हाई स्पीड से घूम कर पृथ्वी ने 24 घंटे से पहले ही पूरा किया अपना चक्कर, जानें इसके नुकसान

अगर आपको लग रहा है कि आपका समय बिना पता चले ही फुर्र से उड़ जा रहा है तो अब तकनीकी तौर पर आप सही हैं।

अगर आपको लग रहा है कि आपका समय बिना पता चले ही फुर्र से उड़ जा रहा है तो अब तकनीकी तौर पर आप सही हैं। दरअसल, हाल ही में वैज्ञानिकों को पता चला है कि पृथ्वी की घूर्णन गति यानी घूमने की गति तेज हुई है। कुछ शोधकर्ता इसे बेहद कौतूहल से देख रहे हैं, वहीं कुछ वैज्ञानिकों ने इसे लेकर जरूरी जानकारी भी जारी की है। ऐसे में सवाल यह है कि आखिर पृथ्वीके घूमने की गति घटने या बढ़ने का मतलब क्या है? वैज्ञानिकों ने पृथ्वी के घूमने की गति में कितनी कमी दर्ज की है? क्या पहले भी पृथ्वी के घूमने की गति में कमी देखी गई है? अगर हां तो कब और कितनी? इन सबके बीच एक अहम सवाल यह भी है कि आखिर पृथ्वी के घूमने की गति तेज या धीमे होने से आम लोगों की जिंदगी पर क्या असर पड़ेगा?

पृथ्वी 24 घंटे में अपनी धुरी पर एक चक्कर पूरा करती है। लेकिन क्या आपको पता है कि पृथ्वी ने ये कारनामा 24 घंटे से भी कम समय में कर दिखाया है। 29 जुलाई को पृथ्वी ने अपनी धुरी पर एक चक्कर 1.9 मिली सेकेंड पहले पूरा कर लिया। आपको भले ही ये बहुत छोटा लगे, लेकिन टेक्निकली ये 24 घंटे से कम है। वैज्ञानिकों का कहना है कि घूर्णन की गति हाल ही में बढ़ रही है, लेकिन अभी इसका कारण अज्ञात है। अगर पृथ्वी के घूमने की स्पीड बढ़ती रहती है तो वह 24 घंटे से कम समय में ही चक्कर पूरा कर लिया करेगी। ये कम्युनिकेशन सिस्टम के लिए अच्छा नहीं होगा।

इस आंकड़े को देखने में लग रहा है कि पृथ्वी तेजी से घूम रही है, लेकिन जब लंबी अवधि पर विचार किया जाता है तो पता चलेगा कि वास्तव में ये धीमा हो रहा है। ग्रह एक चक्कर को पूरा करने में हर सदी में कुछ मिलीसेकंड ज्यादा का समय ले रहा है। साल 2020 में पृथ्वी ने 60 वर्षों में अपना सबसे छोटा महीना देखा था। 19 जुलाई 2020 को दिन 24 घंटे से 1.47 मिलीसेकंड छोटा था। पिछले साल का सबसे छोटा दिन 2020 की तुलना में आंशिक रूप से लंबा था।

पृथ्वी की घूर्णन गति का बढ़ना अपने आप में एक चौंकाने वाली बात है, क्योंकि पृथ्वी के शुरुआती वर्षों में इसके घूमने की स्पीड लगातार घट रही थी। 3.5 अरब साल पहले जब पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत हुई तब एक दिन करीब 12 घंटे का होता था। हालांकि, 2.5 अरब साल पहले जब पेड़-पौधों में प्रकाश संश्लेषण (फोटोसिंथेसिस) शुरू हुआ तब पृथ्वी के घूमने की गति और धीमी हुई और एक दिन करीब 18 घंटे का होने लगा। 1.7 अरब साल पहले यूकारयोटिक सेल्स की खोज के वक्त पृथ्वी की घूर्णन गति और धीमी हुई और एक दिन 21 घंटे लंबा हो गया। बीती सदियों में पृथ्वी की रोटेशन स्पीड इतनी कम हो चुकी है कि यह ग्रह 24 घंटे में एक चक्कर पूरा करने लगा है। हर साल पृथ्वी पर एक दिन सेकंड के 74,000वें हिस्से तक लंबा हुआ है। इससे उजाले और रात का वक्त औसतन 12-12 घंटे तक लंबा हुआ है। इसका असर इंसानी जीवन के साथ-साथ जानवरों, पेड़-पौधों और समग्र रूप से पूरी प्रकृति पर पड़ा है।

हालांकि, बीते कुछ दशकों की बात की जाए तो पृथ्वी के घूमने की गति में बड़े बदलाव देखे गए हैं और यह धीरे-धीरे तेज हो रही है। 2020 में वैज्ञानिकों ने बीते 50 वर्षों के 28 सबसे छोटे दिन दर्ज किए। इनमें सबसे छोटा दिन 19 जुलाई 2020 को दर्ज किया गया। यह दिन 24 घंटे यानी 86 हजार 400 सेकंड से 1.47 मिलीसेकंड छोटा था। वहीं, पिछले साल 26 जुलाई को भी एक दिन 1.5 मिलीसेकंड छोटा रहा था। 29 जून का दिन इस लिहाज से और छोटा रिकॉर्ड हुआ।कई वैज्ञानिकों का मानना है कि पृथ्वी के घूमने की स्पीड बढ़ने के लिए क्लाइमेट चेंज, समुद्री लहरों का मूवमेंट और पृथ्वी के कोर जिम्मेदार हैं। वहीं, कई अन्य मानते हैं कि पृथ्वी के भौगोलिक ध्रुव इसकी स्पीड के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं।

वैसे तो पृथ्वी की घूर्णन गति कम या ज्यादा होने से दिन की अवधि में थोड़ा ही फर्क पड़ेगा और आम लोगों की जिंदगी में यह इतना बड़ा अंतर नहीं होगा कि इसे पहचाना जा सके। हालांकि, कई वर्षों तक अगर दिन की अवधि में फर्क आता रहा तो यह लंबे समय में पृथ्वी में कई बड़े बदलाव कर सकता है।