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हिन्दी भाषी क्षेत्र पिछड़ापन सुधार

Posted on: 28 May 2018 08:43 by Ravindra Singh Rana
हिन्दी भाषी क्षेत्र पिछड़ापन सुधार

इस आलेख (या निबन्ध ) की कोई तात्कालिक प्रासंगिकता नहीं है और नहीं यह किसी रोचक घटना या विषय पर आधारित है। यह कोई ब्रेकिंग न्यूज़ नहीं है कि भारत में 7 सर्वाधिक पिछड़े राज्यों मे से 5 हिन्दी बोलने वाले हैं । ये हैं बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ ( इनमें आश्चर्यजनक रूप से म. प्र. सरकार अपने को पिछड़ा नहीं मानती है )।

राजस्थान की स्थिति इनसे बहुत मामूली अन्तर से कुछ ही अच्छी कही जा सकती है।इन्हें बीमारू राज्य भी कहा जाता है। इन राज्यों के लोगों का अधिकांश समय गाँव- मुहल्ले से लेकर राष्ट्रीय राजनीति मे ही उलझे रहने में जाता है।वैसे तो पूरे भारत में क़ानून व नियम के प्रति बहुत कम सम्मान है परन्तु इन राज्यों को तो अक्सर क़ानून नहीं केवल भगवान चलारहा है।

मैंने इसी क्षेत्र मे जन्म लिया है और लगभग पूरा जीवन इसी को समर्पित कर दिया है।मुझे इससे बहुत स्नेह है ।इसकी साहित्यिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक एवं धार्मिक धरोहर न केवल भारत बल्कि पूरे विश्व मे अद्वितीय है। देववाणी संस्कृत और वेदों तथा देवताओं की जन्मस्थली यहीं है । भगवान राम, कृष्ण, बुद्ध , महावीर एवं अशोक की यह कार्यस्थली है।परन्तु वर्तमान की बात करूँ तो संकोच के साथ यह कहना पड़ता है कि इस क्षेत्र की स्थिति अत्यंत दयनीय है।

आर्थिक दृष्टि से यह क्षेत्र बहुत पिछड़ा है तथा प्रति व्यक्ति आय कम है। बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा बुन्देलखण्ड की आय तो विश्व के निर्धनतम राष्ट्रों के समान है। कृषि मे क्षेत्र पिछड़ा है तथा औद्योगिक विकास छिटपुट ही दिखाई पड़ता है। पूँजी तथा पूँजीपतियों को आकृष्ट करने के लिये बुलाई गयीं सभी समिट लगभग असफल रही है। ईज़ आफ डूइंग बिज़नेस यहाँ केवल सरकारी फाईलों मे है। लालफ़ीताशाही के आगे बाहरी व्यक्ति का हौसला जवाब दे जाता है । ज़मीन के नामांतरण ( दाख़िल ख़ारिज) के लिये बेलगाम पटवारी से पाला पड़ते ही बाहरी उद्योगपति भाग खड़ा होता है।

शासन और प्रशासन की व्यवस्था बाह्य रूप से आधुनिकता का आडम्बर ओढ़े हुए दिखती है जबकि वास्तव में उसकी आत्मा ब्रिटिश काल में ही जकड़ी हुई है। पुलिस व्यवस्था मे कोई सार्थक सुधार के क़दम नहीं उठाये गये है। यह भी विचारणीय है कि इस पिछड़े हिन्दी क्षेत्र को छोड़ कर लगभग पूरे भारत के शहरों मे पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू है। यहाँ 5 दशकों से नेता और बाबू इस प्रणाली पर केवल गहन विचार विमर्श करने मे लगे हुए है।

अपराध के मामले मे ये क्षेत्र अग्रणी है और अक्सर ज़्यादा लिखापढ़ी से बचने के लिये ये सारे अपराध पंजीबद्ध भी नहीं करते है।थानों मे शिकायत दर्ज कराना एक टेढ़ी खीर है। उत्तर प्रदेश तथा बिहार मे तो पीड़ितों ने थानों पर जाना भी बन्द कर दिया है और इसलिये अपराध शेष भारत की जनसंख्या की तुलना मे बहुत कम पंजीबद्ध होते है। न्यायालयीन व्यवस्था भी मुक़दमों की भरमार से चरमरा गई है।लगभग सभी क्षेत्रों में अनुशासनहीनता है और अव्यवस्था की दृष्टि से इनकी दशा बहुत गम्भीर है।

शिक्षा और स्वास्थ्य की दृष्टि से भी यह क्षेत्र बहुत पिछड़ा है । मैं अनेक ऑंकड़ें यहाँ दे सकता हूँ परन्तु केवल इतना कहना चाहूँगा कि साक्षरता दर, बच्चों के स्कूल छोड़ने की दर, स्कूलों की अधोसंरचना, प्राथमिक एवं उच्च शिक्षा के स्तर आदि मे यह क्षेत्र राष्ट्रीय औसत से बहुत नीचे है।स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता शोचनीय है।शिशु मृत्यु दर में निम्न ६ राज्यों मे से ये ५ राज्य हैं। मातृ मृत्यु दर में निम्नतम ८ में से ये ५ राज्य हैं।राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन योजना के परिणाम निराशाजनक है।

हमारा पूरा देश ही सामाजिक कुरीतियों से ग्रस्त है परन्तु इसमें तो सभी हिन्दी राज्य बहुत आगे है। घोर पुरूषवादी मानसिकता से यह क्षेत्र जकड़ा हुआ है जिस कारण बालिका भ्रूण हत्या, दहेज प्रताड़ना तथा नववधुओं को मारने आदि की अनेक घटनाएँ घटित होती हैं।

पिछड़े इलाक़ों की एक और ख़ासियत वीआईपी संस्कृति है।यहाँ के राजनीतिज्ञ और बाबू अपने मिथ्याभिमान का खुला प्रदर्शन कर निरीह जनता पर रौब ज़माना चाहते है। लाल बत्ती बन्द हो जाने के बाद भी वाहनों मे सायरन लगाना तथा उन पर नाना प्रकार के पदों को लिखना एक आम बात है।

उन्हें सनीमा हाल, अस्पताल, शासकीय कार्यालय, रेलवे स्टेशन, हवाई अड्डा आदि सब स्थानों पर सबसे पहले विशेषाधिकार चाहिये। ये अक्सर टोल नाकों या ट्रैफ़िक पुलिस पर अपनी शक्ति का प्रदर्शन भी करते रहते हैं। मीडिया, न्यायपालिका तथा कुछ अन्य लोग भी इस संस्कृति के शिकार हो रहे हैं। यहाँ लाईन लगाना अपनी शान के ख़िलाफ़ माना जाता है।

यह स्थिति मुझे भी असह्य है और ख़ुद को आइना दिखाने के समान लगती है। समय आ गया है कि इस क्षेत्र को अपने परंपरागत पूर्वाग्रहों से ऊपर उठ विकास का मार्ग पकड़ना होगा। यह कार्य सरकारों के भरोसे नहीं होगा । यहाँ का विकास और अनुशासन केवल और केवल यहां की जनता की कर्मठता पर ही निर्भर है ।

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