यह अब सप्लाई लायक बन जाती है।

स्टेप 6 : पंपिंग स्टेशन और ग्राहक कंपनियों को सप्लाई

बॉयो CNG गैस बनते ही बलून से छोटे, छोटे सिलेंडरों में भरना शुरू कर देते हैं। इन्हें बड़ी गाड़ियों के जरिए डिमांड अनुसार सप्लाई किया जाता है। इन्हें अवंतिका गैस लिमिटेड, नगर निगम की सिटी बसों के लिए, एचडी वायर्स कंपनी और L&T कंपनी को सरकारी दर पर सप्लाई किया जा रहा है

नगर निगम ने दी 15 एकड़ जमीन

पीपीपी मॉडल से बायो सीएनजी प्लांट का संचालन होता है। इंदौर नगर निगम ने 15 एकड़ जमीन प्लांट के लिए दी है। प्लांट का संचालन इंदौर क्लीन एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड कर रही है, जो एवर एनवायरो रिसोर्स मैनेजमेंट प्राइवेट लिमिटेड की सब्सिडियरी है। ग्रीन ग्रोथ इक्विटी फंड की सौ प्रतिशित सब्सिडियरी कंपनी है, जिसका प्रबंधन भारत के अग्रणी क्लाइमेट फंड एवरसोर्स कैपिटल के द्वारा किया जाता है।