साध्वी उमा को किनारे कर रहा भाजपा नेतृत्व : दिनेश निगम ‘त्यागी’

कमलनाथ भी सोशल मीडिया और खबरों से गायब हो गए। अब सलूजा से नहीं रहा गया या कमलनाथ को उनकी जरूरत महसूस हुई, जो भी हो लेकिन सलूजा की वापसी दोनों के लिए ही अच्छी रही।

दिनेश निगम ‘त्यागी’

यह संकेत पहले से थे कि पूर्व मुख्यमंत्री साध्वी उमा भारती भाजपा में उपेक्षित हैं। अपने ट्वीट्स के जरिए ऐसी अटकलों पर उन्होंने खुद मुहर लगा दी। नई खबर चौंकाने वाली यह है कि भाजपा नेतृत्व उमा को पूरी तरह से पार्टी में किनारे लगाने की तैयारी में है। तय कर लिया गया है कि भाजपा का कोई नेता उमा के आरोपों का न जवाब देगा, न उनके द्वारा उठाए मसलों पर चर्चा करेगा और न ही उनसे मुलाकात करेगा। उमा के लिए यह बड़े झटके से कम नहीं है, पर लगता है वे इसके लिए तैयार हैं। उनके द्वारा किए जा रहे ट्वीट्स यह संकेत देने के लिए काफी हैं। इनमें उन्होंने अपने खिलाफ कार्रवाई तक का जिक्र कर डाला है। यह भी बताया है कि कार्रवाई क्यों हुई? साफ है कि अपनी उपेक्षा से दुखी होकर उन्होंने आर-पार का मूड बना लिया है। शराबबंदी को लेकर वे पहले से आक्रामक हैं। छुटपुट विरोध कर चुकी हैं। दो अक्टूबर को महात्मा गांधी की जयंती पर अपनी ही सरकार की शराब नीति के खिलाफ भोपाल में महिलाओं के साथ पैदल मार्च का एलान आर-पार की शुरूआत हो सकती है। इसे रोकना है या होने देना है, यह गेंद भी उन्होंने प्रदेश सरकार के पाले में डाल रखी है। पैदल मार्च कितना असरकारक है, यह उमा की आगे की दिशा तय करेगा।

क्या क्षत्रिय समाज के पास अब वोट बैंक नहीं….

कुछ साल पहले जब नरेंद्र सिंह तोमर, नंद कुमार सिंह चौहान एवं राकेश सिंह भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बने थे, तब पार्टी के वरिष्ठ नेता थावरचंद गहलोत ने मंच से मजाक में कहा था कि अब पार्टी क्षत्रियों के कब्जे में है। आगे भी कोई क्षत्रिय ही पार्टी का प्रमुख बनेगा। तब से अब तक राजनीति की गंगा में काफी पानी बह गया। अब भाजपा के महापौर प्रत्याशियों पर नजर डालें तो सवाल उठता है कि क्या क्षत्रिय समाज के पास अब वोट बैंक नहीं रहा? क्योंकि 16 नगर निगमों में एक भी प्रत्याशी क्षत्रिय नहीं है। 16 में से 9 पद सामान्य वर्ग के लिए हैं। इनमें 6 ब्राह्मण और शेष अन्य समाजों से हैं लेकिन क्षत्रिय एक भी नहीं। इसे लेकर क्षत्रिय समाज में सुगबुगाहट है और भाजपा के प्रति असंतोष भी। सतना, ग्वालियर जैसे कुछ शहर ऐसे हैं, जहां क्षत्रियों पर भरोसा किया जाता रहा है। समाज के अंदर काना-फूसी चल रही है कि क्या हमें किनारे किया जा रहा है? चुनाव कोई भी हो, आमतौर पर राजनीतिक दल वोट बैंक को ध्यान में रखकर प्रत्याशियों का चयन करते हैं। क्षत्रिय समाज के मतदाताओं की संख्या हमेशा कम रही है लेकिन उनके प्रभाव में हमेशा बड़ा वोट बैंक रहा है। तो क्या अब क्षत्रिय समाज के पास वोट बैंक नहीं रहा? महापौर प्रत्याशियों को देखकर तो यही लगता है।

इस मसले पर तो कमलनाथ तारीफ के हकदार….

यह सच है कि प्रदेश कांग्रेस के मुखिया कमलनाथ बुजुर्ग होने के कारण दौड़ धूप कम कर पाते हैं, लेकिन एक मसला ऐसा भी है, जहां उनके वरिष्ठ होने का लाभ कांग्रेस को मिलता है। यह है प्रत्याशी चयन। मजबूत प्रत्याशियों के चयन के कारण विधानसभा चुनाव के बाद वे प्रदेश की सत्ता में आए थे और अब निकाय चुनावों में कांग्रेस मुकाबले में दिख रही है। हार-जीत अपनी जगह है, लेकिन भाजपा का कोई नेता यह दावा करने की स्थिति में नहीं है कि पहले की तरह सभी नगर निगमों में पार्टी जीत दर्ज करेगी। कोई भी राजनीतिक विश्लेषक उंगलियों में गिनाने लगता है कि ये चार-पांच महापौर कांग्रेस के बन रहे हैं और इन चार-पांच स्थानों पर कांटे के मुकाबले की स्थिति है। ऐसा कमलनाथ द्वारा दिए गए टिकटों की वजह से ही है, वर्ना संसाधन और प्रचार अभियान के मामले में कांग्रेस हर जगह भाजपा से उन्नीस नहीं, अठारह है। दरअसल, कमलनाथ तीन-तीन सर्वे कराने के बाद टिकट फाइनल करते हैं। व्यक्तिगत तौर पर भी निजी एजेंसियों के लोगों को भेजकर जनता के बीच राय मशविरा कराते हैं। इसके बाद प्रत्याशी तय होता है। इस मसले पर वे किसी की नहीं सुनते। लिहाजा, अब प्रत्याशी ही कांग्रेस की असल ताकत बन रहे हैं।

किसका दावा कितना सच, कितना झूठा….

जिला-जनपद पंचायतों के अध्यक्ष के चुनाव में अभी समय है। इससे पहले ही भाजपा और कांग्रेस के बीच दावों की होड़ लग गई है। भाजपा का दावा है कि वह अधिकांश जिलों और जनपदों में जीत गई है। पार्टी द्वारा बाकायदा जीते सदस्यों की सूची जारी की गई है। कांग्रेस ने भी जवाब में सूची जारी की है और दावा किया है कि कांग्रेस ने ज्यादा पदों पर जीत दर्ज की है। सूचियों के आधार पर ही भाजपा का दावा है कि अधिकांश जिलों और जनपदों में उसके अध्यक्ष बनने जा रहे हैं। उधर कांग्रेस भी यही दावा कर रही है। पंचायत चुनाव चूंकि गैरदलीय आधार पर होते हैं, ऐसे में अपवाद स्वरूप चर्चित चेहरों को छोड़ दें तो यह पता करना कठिन होता है कि कौन किस दल से है। दोनों दलों के दावों को देखकर जनता भ्रम में है। वह तय नहीं कर पा रही कि किसका दावा कितना सच है और किसका कितना झूठा। दावों से एक बात साबित होती है कि कांग्रेस मुकाबले में बनी हुई है। यह भी पता चलता है कि भाजपा ने ज्यादा सीटें भले जीती हों लेकिन यह जीत एकतरफा नहीं है। बहरहाल, राज्य निर्वाचन आयोग ने जिला-जनपद अध्यक्षों के निर्वाचन का कार्यक्रम जारी कर दिया है। ये चुनाव जुलाई के अंतिम सप्ताह में होंगे। तब पता चल जाएगा कि कौन कितने पानी में है।

अब फिर मुकाबले में आ गए कमलनाथ….

कांग्रेस में असरदार रहे सरदार नरेंद्र सलूजा गलती स्वीकार कर वापस आए या कमलनाथ को उनकी कमी महसूस हुई, सच जो भी हो, लेकिन उनकी वापसी से कमलनाथ को बड़ा फायदा हुआ है। सलूजा के घर बैठ जाने के बाद सोशल मीडिया और खबरों से कमलनाथ नदारद जैसे हो गए थे, अब फिर वे मुकाबले में ही नहीं, भाजपा की पूरी टीम पर भारी दिख रहे हैं। सलूजा कमलनाथ के साथ तब से जुड़े हैं जब वे मध्यप्रदेश की राजनीति से दूर थे। तब भी सलूजा इंदौर में रहकर कमलनाथ से जुड़ी खबरें जारी करते थे। कमलनाथ के प्रदेश अध्यक्ष, मुख्यमंत्री बनने के बाद तो सलूजा मीडिया की जरूरत बन गए थे। वे ही कमलनाथ से जुड़ी हर जानकारी साझा करते और उनकी ओर से भाजपा पर हमला करते थे। कमलनाथ ने मीडिया विभाग का पुनर्गठन किया तो अपेक्षाकृत कम तवज्जो मिलने से सलूजा नाराज हो गए। उन्होंने कममलनाथ के मीडिया समन्वयक, मीडिया विभाग के उपाध्यक्ष सहित पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया और घर बैठ गए। नतीजा, कमलनाथ भी सोशल मीडिया और खबरों से गायब हो गए। अब सलूजा से नहीं रहा गया या कमलनाथ को उनकी जरूरत महसूस हुई, जो भी हो लेकिन सलूजा की वापसी दोनों के लिए ही अच्छी रही।